उत्तराखण्ड में वन एवं वनों के प्रकार
उत्तराखण्ड का प्राकृतिक सौंदर्य और यहाँ की वन संपदा राज्य की जीवनरेखा हैं। यह विशेष लेख "उत्तराखण्ड के वन, औषधीय पौधे और ऐतिहासिक वन आंदोलनों" पर आधारित है। यह विषय आगामी UKPSC, UKSSSC, Uttarakhand Police, Patwari और Forest Guard जैसी सभी राज्य स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है। इसे पढ़कर अपनी तैयारी को और भी मजबूत करें!
इस लेख में आप क्या-क्या पढ़ेंगे:
- वनों का वर्गीकरण और बुग्याल: उत्तराखण्ड में ऊँचाई के आधार पर वनों के प्रकार, 'उत्तराखण्ड का सोना' कहे जाने वाले बाँज वृक्ष और बेदिनी जैसे प्रमुख घास के मैदानों (बुग्यालों) की रोचक जानकारी।
- प्रमुख औषधीय पौधे (जड़ी-बूटियां): कैंसर और हृदय रोगों जैसी गंभीर बीमारियों के इलाज में काम आने वाली राज्य की संजीवनी वनस्पतियों (जैसे- झूला, भीमल, घिंगारू, ममीरा और कीड़ा जड़ी) का परीक्षापयोगी विवरण।
- ऐतिहासिक वन आंदोलन: परीक्षाओं में बार-बार पूछे जाने वाले प्रमुख जन-आंदोलन, जैसे- चिपको, मैती, रक्षासूत्र, डूंगी-पैतौली और रंवाई (तिलाड़ी) आंदोलन का सम्पूर्ण घटनाक्रम।
- वन प्रशासन एवं नीतियां: राज्य में वन पंचायतों की व्यवस्था, मिश्रित वन खेती मॉडल और भारत में सबसे पहले लागू की गई उत्तराखण्ड पौधारोपण नीति (2006) से जुड़े अति-महत्वपूर्ण तथ्य।
उत्तराखण्ड में 41.3% वन 1000 से 2000 मी की ऊँचाई पर, जबकि 23.77% वन 2000-3000 मी की ऊँचाई पर पाए जाते हैं।
राज्य में 3000 मी से अधिक ऊँचाई पर सबसे कम वन (7.5%) पाए जाते हैं।
उपोष्ण कटिबन्धीय वन
- विस्तार पर्वतीय क्षेत्रों में - 1200 मी तक की ऊँचाई पर
- निचले क्षेत्रों में - 750 मी तक की ऊँचाई तक सीमित
- प्रमुख वृक्ष - साल, शीशम, सेमल, हल्दू, तुन, जामुन, शहतूत, रीठा
- ये वन आर्थिक दृष्टि से अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हैं।
उष्ण कटिबन्धीय शुष्क वन
- विस्तार - 1500 मी से कम ऊँचाई वाले क्षेत्र में
- प्रमुख वृक्ष - ढाक, सेमल, गूलर, जामुन व बेर आदि
उष्ण कटिबन्धीय आर्द्र पतझड़ वन
- विस्तार - 1500 मी की ऊँचाई वाले क्षेत्रों में
- प्रमुख वृक्ष - सागौन, साल, शहतूत आदि
- मुख्य क्षेत्र - दून घाटी और शिवालिक श्रेणियों में
- ये वन मुख्यतः मानसूनी वन होते हैं। ये वन वर्षा ऋतु में हरे-भरे रहते हैं और शीत या गर्म ऋतु में पत्तियाँ गिरा देते हैं।
कोणधारी वन
- विस्तार - 900 से 1800 मी की ऊँचाई पर
- प्रमुख वृक्ष - चीड़ (पाइन) वृक्ष, इस वृक्ष से चिलगोज, पिरूल व लीस प्राप्त की जाती है।
- यह उष्ण कटिबन्ध तथा शीतोष्ण कटिबन्ध के बीच के वन हैं।
पर्वतीय शीतोष्ण वन
- विस्तार - 1800 से 2700 मी की ऊँचाई तक
- प्रमुख वृक्ष - स्प्रूस, बाँज, सिल्वर फर, देवदार, साइप्रस आदि
उप-अल्पाइन तथा अल्पाइन वन
- विस्तार - 2700 मी से अधिक की ऊँचाई पर
- प्रमुख वृक्ष - सिल्वर फर, ब्लू पाइन, स्प्रूस, देवदार व बर्च आदि
अल्पाइन झाड़ियाँ
- विस्तार - 3000 से 3600 मी या इससे अधिक ऊँचाई पर
- प्रमुख वनस्पति - जूनिपर, विलो व रिब्स आदि
ऊँचाई के बढ़ते क्रम में उत्तराखण्ड की प्रमुख वृक्ष वनस्पतियाँ - सागौन < साल < चीड़ < देवदार < भोजपत्र
राज्य के हिमालयी क्षेत्र में भोजपत्र पाया जाता है, जिसे बर्च भी कहते हैं।
राज्य में 3600 से 4800 मी तक की ऊँचाई वाले क्षेत्रों में टुण्ड्रा तुल्य वनस्पतियाँ (घास, काई, लाइकेन आदि) उगती हैं।
उत्तराखण्ड का सोना : बाँज वृक्ष
- बाँज वृक्ष (क्वरकस ल्यूकोटाइकोफोरा) को उत्तराखण्ड का वरदान कहा जाता है।
- बाँज एक शीतोष्ण कटिबन्धीय वृक्ष है। सम्पूर्ण विश्व में इसकी 40 प्रजातियाँ पाई जाती हैं, परन्तु उत्तराखण्ड में केवल पाँच (सफेद, हरा, भूरा या खरस, फल्याँट तथा रियांज) प्रजातियाँ पाई जाती हैं।
- राज्य में इस वृक्ष को शिव की जटा भी कहा जाता है।
- बाँज वृक्ष अपनी बहुउपयोगिता के कारण उत्तराखण्ड का सोना कहलाता है। पर्यावरण सुरक्षा एवं जनमानस की दृष्टि से सफेद बाँज महत्त्वपूर्ण वृक्ष है।
उत्तराखण्ड के प्रमुख घास के मैदान
उत्तराखण्ड में 3,800 से 4,200 मी की ऊँचाई वाले क्षेत्र वृक्षविहीन हैं, क्योंकि यहाँ पर जलवायु शुष्क शीत है तथा यह क्षेत्र हिमाच्छादित रहता है।
यहाँ केवल छोटी-छोटी घासें ही उगती हैं, जिन्हें स्थानीय भाषा में बुग्याल और पयार आदि नामों से जाना जाता है।
अधिक ऊँचाई में स्थित इन घास के मैदानों को मीडो तथा अल्पाइन पाश्चर भी कहते हैं।
क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे बड़ा बुग्याल बेदिनी (चमोली) है।
उत्तराखण्ड के अन्य प्रमुख बुग्याल
| बुग्याल | अवस्थिति |
|---|---|
| बेदिनी | चमोली (रूपकुण्ड के पास) |
| केदारकाण्ठा | उत्तरकाशी |
| मानेग | उत्तरकाशी |
| हर की दून | उत्तरकाशी |
| सोनगाड़ | उत्तरकाशी |
| कुश कल्याण | टिहरी |
| दयारा | उत्तरकाशी |
| औली | चमोली (जोशीमठ से 15 किमी दूर) |
| बर्मी, मदमहेश्वर, चोपता | रुद्रप्रयाग |
| सतोपन्थ, घसतोली, रताकोण आदि | चमोली के गाँव माणा से ऊपर |
| गुरसो | औली के निकट |
| चित्रकाण्ठा, कुँआरी, कल्पनाथ | चमोली |
| बगजी | चमोली (पिण्डर और कैल के मध्य) |
| खतलिंग खारसोली, जौराई | टिहरी |
| कफनी | बागेश्वर |
| खलिया | पिथौरागढ़ |
| पनवाली कांथा/पंवाली कांथा | टिहरी UKPSC 2025 |
वनों का प्रशासनिक विभाजन
राज्य में वनों का प्रबन्धन/नियन्त्रण कुल चार तरीके से होता है
- वन विभागाधीन राज्य के कुल वन क्षेत्र का 70.46% वन इस श्रेणी में आता है। पर्यावरणीय एवं आपदाओं की दृष्टि से पूर्णतः सरकारी नियन्त्रण रहता है।
- राजस्व विभागाधीन राज्य के कुल वन क्षेत्र का 13.76% इस श्रेणी के अन्तर्गत आता है। इन वनों में पशु चराने तथा लकड़ी काटने की छूट होती है।
- वन पंचायताधीन राज्य के कुल वन क्षेत्र का 15.32% वन इस श्रेणी में आता है। इन वनों पर स्थानीय वन पंचायतों का नियन्त्रण होता है।
- निजी व अन्य संस्थाधीन राज्य के कुल वन क्षेत्र का 0.46% वन इस श्रेणी में आता है। इन वनों पर निजी व्यक्तियों, नगरपालिकाओं या नगर परिषदों आदि का अधिकार है।
उत्तराखण्ड के प्रमुख औषधीय पौधे
- उत्तराखण्ड को चरक संहिता में वानस्पतिक बगीचा (बॉटैनिकल गार्डन) एवं हिमालय को हिमवन्त औषध भूमिनाम कहा गया है।
- राज्य में जड़ी-बूटियों के संग्रह का कार्य सर्वप्रथम सहकारिता विभाग द्वारा वर्ष 1972 में शुरू किया गया था।
- राज्य की 114 जड़ी-बूटियों को वन प्रबन्धन अधिनियम, 1982 के तहत प्रतिबन्धित किया गया है।
- उत्तराखण्ड में लगभग 500 प्रकार की जड़ी-बूटियाँ पाई जाती हैं।
- जड़ी-बूटी क्लस्टर मोहनरी व देघाट (अल्मोड़ा), पौड़ी एवं जोशीमठ में स्थापित किया गया है।
- राज्य में जड़ी-बूटियों के विकास के लिए औषधीय पादप बोर्ड का गठन मुख्यमन्त्री की अध्यक्षता में किया गया है।
- राज्य में कैंसर के उपचार में प्रयुक्त टैक्सॉल नामक रसायन धुनेर पौधे से प्राप्त किया जाता है।
राज्य के प्रमुख औषधीय पौधे निम्नलिखित हैं-
अमेश
इस पौधे की जड़ों द्वारा मिट्टी में नाइट्रोजन का स्थिरीकरण किया जाता है। इसका फल राज्य में टमाटर के विकल्प के रूप में प्रयोग किया जाता है। अमेश का अन्य नाम हिप्पोपी है।
भैंकल
इस पौधे के फलों से प्राप्त होने वाले खाद्य तेल का उपयोग राज्य की स्थानीय भोटिया जनजाति द्वारा किया जाता है।
इस पौधे के तेल को गठिया के उपचार में प्रयुक्त किया जाता है।
जिरेनियम
जिरेनियम एक सुगन्धित पौधा है। आम बोलचाल की भाषा में इसे गुलाब की सुगन्ध वाला जिरेनियम भी कहा जाता है।
उत्तराखण्ड में इसके उत्पादन का कारण अनुकूल जलवायु का होना है।
जिरेनियम का उपयोग खाद्य पदार्थों, उच्च गुणवत्ता के साबुन, त्वचा के लेप व फेसवाश, क्रीम आदि बनाने के लिए होता है।
इसके तेल की सबसे बड़ी विशेषता क्षारीय माध्यमों में भी इसका विघटन न होना है।
ब्राह्मी
उपयोग यह वनस्पति औषधि के रूप में बुद्धिवर्द्धक तथा बलवर्द्धक होती है।
हरिद्वार में यह अधिक मात्रा में मिलती है।
जैट्रोफा (रतनजोत)
जैट्रोफा का उपयोग बायो डीजल के रूप में, साबुन, सौन्दर्य प्रसाधन, मोमबत्ती आदि उद्योगों में किया जाता है।
उत्तराखण्ड में जैट्रोफा कर्कस अपेक्षाकृत गर्म क्षेत्रों एवं घाटी वाले क्षेत्रों में पाया जाता है।
भीमल
- यह पौधा हिमालयी क्षेत्र के सम्पूर्ण शीतोष्ण भागों में पाया जाता है।
- इस पौधे की कोमल शाखाओं का प्रयोग हर्बल शैम्पू में मुख्य रूप से किया जाता है।
- सामान्यतः इस पौधे के सभी हिस्सों-रेशे, तना, पत्ते, फल, लकड़ी का बहुपयोगी प्रयोग किया जाता है।
- इस वृक्ष को किसानों का सर्वोत्तम मित्र कहा जाता है। UKPSC 2024
घिगारू
यह एक कँटीला पौधा है, जो लगभग 3600 मी की ऊँचाई तक उगता है। इसके फल को खाया जाता है।
यह पौधा हृदय रोग के उपचार में उपयोगी होता है।
ममीरा (पीली जड़ी)
यह पौधा हिमालयी क्षेत्र के 7,000 फीट तक की ऊँचाई में पाया जाता है।
इस पौधे की जड़ें पीले रंग की होती हैं और यह औषधि के रूप में आँखों के लिए उपयोगी है।
पहले बद्रीनाथ के बाजार में इसकी जड़ों का बना सुरमा बेचा जाता था।
बाजार में इसे ममीरा गाँठ के नाम से बेचा जाता है।
किलमोड़ा
- इस पौधे को दारुहरिद्रा या जरिष्क भी कहा जाता है।
- स्थानीय भाषा में इसे किनकोड़ा कहा जाता है।
- राज्य में इस पौधे की अनेक प्रजातियाँ पाई जाती हैं।
- इस पौधे का तना, जड़ की छाल आदि उपयोग में आते हैं।
- इस पौधे को वन्यजीव अधिनियम की प्रथम श्रेणी में रखा गया है।
- इससे दो रस पदार्थ बरबेरिन हाइड्रोक्लोराइड तथा रसोद निकाले जाते हैं, जिनसे आँखों से सम्बन्धित रोगों का उपचार किया जाता है।
बिच्छू घास (कण्डाली)
यह मूल रूप से यूरोपियन पौधा है, किन्तु यह पौधा हिमालय में खरपतवार के रूप में पाया जाता है।
हिमालयी क्षेत्र के स्थानीय लोग इसके पत्तों की सब्जी बनाते हैं तथा इससे पशुओं को चारा भी उपलब्ध होता है।
इसके सेवन से एनीमिया रोग दूर होता है, क्योंकि इस पौधे में विटामिन एवं खनिज प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं।
यह पौधा यूरोपीय मूल का है, जिसे छूने से शरीर में जलन होती है।
बैलाडोना
उत्तराखण्ड में बैलाडोना की कृषि सर्वप्रथम वर्ष 1903 में कुमाऊँ क्षेत्र में शुरू की गई थी। इस औषधीय पौधे से सिरदर्द, दाँत दर्द, मूत्राशय सम्बन्धित रोग आदि के उपचार की दवा बनाई जाती है।
मरोड़फली
सर्प विष को उतारने के लिए इस जड़ी-बूटी का प्रयोग किया जाता है।
झूला
इस वनस्पति का उपयोग साम्भर, गरम मसाला तथा हवन सामग्री बनाने में किया जाता है।
यह पौधा राज्य की आय का स्रोत है। प्रथम ग्रेड का झूला फ्रांस को निर्यात किया जाता है।
उत्तराखण्ड के प्रमुख औषधीय शोध संस्थान
| प्रमुख संस्थान | अवस्थिति |
|---|---|
| वन अनुसन्धान संस्थान | देहरादून |
| जी. बी. पन्त हिमालय पर्यावरणीय एवं विकास संस्थान (अल्मोड़ा) | कटारमल कोसी |
| उच्च स्थलीय पौध शोध संस्थान | श्रीनगर (पौड़ी गढ़वाल) |
| जड़ी-बूटी शोध एवं विकास संस्थान | गोपेश्वर (चमोली) |
| औषधीय एवं सुगन्धित पौध संस्थान (सीमैप) | पन्तनगर |
| रसायन विभाग एवं वानस्पतिक विभाग (कुमाऊँ विश्वविद्यालय) | नैनीताल |
| रसायन विभाग एवं वनस्पति विभाग (गढ़वाल विश्वविद्यालय) | श्रीनगर |
उत्तराखण्ड में वन संरक्षण सम्बन्धी जन-आन्दोलन
रंवाई आन्दोलन
- इसे तिलाड़ी आन्दोलन भी कहते हैं।
- वर्ष 1930 में नए वन कानून को समाप्त करने के टिहरी रियासत के विरुद्ध आन्दोलन
- 30 मई को शहीद दिवस मनाया जाता है।
चिपको आन्दोलन (1974)
- वनों की कटाई के विरुद्ध गोपेश्वर (चमोली) में,
- सूत्रपात्र - गौरी देवी (23 वर्षीय)
- आन्दोलन का नारा "हिम पुत्रियों की ललकार, वन नीति बदले सरकार, वन जागे वनवासी जागे"
- अन्य नेता - सुन्दरलाल बहुगुणा व चण्डीप्रसाद भट्ट
- चण्डीप्रसाद भट्ट को रैमन मैग्सेसे पुरस्कार (1981)
वन आन्दोलन
- वर्ष 1977 में वनों की नीलामी के विरोध में,
- वर्ष 1978 में पहली बार उत्तराखण्ड बन्द हुआ।
डूंगी-पैतौली आन्दोलन
- डूंगी-पैतौली वृक्ष (चमोली जिले में) की कटाई के विरुद्ध
- महिलाओं की भागीदारी सराहनीय
पाणी राखो आन्दोलन
- वर्ष 1980 पौड़ी के उफरैंखाल गाँव में
- सच्चिदानन्द भारती के नेतृत्व में
- दूधातोली लोक विकास संस्थान की स्थापना
रक्षासूत्र आन्दोलन
- वर्ष 1994 में टिहरी के भिलंगना क्षेत्र में,
- इसमें वृक्षों की रक्षा हेतु वृक्षों को रक्षासूत्र बाँधा गया।
झपटो छीनो आन्दोलन
- 21 जून, 1998 को
- यह आन्दोलन रैणी, लाता, तोलमा आदि गाँवों की जनता द्वारा परम्परागत अधिकार पुनर्प्राप्त करने हेतु तथा नन्दादेवी राष्ट्रीय पार्क का प्रबन्धन सौंपने की माँग को लेकर किया गया।
मैती आन्दोलन
- गढ़वाल क्षेत्र में वर्ष 1996 में कल्याण सिंह रावत ने मैती (मायका) आन्दोलन का सूत्रपात किया।
- मैती आन्दोलन में केवल अविवाहित युवतियाँ शामिल होती हैं।
- इस आन्दोलन के अन्तर्गत विवाह समारोह में वर-वधू द्वारा पौधा रोपने का प्रचलन है।
वन सम्बन्धी योजनाएँ/कार्यक्रम/संस्थाएँ
वन सम्बन्धी योजनाएँ/कार्यक्रम/संस्थाएँ निम्न हैं-
मिश्रित वन खेती मॉडल
रुद्रप्रयाग निवासी जगत सिंह चौधरी जंगली ने 30 वर्षों के प्रयास के उपरान्त मिश्रित वन खेती मॉडल तैयार किया। यह पर्यावरण संरक्षण एवं पारिस्थितिकी सन्तुलन की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है।
मिश्रित वन खेती मॉडल के लिए जगत सिंह चौधरी को वर्ष 2006 में आर्यभट्ट सम्मान प्रदान किया गया।
अपना गाँव अपना वन
यह योजना गाँवों को वनों से जोड़ने हेतु शुरू की गई है।
इसके अन्तर्गत वन भूमियों से अतिक्रमण हटाकर उस पर वृक्षारोपण किया जा रहा है।
इको टास्क फोर्स
वनों में वृद्धि व सुरक्षा प्रदान करने तथा भूतपूर्व सैनिकों को रोजगार उपलब्ध कराने के उद्देश्य से वर्ष 2008-09 में इको टास्क फोर्स का गठन किया गया।
महत्त्वपूर्ण तथ्य
- बीट वनों के प्रशासन की सबसे छोटी इकाई है, जो वन रक्षक या वन बीट अधिकारी के अधीन होती है।
- राज्य वन अधिकारी के अन्तर्गत डी.एफ.ओ, असिस्टेण्ट कंजरवेटर ऑफ फॉरेस्ट, रेंजर डिप्टी, रेंजर फॉरेस्टर एवं पतरौल आदि आते हैं।
- सेक्शन कुछ बीटों को मिलाकर बनता है, जो वन दरोगा या फॉरेस्टर के अधीन होती है।
- रेंज, कुछ सेक्शन को मिलाकर बनती है। रेंज, वन क्षेत्राधिकारी या रेंजर के अधीन होता है।
- उप-वन प्रभाग रेंजों को मिलाकर बनता है। उप-वन प्रभाग, प्रान्तीय वन सेवा अधिकारी के अधीन होता है, इसे सहायक वन संरक्षक भी कहा जाता है।
- उत्तराखण्ड वन विभाग का मुख्यालय देहरादून के राजपुर रोड पर स्थित है।
नागरिक एवं सोयम वन विकास योजना
नागरिक एवं सोयम वनों को वन विभाग को हस्तान्तरित करके उसका वैज्ञानिक ढंग से प्रबन्धन किया जाता है।
वन पंचायत
वनों के विकास और सुरक्षा के लिए राज्य में ब्रिटिशकाल (1931) से ही वन पंचायतों के गठन की व्यवस्था है।
वर्तमान में राज्य का लगभग 18.86% वन वनपंचायताधीन है। नए कानून के अनुसार वन पंचायतों के कुल 9 सदस्यों में से 4 महिला सदस्यों का होना अनिवार्य है।
नर्सरियाँ
वृक्षारोपण की तकनीकी को उच्चस्तरीय बनाने के लिए राज्य में अनेक हाई टैक वन नर्सरियाँ स्थापित की गई हैं।
दूधातोली लोक विकास संस्थान, उफरैंखाल
- सच्चिदानन्द भारती इस संस्था के माध्यम से उफरैंखाल (पौड़ी) में वर्षा के पानी को रोककर व्यर्थ चले जाने वाले पानी के अधिकतम सदुपयोग पर लगे हैं।
- इनके प्रयास से इस क्षेत्र में हरियाली बढ़ी है तथा साथ में जल, जंगल और जमीन को पर्याप्त संरक्षण प्राप्त हुआ है।
- 6 जनवरी, 2006 को राज्य में पौधारोपण नीति लागू की गई।
- उत्तराखण्ड पौधारोपण नीति लागू करने वाला देश का प्रथम राज्य है।
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