उत्तराखण्ड में सिंचाई व्यवस्था
उत्तराखण्ड के भूगोल और कृषि-अर्थव्यवस्था को गहराई से समझने के लिए राज्य की सिंचाई व्यवस्था का ज्ञान होना बेहद जरूरी है। यह एक ऐसा अति-महत्वपूर्ण विषय है, जिससे UKPSC, UKSSSC, Uttarakhand Police, Patwari, Forest Guard और अन्य सभी राज्य स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं में बार-बार प्रश्न पूछे जाते हैं। इस लेख के माध्यम से आप उत्तराखण्ड के सिंचित क्षेत्रों और सिंचाई के प्रमुख साधनों के सटीक आंकड़े आसानी से याद कर सकेंगे।
इस लेख में आप क्या-क्या पढ़ेंगे:
- सिंचित क्षेत्रों के महत्त्वपूर्ण आंकड़े: आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 के अनुसार राज्य में सर्वाधिक (उधमसिंह नगर, हरिद्वार) और सबसे कम (चमोली, अल्मोड़ा) सिंचाई वाले जिलों का सटीक प्रतिशत व क्रम।
- सिंचाई के प्रमुख साधन: नलकूपों (सर्वाधिक 64.45%), नहरों, कुओं और झीलों द्वारा सिंचाई का मण्डल-वार (गढ़वाल और कुमाऊँ) तुलनात्मक और विस्तृत विवरण।
- राज्य की प्रमुख नहरें और बहुउद्देशीय बाँध: लार्ड डलहौजी द्वारा निर्मित सबसे पुरानी 'ऊपरी गंगा नहर', शारदा नहर, रामगंगा नहर और एशिया के सबसे ऊँचे 'टिहरी बाँध' से जुड़े परीक्षापयोगी तथ्य।
- पारंपरिक जल संरक्षण और योजनाएं: स्थानीय सिंचाई व्यवस्था 'गूल' और 'पोखर', जल स्तर सुधार से जुड़ी 'चाल-खाल योजना' और विश्व बैंक द्वारा पोषित 'ग्राम्या' परियोजना की महत्वपूर्ण जानकारी।
आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 के अनुसार, राज्य का कुल शुद्ध बोया गया क्षेत्रफल लगभग 6.905 लाख हेक्टेयर है, जिसमें सिंचाई विभाग के अन्तर्गत सिंचित क्षेत्रफल 3.184 लाख हेक्टेयर है।
सिंचित क्षेत्रफल
- सबसे कम प्रतिशत शुद्ध सिंचित क्षेत्रफल वाले जिले चमोली एवं अल्मोड़ा हैं।
- सर्वाधिक प्रतिशत शुद्ध सिंचित क्षेत्रफल वाले जिले उधमसिंह नगर (99.5%), हरिद्वार (94.41%) व नैनीताल (60.07%) हैं।
- राज्य में नहर सिंचित क्षेत्रफल वाले जिले घटते क्रम में उधमसिंह नगर, नैनीताल, देहरादून तथा हरिद्वार हैं।
- राज्य में बोई गई कुल कृषि भूमि के लगभग 48% भाग पर सिंचाई की जाती है, जिसमें 13% पर्वतीय क्षेत्रों व 94% भाग मैदानी क्षेत्रों में सिंचित है।
- राज्य में कुआँ, तालाब, नदी, झील, नहर, नलकूप आदि साधनों का प्रयोग सिंचाई के लिए किया जाता है।
- गढ़वाल मण्डल में कुल सिंचित क्षेत्रफल के लगभग 50.95% भाग पर कुओं, तालाबों, झीलों तथा पोखरों से सिंचाई की जाती है।
- गढ़वाल मण्डल में नहरों से लगभग 43.43% भाग पर सिंचाई की जाती है।
- कुमाऊँ मण्डल में नलकूप द्वारा सिंचाई की जाती है।
उत्तराखण्ड में सिंचाई के प्रमुख साधन
उत्तराखण्ड में सिंचाई के प्रमुख साधन नलकूप, नहरें तथा गूले एवं पोखर हैं। इनका विवरण निम्न प्रकार है-
नलकूपों द्वारा सिंचाई
शिवालिक से दक्षिण की ओर नलकूपों का उपयोग बढ़ा है।
राज्य के 64.45% सिंचित क्षेत्र पर नलकूप है।
गढ़वाल में 5.57% तथा कुमाऊँ में 44.57% भाग पर नलकूप द्वारा सिंचाई होती है।
नलकूपों द्वारा सिंचित प्रमुख जिले (घटते क्रम) उधमसिंह नगर, हरिद्वार, नैनीताल, देहरादून हैं।
वर्ष 1985 से निःशुल्क बोरिंग योजना प्रारम्भ की गई।
नहरों द्वारा सिंचाई
राज्य गठन के समय 6064 किमी नहरों द्वारा सिंचाई की जाती है।
नहरों एवं अन्य साधनों द्वारा सिंचाई का वर्णन निम्न प्रकार है-
ऊपरी गंगा नहर
- उद्गम हरिद्वार के निकट गंगा के दाहिने छोर से
- निर्माण लॉर्ड डलहौजी (1842 से 1854 ई.)
- यह सबसे पुरानी नहर है तथा वर्ष 1983 में इसका आधुनिकीकरण किया गया।
- हरिद्वार के दक्षिण-पश्चिमी क्षेत्रों में सिंचाई
पूर्वी गंगा नहर
- लम्बाई 48.55 किमी
- क्षमता 137.4 क्यूसेक
- उद्गम भीमगोड़ा (हरिद्वार)
- शाखाएँ चन्दोक, नगीना, नहटोर, नजीबाबाद, उलावपुर
- इन शाखाओं द्वारा हरिद्वार, बिजनौर, मुरादाबाद (उत्तर प्रदेश) में सिंचाई की जाती है।
शारदा नहर
उद्गम बनवासा (चम्पावत, उत्तराखण्ड-नेपाल सीमा)
निर्माण वर्ष 1928 में शारदा (काली नदी) पर
सिंचाई सुविधा-चम्पावत, उधमसिंह नगर, उत्तर प्रदेश में
रामगंगा नहर
उद्गम कालागढ़ (पौड़ी गढ़वाल)
लम्बाई 3200 किमी
उत्तराखण्ड व उत्तर प्रदेश की 17.50 लाख एकड़ भूमि की सिंचाई
भीमताल
कुमाऊँ की सबसे बड़ी झील
इससे कई छोटी नहरें निकलती हैं, जो नैनीताल जिले में सिंचाई हेतु प्रयुक्त हैं।
जमरानी बाँध
इससे उधमसिंह नगर व नैनीताल में सिंचाई की जाती है।
नानक सागर बाँध
नहटोर नदी (नैनीताल) पर
नैनीताल, उधमसिंह नगर में सिंचाई
टिहरी बाँध
- शिलान्यास वर्ष - 1972
- बिजली उत्पादन - 2006
- भागीरथी और भिलंगना नदियों के संगम पर बना है।
- एशिया का सबसे ऊँचा बाँध (260.5 मी)
- टिहरी, पौड़ी, देहरादून, हरिद्वार में सिंचाई
गूले एवं पोखर द्वारा सिंचाई
- गूलों का निर्माण मुख्यतः प्राकृतिक गदेरों के पानी के संचय और सिंचाई के लिए उपयोग हेतु किया जाता है। इन्हें स्थानीय भाषा में खाल भी कहा जाता है।
- वर्षा ऋतु में पानी के तीव्र बहाव से गूले प्रायः क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। इस अवस्था में पोखर का निर्माण किया जाता है। इनमें वर्षाजल एकत्र किया जाता है।
- चाल-खाल योजना का सम्बन्ध राज्य में जल स्तर सुधार से है।
नोट- विश्व बैंक के वित्तपोषण पर विकेन्द्रित जलागम विकास परियोजना ग्राम्या का संचालन राज्य के 7 जिलों में किया जा रहा है।
उत्तराखण्ड की सभी प्रतियोगी परीक्षाओं की शानदार और सटीक तैयारी के लिए हमारी वेबसाइट https://www.uttarakhandgk.com/ पर नियमित रूप से विजिट करें। अपनी तैयारी को और मजबूत बनाने के लिए वेबसाइट का नाम हमेशा याद रखें - WWW.UTTARAKHANDGK.COM!

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें