उत्तराखण्ड में शौर्य परम्परा
उत्तराखण्ड को देवभूमि के साथ-साथ 'वीरभूमि' भी कहा जाता है और यहाँ की शौर्य एवं सैन्य परम्परा का इतिहास अत्यंत गौरवशाली रहा है। यह महत्वपूर्ण विषय UKPSC, UKSSSC, उत्तराखण्ड पुलिस, पटवारी, फॉरेस्ट गार्ड और अन्य सभी राज्य स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं के दृष्टिकोण से बेहद महत्वपूर्ण है। आगामी परीक्षाओं में इस टॉपिक से निश्चित रूप से प्रश्न पूछे जाते हैं।
इस लेख में आप क्या-क्या पढ़ेंगे:
- देश की सबसे पुरानी 'कुमाऊँ रेजीमेण्ट' और अपने अदम्य साहस के लिए प्रसिद्ध 'गढ़वाल रेजीमेण्ट' का ऐतिहासिक सफर एवं उनकी प्रमुख उपलब्धियाँ।
- राष्ट्रीय इण्डियन मिलिटरी कॉलेज (RIMC) और भारतीय सैन्य अकादमी (IMA) देहरादून जैसी राज्य में स्थित प्रमुख सैन्य संस्थाओं की स्थापना से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य।
- प्रथम विश्व युद्ध और 1962 के भारत-चीन युद्ध में सर्वोच्च बलिदान देने वाले वीर सैनिकों (जैसे- विक्टोरिया क्रॉस विजेता दरबान सिंह नेगी व गबर सिंह नेगी और महावीर चक्र विजेता जसवन्त सिंह रावत) की शौर्यगाथा।
- देश के प्रथम चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल बिपिन रावत जी के जीवन और उनके सैन्य सफर से जुड़े परीक्षापयोगी बिंदु।
राज्य में थल सेना की दो रेजीमेण्ट-कुमाऊँ रेजीमेण्ट और गढ़वाल रेजीमेण्ट का मुख्यालय तथा अनेक छावनियाँ हैं।
देश का अन्य ऐसा कोई भी दूसरा प्रान्त नहीं है, जहाँ इतनी कम जनसंख्या के पश्चात् भी अपनी दो रेजीमेण्ट हों।
कुमाऊँ रेजीमेण्ट
- देश की सबसे पुरानी रेजीमेण्ट कुमाऊँ रेजीमेण्ट है।
- 1788 ई. में दक्षिण भारत में बरार के नवाब सलावत खाँ ने एल्लिचपुर ब्रिगेड गठित की, जिसकी पहली बटालियन को 4 कुमाऊँ के नाम से जाना जाता है।
- 35 वर्ष बाद वहाँ दूसरी ब्रिगेड गठित की गई, जिसे बटालियन 5 कुमाऊँ कहते हैं।
- 1797 ई. में हैदराबाद के निजाम के द्वारा भी एक ब्रिगेड गठित की गई थी, जिसे वर्तमान में बटालियन 2 कुमाऊँ कहा जाता है।
- कर्नल लांगर ने वर्ष 1917 को पहली कुमाऊँ राइफल्स की स्थापना की, जिसे वर्तमान में 3 कुमाऊँ राइफल्स के नाम से जानते हैं।
- राज्य में कुमाऊँ क्षेत्र के लोगों से बनी रेजीमेण्ट को 27 अक्टूबर, 1945 को कुमाऊँ रेजीमेण्ट नाम दिया गया।
कुमाऊँ रेजीमेण्ट के सैनिक
- जनरल एस. एम. श्री नागेश (1955-57), जनरल के.एस. थिमैय्या (1957-61) एवं जनरल टी.एन.रैना (1975-78) कुमाऊँ रेजीमेण्ट से भारतीय सेना में तीन सेनाध्यक्ष हुए।
- लेफ्टिनेण्ट कर्नल नरेन्द्र कुमार ने हिमालय की त्रिशूल, कामेत एवं नन्दादेवी चोटियों पर सफल आरोहण किया, जिसके लिए उन्हें पद्मश्री पुरस्कार प्रदान किया गया था।
- मेजर सोमनाथ शर्मा व मेजर शैतान सिंह कुमाऊँ रेजीमेण्ट से सम्बन्धित थे।
गढ़वाल रेजीमेण्ट
- 5 मई, 1887 को तीसरी गोरखा रेजीमेण्ट की दूसरी बटालियन से अल्मोड़ा में गढ़वाली बटालियन का गठन हुआ, जिसे तीसरी कुमाऊँ रेजीमेण्ट नाम दिया गया।
- तीसरी कुमाऊँ रेजीमेण्ट को 4 नवम्बर, 1887 कालोडाण्डा (लैन्सडाउन) में छावनी बनाने का कार्य सौंपा गया।
- राज्य में 1891 ई. में 6 गढ़वाली कम्पनियों की मदद से 39वीं (गढ़वाली) रेजीमेण्ट ऑफ बंगाल इन्फैण्ट्री का गठन हुआ। इसने बर्मा में चीनियों के विरुद्ध युद्ध में सफलता प्राप्त की।
- 1892 ई. में इसे राइफल का खिताब दिया गया तथा बाद में इसका नाम प्रथम बटालियन 39 गढ़वाल राइफल्स कर दिया गया।
वर्ष 1921 में प्रथम बटालियन 39 गढ़वाल राइफल्स को रॉयल खिताब मिलने के कारण इसका नाम 39वीं रॉयल गढ़वाल राइफल्स कर दिया गया।
वर्ष 2007 में रेजीमेण्ट को सर्वश्रेष्ठ सैन्य स्टेशन पुरस्कार मिला था।
उत्तराखण्ड में स्थित प्रमुख सैन्य छावनियाँ
| नाम | स्थापना |
|---|---|
| देहरादून छावनी | 30 नवम्बर, 1814 |
| अल्मोड़ा छावनी | अप्रैल, 1815 |
| नैनीताल छावनी | 1841 ई. |
| रुड़की छावनी | 1853 ई. |
| चकराता छावनी | 1866 ई. |
| रानीखेत छावनी | 1871 ई. |
| लैन्सडाउन छावनी | 5 मई, 1887 |
उत्तराखण्ड में स्थापित सैन्य संस्थाएँ
- राष्ट्रीय इण्डियन मिलिटरी कॉलेज देहरादून में स्थित है।
- इसकी स्थापना 1 मार्च, 1922 को ड्यूक ऑफ विण्डसर (प्रिन्स ऑफ वेल्स एडवर्ड VIII) द्वारा की गई थी।
- भारतीय सैन्य अकादमी देहरादून में स्थित है। इसकी स्थापना 1 अक्टूबर, 1932 को फील्ड मार्शल सर फिलिप चेटवुडबर्ट द्वारा की गई थी। इसका औपचारिक उद्घाटन 10 दिसम्बर, 1932 को किया गया।
- स्वतन्त्र भारत के फील्ड मार्शल एस. एच. एम. मानेक शाह, इस संस्थान के पहले बैच के विद्यार्थी रह चुके हैं।
प्रमुख सैन्य पुरस्कार प्राप्तकर्ता
| नाम | पुरस्कार का नाम | वर्ष |
|---|---|---|
| दरबान सिंह नेगी | विक्टोरिया क्रॉस | 1914 |
| गबर सिंह नेगी | विक्टोरिया क्रॉस | 1915 |
| मेजर सोमनाथ शर्मा | परमवीर चक्र | 1947 |
| मेजर शैतान सिंह | परमवीर चक्र | 1962 |
| मातवर सिंह नेगी | अशोक चक्र | 2002 |
| रणवीर सिंह | अशोक चक्र | 2002 |
| मोहन चन्द्र शर्मा मासीवाल | अशोक चक्र | 2009 |
| सूबेदार अजयवर्द्धन | कीर्ति चक्र | 2015 (मरणोपरान्त) |
| जयेन्द्र भट्ट | सर्वोच्च जीवन रक्षा पदक | 2015 |
| नन्दराम | सर्वोच्च जीवन रक्षा पदक | 2015 |
| अजयलाल | सर्वोच्च जीवन रक्षा पदक | 2015 |
| मेजर विभांशु ढौंडियाल | शौर्य चक्र | 2015 |
| जगदीश चन्द्र | कीर्ति चक्र | 2016 |
| मेजर विजयन्त बिष्ट | कीर्ति चक्र | 2018 |
| मेजर विभूति शंकर ढौंडियाल | शौर्य चक्र | 2021 (मरणोपरान्त) |
| मेजर चित्रेश बिष्ट | शौर्य चक्र | 2021 (मरणोपरान्त) |
| मेजर दिग्विजय सिंह रावत | कीर्ति चक्र | 2024 |
| मेजर सचिन नेगी | शौर्य चक्र | 2024 |
| मेजर रविन्द्र सिंह रावत | शौर्य चक्र | 2024 |
| कैप्टन दीपक सिंह | शौर्य चक्र | 2025 (मरणोपरान्त) |
उत्तराखण्ड के प्रमुख सैन्य व्यक्तित्व
दरबान सिंह नेगी
- इनका जन्म 4 मार्च, 1883 को कफारतीर गाँव, चमोली में हुआ था।
- गढ़वाल राइफल्स के नायक दरबान सिंह नेगी को प्रथम विश्वयुद्ध (वर्ष 1914-18) के दौरान वीरता का प्रदर्शन करने के कारण उस समय के सर्वोच्च सम्मान विक्टोरिया क्रॉस से सम्मानित किया गया था।
- विश्वयुद्ध में यह सम्मान पाने वाले वह दूसरे भारतीय थे।
- दरबान सिंह नेगी प्रथम विश्वयुद्ध में फ्रांस के फेस्टुवर्ट में तैनात थे।
गबर सिंह नेगी
- इनका जन्म 21 अप्रैल, 1985 को सांजुर गाँव, टिहरी में हुआ था।
- वे 39वीं गढ़वाल राइफल की दूसरी बटालियन में राइफलमैन के पद पर तैनात थे।
- प्रथम विश्वयुद्ध में गबर सिंह नेगी फ्रांस के न्यूचैपल में तैनात थे।
- इन्हें वर्ष 1915 में प्रथम विश्वयुद्ध के समय मरणोपरान्त विक्टोरिया क्रॉस दिया गया।
- दिसम्बर, 1925 में टिहरी में गबर सिंह का स्मारक बनाया गया।
- गबर सिंह मेला 21, अप्रैल को चम्बा में लगता है।
जसवन्त सिंह रावत
- इनका जन्म वर्ष 1941 को पौड़ी में हुआ था। ये चौथी गढ़वाल राइफल के सिपाही थे।
- वर्ष 1962 में भारत-चीन युद्ध में इन्होंने अरुणाचल प्रदेश के नूरनांग की लड़ाई 72 घण्टे तक लड़ी। हीरो ऑफ नेफा जसवन्त सिंह रावत को महावीर चक्र (मरणोपरान्त) से सम्मानित किया गया।
- इनके नाम पर नूरनांग में एक स्मारक बनाया गया है।
- जसवन्त सिंह रावत पर 72 ऑवर्स मार्टियर छूँ नेवर डायर्ड के नाम की एक फिल्म अविनाश ध्यानी के निर्देशन में बनाई गई।
- ऐसा माना जाता है कि जसवंत सिंह रावत प्रतीक रूप में आज भी जीवित हैं और सीमाओं पर देश की सुरक्षा में लगे हुए हैं।
जनरल बिपिन रावत
- इनका जन्म 16 मार्च, 1958 को बमरौली गाँव, पौड़ी में हुआ था। ये दिसम्बर, 2016 से दिसम्बर 2019 तक भारतीय थल सेना के अध्यक्ष पद पर रहे थे। ये देश के पहले चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) नियुक्त किए गए।
- जनरल बिपिन रावत एवं इनकी पत्नी मधुलिका रावत की मृत्यु तमिलनाडु में (कन्नूर) भारतीय वायु सेना के मिल एम आई-17 हेलीकॉप्टर के दुर्घटनाग्रस्त होने से 8 दिसम्बर, 2021 को हुई थी।
उत्तराखण्ड के अन्य प्रमुख सैन्यकर्मी
| नाम | पुरस्कार का नाम |
|---|---|
| शूरवीर सिंह पंवार | टिहरी गढ़वाल के पंवार राजवंश में जन्मे शूरवीर सिंह पंवार को वर्ष 1943 में इमरजेन्सी कमीशन में भारतीय सेना में कैप्टन का पद मिला था। |
| कैप्टन सी.एन.सिंह | गढ़वाल राइफल्स के कैप्टन सी.एन.सिंह को वर्ष 1965 में भारत-पाक युद्ध में उनकी बहादुरी के लिए महावीर चक्र प्रदान किया गया। |
| गजेन्द्र सिंह बिष्ट | ये 26 नवम्बर, 2008 को मुम्बई स्थित नारीमन हाउस पर हुए आतंकी हमले में शहीद हुए। इन्हें मरणोपरान्त 'अशोक चक्र' से सम्मानित किया गया। |
| एडमिरल देवेन्द्र जोशी | भारतीय नौसेना में वर्ष 2012-2014 तक नौसेना के अध्यक्ष पद पर रहे। |
| जनरल बिपिन चन्द्र जोशी | भारतीय थल सेना में वर्ष 1993-94 तक भारतीय थल सेना अध्यक्ष पद पर रहे। |
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