उत्तराखण्ड के अन्य प्रसिद्ध मन्दिर

उत्तराखण्ड के अन्य प्रसिद्ध मन्दिर

उत्तराखण्ड देवभूमि के नाम से विश्वभर में विख्यात है, और यहाँ के प्राचीन मन्दिरों एवं धार्मिक स्थलों का इतिहास राज्य की परीक्षाओं के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। यह विशेष अध्ययन सामग्री UKPSC, UKSSSC, Uttarakhand Police, Patwari, Forest Guard आदि जैसी सभी आगामी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए बेहद उपयोगी है, जो आपके चयन को सुनिश्चित करने में मदद करेगी।
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इस लेख में आप क्या-क्या पढ़ेंगे:
  • ऐतिहासिक सूर्य मन्दिर और अद्भुत शक्तियाँ: अल्मोड़ा के कटारमल सूर्य मन्दिर (बूटधारी सूर्य मन्दिर) और पलेठी के प्राचीन सूर्य मन्दिर की वास्तुकला, तथा कसार देवी गुफा की अद्वितीय चुम्बकीय शक्तियों (वैन एलन बेल्ट) के रहस्य।
  • प्रसिद्ध देवता और आस्था के केन्द्र: कुमाऊँ में न्याय के देवता 'गोलू देवता' की परम्पराएँ, कैंची धाम के नीम करौली बाबा का इतिहास, और जौनसार-भाबर के प्रमुख तीर्थ हनोल (महासू देवता) से जुड़े महत्त्वपूर्ण तथ्य।
  • प्रमुख गुरुद्वारे और शक्तिपीठ: गुरुनानक देव जी से जुड़े मीठा-रीठा साहिब व नानकमत्ता का इतिहास, और चम्पावत के पूर्णागिरि शक्तिपीठ से जुड़ी रोचक जानकारियाँ।
  • शिल्प और वास्तुकला के बेजोड़ नमूने: चन्द शासकों द्वारा निर्मित बालेश्वर मन्दिर का प्राचीन इतिहास और देहरादून के विशाल एवं भव्य बुद्धा टेम्पल से जुड़े परीक्षापयोगी बिन्दु।

उत्तराखण्ड के प्रसिद्ध मन्दिर

मन्दिर विवरण/अवस्थिति
मीठा-रीठा साहिब (चम्पावत में लधिया एवं राटिया नदियों के संगम पर)
  • गुरुनानक जी ने मीठा-रीठा साहिब में तपस्या की
  • गुरुद्वारे के साथ मिलकर नाथपन्थ का घेरनाथ मन्दिर बनाया गया
पूर्णागिरि शक्तिपीठ (चम्पावत के टनकपुर)
  • यह शक्तिपीठ अन्नपूर्णा शिखर पर स्थित है।
  • देश में स्थित 108 शक्तिपीठों में से पूर्णागिरि शक्तिपीठ एक है। मान्यताओं के अनुसार यहाँ सती माता का नाभि का भाग गिरा था।
गर्जिया देवी मन्दिर (सुन्दरखाल, रामनगर (नैनीताल))
  • कोसी नदी के मध्य एक टीले पर स्थित है। इस मन्दिर की प्रमुख देवी माता पार्वती हैं।
  • गर्जिया देवी को पहले उपटा देवी कहा जाता था।
  • सीतावनी व महर्षि वाल्मीकि के भग्नावशेष गर्जिया के पास स्थित हैं।
कैंची धाम (नैनीताल)
  • नीम करौली बाबा कैंची धाम से सम्बन्धित हैं। यह मन्दिर हनुमान जी को समर्पित है।
  • नीम करौली बाबा का वास्तविक नाम लक्ष्मीनारायण शर्मा था, जो फिरोजाबाद से वर्ष 1962 में नैनीताल आए थे।
नैनादेवी मन्दिर (नैनीताल में नैनी झील के किनारे मल्लीताल में)
  • इस प्राचीन मन्दिर का निर्माण श्री मोतीराम शाह जी ने करवाया था, जो 1880 ई. के भीषण भू-स्खलन में नष्ट हो गया था। इसकी पुन: स्थापना 1882 ई. में की गई थी।
कटारमल का सूर्य मन्दिर (अल्मोड़ा)
  • यह मन्दिर उत्तराखण्ड शैली में बना है।
  • मन्दिर की मुख्य प्रतिमा बड़ादित्य सूर्य की है। यह प्रतिमा बूट पहने हुए खड़े रूप में स्थापित है। इस कारण इसे बूटधारी सूर्य मन्दिर भी कहते हैं। मुख्य मन्दिर 45 छोटे-बड़े मन्दिरों के समूह से घिरा हुआ है।
  • तीन पंक्तियों वाला अपठित शिलालेख सूर्य मन्दिर की दीवार का मुख्य आकर्षण है।
  • राष्ट्रीय संग्रहालय, नई दिल्ली में इस मन्दिर के कपाट (गर्भगृह का प्रवेश द्वार) रखे हुए हैं।
पलेठी का सूर्य मन्दिर (हिण्डोलाखाल, देवप्रयाग)
  • राज्य के सबसे प्राचीन सूर्य मन्दिर का निर्माण 7वीं शताब्दी में किया गया था।
  • लुलेरा-गुलेरा घाटी में स्थित यह मन्दिर फांसणा शैली में बना हुआ है।
  • कल्याणवर्मन व आदिवर्मन का ब्राह्मी लिपि में लिखा शिलापट पलेठी सूर्य मन्दिर में स्थित है।
  • इस मन्दिर के प्रवेश द्वार को अंग्रेजी के टी (T) आकार में बनाया गया है।
कसार देवी गुफा मन्दिर (अल्मोड़ा में कश्यप पहाड़ी)
  • कसार देवी की गुफा में स्वामी विवेकानन्द ने 1890 ई. में तथा महात्मा बुद्ध के गुरु लामा गोविन्दा ने भी तपस्या की थी। क्रैंक रिज के कारण कसार देवी मन्दिर में चुम्बकीय शक्तियाँ विद्यमान हैं, जिसके कारण इसके आस-पास का क्षेत्र वैन एलन बेल्ट के अन्तर्गत आता है।
नन्दादेवी मन्दिर (अल्मोड़ा)
  • नन्दादेवी गढ़वाल के राजा दक्ष प्रजापति की पुत्री मानी जाती हैं।
  • नन्दादेवी चन्द शासकों की ईष्ट देवी भी मानी जाती हैं। नन्दादेवी की प्रतिमा को चन्द राजा बाजबहादुर चन्द गढ़वाल से अल्मोड़ा लाया था और उसने इस प्रतिमा को मल्ला महल में स्थापित किया था।
  • मल्ला महल में रखी प्रतिमाओं को पर्वतेश्वर मन्दिर में रखने का कार्य कमिश्नर ट्रेल ने किया था, तभी से इसे नन्दादेवी मन्दिर कहा जाने लगा।

बालेश्वर मन्दिर

  • भगवान शिव का यह मन्दिर चम्पावत का सबसे पुराना मन्दिर माना जाता है। इस मन्दिर का निर्माण 1272 ई. में चन्द शासकों ने जगन्नाथ मिस्त्री की सहायता से कराया था।
  • शिखर शैली में बने इस मन्दिर में बलुवा ग्रेनाइट पत्थरों का प्रयोग हुआ है।
  • गुजरात-राजस्थान शैली या बेसर शैली का प्रभाव बालेश्वर मन्दिर में देखा जा सकता है।
  • गरुड़ ज्ञानचन्द के पापों का प्रायश्चित करने के लिए उद्यानचन्द ने बालेश्वर मन्दिर का जीर्णोद्धार कराया, जिसे पूर्ण कराने का कार्य विक्रमचन्द द्वारा किया गया था।
  • रत्नेश्वर मन्दिर भी बालेश्वर मन्दिर के परिसर में स्थित है।
  • बालेश्वर मन्दिर को राष्ट्रीय धरोहर स्मारक घोषित किया गया है तथा यह मन्दिर वर्ष 1952 से भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण के अन्तर्गत संरक्षित है।

मन्दिर विवरण/अवस्थिति
बैजनाथ मन्दिर समूह
(बागेश्वर से 26 किमी की दूरी पर गोमती व गरुड़गंगा नदियों के तट पर)
  • बैजनाथ के मुख्य मन्दिर में पार्वती माता की पत्थर की विशाल मूर्ति स्थापित है।
  • बैजनाथ के मन्दिरों का जीर्णोद्धार कत्यूरी, चन्द व गंगोली वंश के शासकों के काल में समय-समय पर करवाया गया।
  • इस मन्दिर के साथ एक संग्रहालय भी है।
  • बैजनाथ में कृत्रिम झील का उद्घाटन वर्ष 2016 में किया गया था।
तुंगनाथ मन्दिर (रुद्रप्रयाग जिले में चन्द्रशिला पर्वत के शिखर पर)
  • यहाँ भगवान शिव के हाथ या भुजा भाग की पूजा होती है।
  • यह राज्य में सर्वाधिक ऊँचाई (3680 मी.) पर स्थित देव मन्दिर है।
  • मन्दिर के समीप रावणशिला है, जहाँ रावण ने भगवान शिव की आराधना की थी। यहाँ बिना पूँछ वाले रुंडा चूहे पाए जाते हैं। भगवान तुंगनाथ की पूजा शीतकाल में मार्कण्डेय मन्दिर मक्कूमठ में की जाती है। तुंगनाथ का अन्य नाम हरिहर क्षेत्र भी है।
  • यह तृतीय केदार के रूप में प्रसिद्ध है, इसका निर्माण कत्यूरी शैली में हुआ है।
मदमहेश्वर मन्दिर/द्वितीय केदार (रुद्रप्रयाग)
  • यह मन्दिर चौखम्बा शिखर की पहाड़ियों से घिरा है। यहाँ भगवान शिव की नाभि की पूजा की जाती है।
  • मदमहेश्वर नाथ की पूजा शीतकाल में ऊखीमठ में की जाती है। इस मन्दिर का निर्माण पाण्डव शैली में हुआ है।
रुद्रनाथ मन्दिर/चतुर्थ केदार
(चमोली)
  • यहाँ भगवान शिव के मुख या रौद्र रूप की पूजा की जाती है। रुद्रनाथ को पितृ तीर्थ के लिए भी जाना जाता है।
  • रुद्रनाथ की पूजा शीतकाल में गोपेश्वर मन्दिर में की जाती है। यह क्षेत्र ब्रह्मकमल के लिए अत्यन्त प्रसिद्ध है।
टपकेश्वर महादेव (देहरादून शहर से 6 किमी की दूरी पर)
  • यह एक प्राकृतिक गुफा मन्दिर है। यहाँ शिवलिंग पर निरन्तर जल टपकता रहता है।
  • यहाँ शिवरात्री के दिन विशाल मेले का आयोजन होता है। यहाँ हनुमान जी की विशाल मूर्ति भी है।
  • गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा का जन्म टपकेश्वर में हुआ था।
कल्पेश्वर नाथ
  • यह मन्दिर चमोली जिले की उर्गम घाटी में स्थित है। यहाँ भगवान शिव की जटाओं की पूजा की जाती है। इस मन्दिर को उत्तराखण्ड का पंचम केदार भी कहते हैं। यह एकमात्र केदार है, जहाँ स्थानीय लोग पुजारी होते हैं।
  • पाण्डवों ने नागर शैली में इस मन्दिर का निर्माण कराया था। मान्यताओं के अनुसार यहाँ कल्प वृक्ष के नीचे अप्सरा उर्वशी व दुर्वासा ऋषि ने तपस्या की थी।
  • इस मन्दिर के कपाट पूरे वर्ष खुले रहते हैं। कलेवर कुण्ड कल्पेश्वर नाथ के निकट स्थित है।
विश्वनाथ मन्दिर
  • उत्तरकाशी में भागीरथी नदी के तट पर स्थित यह मन्दिर भगवान शिव को समर्पित है।
  • 1857 ई. में गढ़वाल नरेश की पत्नी महारानी खनेती ने इस मन्दिर का पुनः निर्माण कराया था। इस मन्दिर का निर्माण कत्यूरी शैली में हुआ है।
  • शक्ति माता का मन्दिर विश्वनाथ मन्दिर के ठीक सामने है, जहाँ की प्रमुख विशेषता 6 मी लम्बा त्रिशूल है।
हेमकुण्ड
  • वर्ष 1930 में सिक्खों के पवित्र स्थल हेमकुण्ड साहिब की स्थापना चमोली में की गई। यह जोशीमठ से 20 किमी की दूरी पर ऋषिकेश-बद्रीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित है।
  • हेमकुण्ड साहिब में दसवें सिक्ख गुरु गोविन्द सिंह जी ने तपस्या की थी। हेमकुण्ड साहिब सात पर्वतों से घिरा हुआ है। इसके पास स्थित झील से हेमगंगा नामक छोटी नदी निकलती है। गुरुद्वारा एवं लक्ष्मण जी का मन्दिर हेमकुण्ड झील के पास ही स्थित हैं।
  • हेमकुण्ड साहिब को लोकपाल तीर्थ या दण्डपुष्करणी तीर्थ के नाम से भी जाना जाता है।
  • हेमकुण्ड की भौगोलिक खोज का वर्णन तारा सिंह ने अपनी पुस्तक तीर्थ संग्रह में किया है।
  • सन्त मोहन का हेमकुण्ड साहिब के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान है। सात सदस्यों की एक कमेटी हेमकुण्ड साहिब की तीर्थयात्रा का संचालन करती है।

हाटकालिका मन्दिर

  • यह मन्दिर पिथौरागढ़ के गंगोलीहाट में स्थित है। यह मन्दिर महिषासुरमर्दिनी की सिद्धपीठ है। यह देवी रहस्यों के लिए प्रसिद्ध है।
  • इस मन्दिर की मूर्ति बनाने में काले संगमरमर का प्रयोग किया गया है।
  • लक्ष्मण बाबा द्वारा हाटकालिका मन्दिर का जीर्णोद्धार करवाया गया था। हाटकालिका देवी को जवानों की रक्षक देवी माना जाता है।
  • श्रीनगर से कुछ दूरी पर बद्रीनाथ मार्ग पर कालियासौड़ में बीच झील के ऊपर धारीदेवी का मन्दिर बनाया गया है।
  • यह मन्दिर काली माता को समर्पित है, जिन्हें दक्षिणी काली माता भी कहा जाता है। मान्यताओं के अनुसार आधे दिन के बाद से इस मूर्ति का रंग बदलता रहता है। धारी गाँव के पाण्डेय ब्राह्मण, धारी मन्दिर के पुजारी होते हैं। तीर्थ यात्रियों की रक्षक देवी के रूप में धारी माता की पूजा की जाती है।

गोलू देवता का मन्दिर

  • न्याय या परमोच्च न्यायालय गोलू देवता को माना जाता है।
  • अल्मोड़ा जिले में स्थित गोलू देवता मन्दिर को चितई मन्दिर तथा रहस्यमयी मन्दिर भी कहते हैं।
  • कुमाऊँ में गोलू देवता के प्रमुख चार मन्दिर अल्मोड़ा, चम्पावत, घोड़ाखाल (नैनीताल) तथा ताड़ीखेत में स्थित हैं।
  • गोलू देवता को गढ़वाल में गोरिल्ला देवता के नाम से भी जाना जाता है।
  • गोलू देवता के मन्दिर घण्टियों वाले मन्दिर के नाम से भी प्रसिद्ध हैं।
  • गोलू देवता मन्दिर में चिट्ठी लिखकर मन्नत माँगने की परम्परा प्रचलित है।
  • राज्य में प्रचलित कथाओं के अनुसार कत्यूरी राजा झालुराई तथा उनकी पत्नी देवी कलिंगा से भैरव अवतार में गोलू देवता (कलबिष्ट देवता) का जन्म हुआ था।

हनोल मन्दिर

  • महासू देवता का मन्दिर देहरादून के हनोल में टोंस नदी के तट पर स्थित है। यह मन्दिर भगवान शिव को समर्पित है।
  • हनोल मन्दिर का निर्माण हुणाभाट ने हूण शैली में कराया था, जो जौनसार भाबर-क्षेत्र का प्रमुख तीर्थ स्थल है।
  • महासू देवता चार देवताओं (बासिक, पबासिक, बौठा व चालदा महासू) का सामूहिक नाम है।
  • बौठा महासू हनोल का मुख्य मन्दिर है, जिन्हें कैलू वीर भी कहा जाता है।
  • बासिक महासू की पूजा मैन्द्रथ नामक स्थान पर की जाती है, जिसे कफला वीर भी कहा जाता है।
  • चालदा महासू, जिन्हें सेकुडिया वीर भी कहते हैं, भ्रमण प्रिय देवता हैं।
  • महासू देवता का त्योहार जागड़ा सितम्बर माह में मनाया जाता है।

नानकमत्ता

  • नानकमत्ता में सिक्खों के प्रथम गुरु नानकदेव जी अपने शिष्य बाला व मरदाना के साथ आए थे।
  • नानकमत्ता में स्थित पीपल वृक्ष को पंजा साहिब कहते हैं।
  • 1508 ई. में तीसरी कैलाश यात्रा के दौरान गुरु नानक जी नानकमत्ता में रुके थे, जिस कारण दीपावली से पहले दिन यहाँ एक मेले का आयोजन किया जाता है।
  • कुमाऊँ के राजा बाजबहादुर चन्द के समय सिक्खों के छठे गुरु हरगोविन्द साहिब ने नानकमत्ता की यात्रा की थी।
  • इसके पास ही नानक सागर बाँध स्थित है।

बुद्धा टेम्पल

  • इसकी स्थापना 28 अक्टूबर, 2002 में की गई थी
  • इसका उद्घाटन बौद्ध गुरु दलाई लामा द्वारा किया गया था। यह देहरादून के क्लेमनटाउन में स्थित है।
  • यहाँ का प्रमुख दर्शनीय स्थल 130 फीट की भगवान बुद्ध की मूर्ति है।
  • इस 5 मंजिला टेम्पल की ऊँचाई लगभग 185 फीट है।
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Kartik Budholiya

उत्तराखंड की ऐतिहासिक विरासत, भूगोल, नदी प्रणालियों और सामान्य ज्ञान के विशेषज्ञ Kartik Budholiya छात्रों को UKPSC, UKSSSC, Uttarakhand Police, Patwari, Forest Guard और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता दिलाने के लिए निरंतर शोध-परक कंटेंट साझा करते हैं।