उत्तराखण्ड के प्रमुख वाद्ययन्त्र
उत्तराखण्ड की समृद्ध संस्कृति और लोककलाओं में यहाँ के वाद्ययंत्रों (Musical Instruments) का एक बेहद खास और पवित्र स्थान है। कला एवं संस्कृति खण्ड का यह टॉपिक UKPSC, UKSSSC, Uttarakhand Police, Patwari, Forest Guard जैसी सभी उत्तराखण्ड राज्य स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण है। परीक्षा में अक्सर यहाँ के लोकवाद्यों से सीधे प्रश्न पूछे जाते हैं।
इस लेख में आप क्या-क्या पढ़ेंगे:
- उत्तराखण्ड के राज्य वाद्ययंत्र 'ढोल' का इतिहास, भण्डारी कमेटी की सिफारिश और इसे राज्य वाद्य घोषित किए जाने से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य।
- दमाऊँ, डमरू, मशकबीन (यूरोपियन वाद्य), मोछंग, हुड़की और अलगोजा (बाँसुरी) जैसे प्रमुख लोक वाद्यों की रोचक जानकारी और उनकी वादन शैली।
- जागर कथाओं, युद्ध प्रेरक प्रसंगों, और सरौं नृत्य जैसे विशेष अवसरों पर बजाए जाने वाले रणसिंघा, डौंर-थाली और तुरही जैसे वाद्ययंत्रों का विस्तृत वर्णन।
- परीक्षा की दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण- वाद्ययंत्रों का सटीक वर्गीकरण (चर्मवाद्य, घनवाद्य, तार/तांत वाद्य और सुषिरवाद्य) और उनके अंतर्गत आने वाले उपकरणों की पूरी सूची।
लोकनृत्य और गायन लोकवाद्यों के सफलतापूर्वक वादन से ही सम्पन्न हो पाते हैं। अतः संगीत में वाद्यों का महत्त्वपूर्ण स्थान है।
ढोल
- ताँबे और साल की लकड़ी से बना ढोल राज्य का प्रमुख वाद्ययन्त्र है।
- वर्ष 2015 में तत्कालीन मुख्यमन्त्री हरीश रावत ने भण्डारी कमेटी की सिफारिश पर ढोल को राज्य का वाद्ययन्त्र घोषित किया था।
- यह राज्य में लगभग सभी उत्सवों पर बजाया जाता है।
दमाऊँ (दमामा)
वर्तमान में यह एक लोक वाद्य है, किन्तु पूर्व में इसका उपयोग सामान्यतः युद्ध वाद्यों के साथ राजदरबार के नक्कारखानों में होता था। यह ढोल के साथ बजाया जाता है।
डमरू
- डमरू का प्रयोग घड़ियाल, रमौल, जागर कथाओं के गायन में होता है।
- डमरू के साथ काँसे की थाली भी वाद्ययन्त्र के रूप में बजती है।
- बड़े डमरू को डम्बर और छोटे डमरू को डुडर कहते हैं।
मशकबीन
यह एक यूरोपियन वाद्ययन्त्र है। यह कपड़े से बना थैलीनुमा आकार का होता है।
इसमें 5 बाँसुरी जैसे यन्त्र लगे होते हैं। एक नली हवा फूँकने के लिए होती है।
मोछंग
- यह लोहे की पतली शिराओं से बना हुआ छोटा-सा वाद्ययन्त्र है। इसे होठों पर स्थिर कर एक अँगुली से बजाया जाता है।
- इस वाद्य को घने वनों में प्रायः पशुचारकों द्वारा बजाया जाता है।
तुरही और रणसिंघा
- तुरही और रणसिंघा (भंकोर) एक-दूसरे से मिलते-जुलते फूँक वाद्ययन्त्र हैं, जिन्हें पहले युद्ध के समय बजाया जाता था।
- ताँबे का बना यह वाद्ययन्त्र एक नाल के रूप में होता है।
- यह मुख की ओर संकरा होता है तथा इसे मुँह से फूँक मारकर बजाया जाता है।
सारंगी
इसका प्रयोग बाद्दी (नाच-गाकर जीवन-यापन करने वाली जाति) और मिरासी अधिक करते हैं। पेशेवर जातियों का यह मुख्य वाद्ययन्त्र है।
अलगोजा (बाँसुरी)
- यह बाँस या मोटे रिंगाल की बनी होती है, जो स्वतन्त्र और सह-वाद्य दोनों ही रूपों में बजाई जाती है। इसका अन्य नाम रामसौर भी है।
- इसके स्वरों के साथ नृत्य भी होता है। खुदेड़ अथवा झुमैलो गीतों के साथ बाँसुरी बजाई जाती है। इसे पशुचारकों द्वारा अधिक बजाया जाता है।
इकतारा
यह तानपुरे के समान होता है। इसमें केवल एक तार होता है।
बिनाई
यह लोहे से निर्मित एक छोटा-सा धातु वाद्ययन्त्र है, जिसको दोनों सिरों के दाँतों के बीच दबाकर बजाया जाता है।
डौंर-थाली
- डौंर या डमरू यहाँ का प्रमुख वाद्ययन्त्र है, जिसे हाथ या लाकुड़ से तथा थाली लाकुड़ से डौंर से साम्य बनाकर बजाया जाता है।
- डौंर प्रायः सान्दण की ठोस लकड़ी को खोखला करके बनाया जाता है, जिसके दोनों ओर बकरे की खाल चढ़ी होती है।
हुडुक या हुड़की
- हुडुक राज्य का महत्त्वपूर्ण वाद्ययन्त्र है।
- इसकी लम्बाई एक फुट व तीन इंच के लगभग होती है।
- यह जागर, युद्ध प्रेरक प्रसंग आदि के समय बजाया जाता है।
वाद्य यन्त्रों के प्रकार
- राज्य के चर्मवाद्य हुड़की व दमाऊ, डफली, तबला, ढोल, धतिमा नगाड़ा, साइया, डौंर आदि हैं। गढ़वाल में सरौं नृत्य के अवसर पर युद्ध वाद्ययन्त्र नगाड़े को बजाया जाता है।
- राज्य के घनवाद्य मंजीरा, घुंघरू, चिमटा, घण्टा, बिनाई, थाली व करताल आदि हैं।
- राज्य के तार अथवा तांत वाद्य इकतारा, सारंगी, दो तारा, वीणा आदि हैं।
- राज्य के सुषिरवाद्य तुरही, नागफनी, मशकबीन शंख, मोछंग, अलगोजा (बाँसुरी) व रणसिंघा हैं।
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