उत्तराखण्ड के प्रमुख उत्सव व महोत्सव
प्रिय विद्यार्थियों, उत्तराखण्ड की कला, संस्कृति और अनूठी परंपराएं हमारी सबसे बड़ी धरोहर हैं। इस महत्वपूर्ण लेख में हम "उत्तराखण्ड के प्रमुख उत्सव, महोत्सव और प्रसिद्ध देव यात्राओं" पर विस्तार से चर्चा करेंगे। यह विषय UKPSC, UKSSSC, Uttarakhand Police, Patwari, Forest Guard और अन्य सभी राज्य स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है, जहाँ से हर बार प्रश्न पूछे जाते हैं!
इस लेख में आप क्या-क्या पढ़ेंगे:
- उत्तराखण्ड के अनूठे उत्सव: यूनेस्को की विश्व अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर में शामिल चमोली के 'रम्माण उत्सव', पिथौरागढ़ में 12 वर्ष बाद मनाए जाने वाले 'कण्डाली महोत्सव' और दयारा बुग्याल की प्रसिद्ध 'अण्डूड़ी (मक्खन और दही की होली)' से जुड़े रोचक तथ्य।
- पारंपरिक मेले एवं सांस्कृतिक आयोजन: सुरकण्डा उत्सव, हिलजात्रा, नौठा कौथीग, छोलिया नृत्य महोत्सव और कालिदास महोत्सव जैसे महत्वपूर्ण आयोजनों का स्थान, समय और उनका सांस्कृतिक महत्व।
- राज्य की सुप्रसिद्ध धार्मिक यात्राएं: हिमालय के महाकुम्भ के नाम से विख्यात 12 वर्षीय 'नन्दादेवी राजजात यात्रा' (280 किमी का सफर), कैलाश मानसरोवर यात्रा और अस्कोट-अराकोट यात्रा के संपूर्ण ऐतिहासिक और भौगोलिक विवरण।
- परीक्षा उपयोगी तथ्य: विभिन्न उत्सवों के आयोजन स्थल, संबंधित जिले, महीने और उनमें होने वाले विशिष्ट क्रियाकलाप (जैसे मुखौटा नृत्य, पत्थरों की वर्षा आदि), जो सीधे आपकी परीक्षाओं के प्रश्नपत्रों में छपते हैं।
उत्तराखण्ड के उत्सव व महोत्सव
- बद्री-केदार उत्सव : यह हरिद्वार के अगस्त्यमुनि तथा बद्रीनाथ में प्रतिवर्ष 2 से 24 जून तक राज्य सरकार द्वारा आयोजित होता है।
- सुरकण्डा उत्सव : टिहरी के सुरकण्डा देवी के मन्दिर में मनाया जाता है।
- ग्रीष्मोत्सव : यह राज्य की आर्थिक वृद्धि हेतु अल्मोड़ा में राज्य के संस्कृति एवं पर्यटन विभाग द्वारा आयोजित किया जाता है।
- हिलजात्रा उत्सव : यह उत्सव पश्चिम नेपाल की दून एवं पिथौरागढ़ की सोरघाटी में (वर्षा ऋतु) किसानों द्वारा मनाया जाता है।
- गेंदी का खकोटी उत्सव : यह उत्सव बसन्त पंचमी से वैशाखी तक पौड़ी जिले में मनाया जाता है। इस अवसर पर लोग ढोल दमाऊ पर चौंफल और झुमैलो नृत्य करते हैं।
- उत्सव के अन्तिम दिन घर-घर जाकर पारम्परिक गीत गाए जाते हैं।
- कण्डाली महोत्सव : यह महोत्सव पिथौरागढ़ के भोटिया लोगों द्वारा प्रत्येक 12 वर्ष के पश्चात् मनाया जाता है।
- अण्डूड़ी उत्सव : यह उत्सव दयारा बुग्याल (उत्तरकाशी) में मक्खन एवं दही की होली के रूप में प्रत्येक वर्ष अगस्त महीने में मनाया जाता है।
- उमा कर्ण महोत्सव : यह महोत्सव चमोली के कर्णप्रयाग (वैशाखी, धार्मिक) में आयोजित होता है।
- शहीद ऊधमसिंह की स्मृति में उत्सव/मेला : यह उत्सव ऊधमसिंह नगर के रुद्रपुर में दिसम्बर में प्रतिवर्ष मनाया जाता है।
- गोलज्यू महोत्सव : यह महोत्सव अल्मोड़ा के चितई में प्रतिवर्ष फरवरी महीने में मनाया जाता है।
- मधुगंगा घाटी विकास महोत्सव : यह महोत्सव पौड़ी जिले में प्रतिवर्ष मई महीने में आयोजित होता है।
- छोलिया नृत्य महोत्सव : यह महोत्सव पिथौरागढ़ में प्रतिवर्ष मई महीने में मनाया जाता है।
- नौठा कौथीग उत्सव : यह वैशाख के पाँचवें सोमवार या ज्येष्ठ के पहले सोमवार को आयोजित किया जाता है। प्राचीन समय में इस उत्सव में दो गाँव के लोग एक-दूसरे पर पत्थरों की वर्षा करते थे। वर्तमान में ढोल-नगाड़ों के साथ केवल प्रतीकात्मक पत्थरों की वर्षा की जाती है। चमोली के आदिबद्री धाम में इस कौथीग को हिमालय महोत्सव के नाम से मनाया जाता है।
- गबला देव पूजा उत्सव : यह पिथौरागढ़ के चौदांस, दरमा, व्यास घाटी में प्रतिवर्ष आयोजित होता है।
- रम्माण उत्सव : यह उत्सव प्रत्येक वर्ष वैशाख महीने में रम्माण अर्थात् रामायण उत्सव का आयोजन किया जाता है। इसका आयोजन चमोली के जोशीमठ ब्लॉक के सलूड़, डुंग्रा व सेलंग आदि गाँवों में किया जाता है। इसे यूनेस्को द्वारा 2 अक्टूबर, 2009 को विश्व की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर घोषित किया गया। इसमें लकड़ी के मुखौटे लगाकर रामायण पर आधारित लोक नाट्य प्रस्तुत किया जाता है।
- सालम रंग महोत्सव : यह महोत्सव अल्मोड़ा में प्रतिवर्ष जुलाई महीने में आयोजित होता है।
- दीप महोत्सव : यह महोत्सव चम्पावत के खेतीखान में दीपावली के अवसर पर मनाया जाता है।
- कोट महोत्सव : यह महोत्सव पौड़ी के कोट में तीन दिनों तक प्रतिवर्ष दिसम्बर में आयोजित होता है।
- गगवाड़स्यूँ महोत्सव : यह महोत्सव पौड़ी जिले में प्रतिवर्ष नवम्बर में आयोजित होता है।
- कालिदास महोत्सव : रुद्रप्रयाग, संस्कृत विद्वानों का संगम कालिदास महोत्सव प्रतिवर्ष 15 से 17 जून तक आयोजित होता है।
- गंगावली महोत्सव : यह महोत्सव पिथौरागढ़ में सरयू एवं रामगंगा के बीच प्रतिवर्ष जून में आयोजित होता है।
- कनालीछीना महोत्सव : यह महोत्सव पिथौरागढ़ में प्रतिवर्ष नवम्बर-दिसम्बर में आयोजित होता है।
- महेशानी महोत्सव : यह महोत्सव प्रतिवर्ष पिथौरागढ़ झूलाघाट में, भारत व नेपाल की संस्कृतियों की प्रस्तुति में दिसम्बर में आयोजित होता है।
- रँवाई शारदोत्सव विकास मेला : यह मेला उत्तरकाशी के बड़कोट में प्रतिवर्ष पाँच दिनों तक दिसम्बर में आयोजित होता है।
- कैलाश मानसरोवर यात्रा : यह प्रतिवर्ष जून के प्रथम सप्ताह से सितम्बर के अन्तिम सप्ताह तक चलती है। इसमें धारचूला (पिथौरागढ़) से लिपुलेख दर्रे से होकर यात्रा (धारचूला से 160 किमी पैदल) करनी होती है।
- छोटी नन्दा राजजात : यह यात्रा प्रतिवर्ष चमोली के कुरुड़ से बेदनी कुण्ड तक होती है।
- हिल जात्रा : यह पिथौरागढ़ के सोरो घाटी में मनाया जाने वाला मुख्य रूप से कृषकों तथा पशुपालकों का उत्सव है।
- दयबोरा यात्रा : डेढ़ वर्षों तक पिथौरागढ़ में मनाई जाने वाली इस यात्रा में ग्रामवासी पूरी रात नंगे पाँव मन्दिर तीर्थों की परिक्रमा करते हैं।
- पवाली काण्ठा-केदार यात्रा : यह अगस्त-सितम्बर में टिहरी गढ़वाल के पवाली काण्ठा से गौरीकुण्ड से रुद्रप्रयाग के केदारनाथ तक (29 किमी) पैदल होती है।
- वारूणी पंचकोसी यात्रा : इस यात्रा का प्रारम्भ उत्तरकाशी से चैत्र महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि से होता है।
- गुरु मणिकनाथ जात यात्रा : इस यात्रा का आयोजन टिहरी में प्रत्येक वर्ष पाँच दिनों तक किया जाता है।
- सहस्त्र ताल-महाश्र ताल यात्रा : यह यात्रा भद्रपद महीने में टिहरी से प्रारम्भ होती है। बूढ़ाकेदार से महाश्रताल, घुत्ते से होते हुए उत्तरकाशी के सहस्त्रताल तक जाती है।
- अस्कोट-अराकोट यात्रा : नैनीताल की पहाड़ संस्था द्वारा वर्ष 1974 से प्रति दस वर्ष में गाँवों को समझने एवं आकलन करने के लिए लगभग 1,150 किमी की पैदल यात्रा है।
- केदारनाथ यात्रा : यह यात्रा रुद्रप्रयाग के गौरीकुण्ड से प्रारम्भ होकर रामबाड़ा होकर केदारनाथ मन्दिर पर समाप्त होती है। यह यात्रा केदारनाथ मन्दिर के मई में कपाट खुलने से प्रारम्भ होती है तथा नवम्बर में कपाट बन्द होने तक जारी रहती है।
नन्दादेवी राजजात यात्रा
- हिमालय के महाकुम्भ के नाम से प्रसिद्ध यह यात्रा सम्भवतः 8वीं सदी में प्रारम्भ हुई थी। नन्दा देवी राजजात यात्रा में चाँदपुर गढ़ी के कुँवरों का विशेष योगदान रहा है।
- नन्दादेवी राजजात यात्रा का आयोजन प्रत्येक 12 वर्ष के अन्तराल पर चमोली के कांसुवा गाँव से होमकुण्ड तक 19-20 दिन तक आयोजित होता है। नन्दादेवी राजजात यात्रा की कांसुवा गाँव से होमकुण्ड तक की दूरी लगभग 280 किमी है। (नन्दादेवी राजजात, पार्वती जी का विदाई यात्रा स्थल है)। नन्दा जी विदाई यात्रा में चार सिंगों वाला मेढ़ा (बकरा) आगे-आगे चलता है।
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