उत्तराखण्ड में पंचायत व्यवस्था
उत्तराखण्ड राज्य की प्रशासनिक और ग्रामीण व्यवस्था को गहराई से समझने के लिए "उत्तराखण्ड में पंचायती राज व्यवस्था" एक बेहद महत्वपूर्ण और स्कोरिंग विषय है। आगामी UKPSC, UKSSSC, उत्तराखण्ड पुलिस, पटवारी और फॉरेस्ट गार्ड जैसी सभी प्रमुख राज्य स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं में इस टॉपिक से निश्चित रूप से प्रश्न पूछे जाते हैं। यह सटीक और संक्षिप्त जानकारी आपकी परीक्षा की तैयारी को एक मजबूत आधार प्रदान करेगी!
इस लेख में आप क्या-क्या पढ़ेंगे:
- उत्तराखण्ड में पंचायती राज व्यवस्था का ऐतिहासिक सफर और 4 अप्रैल, 2016 को लागू हुए राज्य के पहले पंचायती राज अधिनियम से जुड़े सबसे महत्वपूर्ण तथ्य।
- राज्य में लागू त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था (जिला पंचायत, क्षेत्र पंचायत और ग्राम पंचायत) की सम्पूर्ण संरचना और उनके शीर्ष से लेकर निचले स्तर तक की कार्यप्रणाली।
- पर्वतीय और मैदानी क्षेत्रों के आधार पर पंचायतों के गठन हेतु जनसंख्या के मानक, सदस्यों की संख्या (न्यूनतम और अधिकतम) तथा चुनाव की प्रक्रिया।
- विभिन्न पंचायत स्तरों के सचिव (जैसे BDO, मुख्य विकास अधिकारी) की नियुक्ति तथा ग्राम पंचायतों के प्रमुख प्रशासनिक व वित्तीय अधिकारों की परीक्षापयोगी जानकारी।
15 अगस्त, 1947 को राज्य में पंचायती राज व्यवस्था सर्वप्रथम संयुक्त प्रान्त पंचायती राज अधिनियम, 1947 द्वारा लागू की गई।
वर्ष 1961 से इस व्यवस्था को त्रिस्तरीय स्तर पर लागू किया गया।
22 अप्रैल, 1994 को 73वें संविधान संशोधन के अनुक्रम में इसे संवैधानिक निकाय के रूप में लागू किया गया।
राज्य के गठन के पश्चात् वर्ष 2002-03 में प्रथम निर्वाचित सरकार ने पंचायती राज व्यवस्था में कुछ परिवर्तन कर इसे त्रिस्तरीय बनाए रखने का निर्णय लिया।
मुख्यमन्त्री भुवनचन्द्र खण्डूरी (2007-09) के कार्यकाल में पंचायत अधिनियम में संशोधन हुआ था।
उत्तराखण्ड ने अपना पहला पंचायती राज अधिनियम 4 अप्रैल, 2016 को लागू किया।
राज्य सरकार ने पंचायती राज संस्थाओं के सुदृढ़ीकरण एवं विकास कार्यों के प्रभावी अनुश्रवण हेतु पंचायती राज निदेशालय एवं जिला पंचायत अनुश्रवण प्रकोष्ठ का गठन किया है।
राज्य में त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था लागू है, जो क्रमशः जिला पंचायत, क्षेत्र पंचायत एवं ग्राम पंचायत है।
जिला पंचायत
- स्तर - शीर्षस्थ निकाय
- जिला पंचायत सदस्यों का चुनाव वयस्क मताधिकार (18 वर्ष) द्वारा होता है।
- पर्वतीय क्षेत्रों में 24,000 तक की जनसंख्या में न्यूनतम 2 प्रादेशिक क्षेत्र होंगे एवं मैदानी क्षेत्रों में 50,000 तक की जनसंख्या में 2 प्रादेशिक क्षेत्र होंगे।
- जिला पंचायत का सचिव पंचायती राज अधिकारी या मुख्य विकास अधिकारी होता है।
क्षेत्र पंचायत
- स्तर - मध्यस्तरीय निकाय
- क्षेत्र पंचायत के निर्वाचित सदस्यों की अधिकतम संख्या 40 होती है, जबकि न्यूनतम संख्या 20 हो सकती है। पर्वतीय क्षेत्रों में 25,000 की जनसंख्या पर तथा मैदानी क्षेत्रों में 50,000 की जनसंख्या पर क्रमश: 20-20 सदस्य होते हैं।
- क्षेत्र पंचायत में ब्लॉक विकास अधिकारी (Block Development Officer, BDO) सचिव के रूप में कार्य करता है।
ग्राम पंचायत
- स्तर - सबसे निचला स्तर
- ग्राम पंचायत का प्रशासनिक अधिकारी सचिव होता है।
- ग्राम पंचायत के गठन हेतु पर्वतीय क्षेत्रों में कम-से-कम 500 व मैदानी क्षेत्रों में कम-से-कम 1,000 और अधिकतम 10,000 तक आबादी होनी चाहिए।
- ग्राम पंचायत सदस्यों की न्यूनतम संख्या 5 व अधिकतम संख्या 15 हो सकती है।
- ग्राम पंचायत का अध्यक्ष ग्राम प्रधान कहलाता है, जिसका चुनाव प्रत्यक्ष मतदान द्वारा होता है।
- एक या एक से अधिक गाँवों के पंजीकृत मतदाताओं को मिलाकर ग्राम पंचायत का गठन किया जाता है। ग्राम पंचायत को ग्राम सभा भी कहा जाता है।
- स्थानीय मेले या हाट से शुल्क वसूल करना, सिंचाई एवं पेयजल प्रबन्धन करना व शुल्क वसूल करना ग्राम पंचायतों के क्षेत्राधिकार में होता है।
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