उत्तराखण्ड में प्रमुख प्राकृतिक आपदाएँ

उत्तराखण्ड में प्रमुख प्राकृतिक आपदाएँ

उत्तराखण्ड एक अत्यंत संवेदनशील हिमालयी राज्य है, जहाँ प्राकृतिक और मानव जनित आपदाएँ एक प्रमुख भौगोलिक और पर्यावरणीय चुनौती रही हैं। परीक्षा की दृष्टि से यह एक बेहद स्कोरिंग और अनिवार्य विषय है। यह टॉपिक UKPSC, UKSSSC, Uttarakhand Police, Patwari, Forest Guard आदि सभी उत्तराखण्ड राज्य की प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण है।
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इस लेख में आप क्या-क्या पढ़ेंगे:
  • प्रमुख प्राकृतिक आपदाएँ और भूकम्प जोन: अतिवृष्टि (बादल फटना), हिमस्खलन, वनाग्नि के कारण और उत्तराखण्ड के संवेदनशील भूकम्पीय जोन (जोन-4 और 5) व केन्द्रीय भ्रंश रेखा से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य।
  • ऐतिहासिक भूस्खलन और केदारनाथ तबाही: 1880 के नैनीताल भूस्खलन, मालपा आपदा और 2013 की विनाशकारी केदारनाथ आपदा के मुख्य कारण। साथ ही 'ऑपरेशन सूर्या होप' और 'ऑपरेशन राहत' जैसे रेस्क्यू अभियानों की जानकारी।
  • आपदाओं के मानवीय कारण और समाधान: अंधाधुंध शहरीकरण, अवैध खनन, बाँध निर्माण और पर्यटन के कारण बढ़ते खतरे, तथा इन आपदाओं को नियंत्रित करने और हिमालयी पारिस्थितिकी को बचाने के प्रभावी उपाय।
भूकम्प, भूस्खलन, अतिवृष्टि, वनाग्नि, बाढ़ आदि राज्य की प्रमुख आपदाएँ हैं। राज्य में आने वाली आपदाओं के मुख्य कारण प्राकृतिक व मानव जनित होते हैं।

अतिवृष्टि

  • अतिवृष्टि का अर्थ अचानक अत्यधिक वर्षा का होना है।
  • इसे बादलों का फटना भी कहा जाता है।
  • अतिवृष्टि के कारण उत्तराखण्ड में प्रत्येक वर्ष जन-धन की क्षति होती है। इससे बाढ़ तथा भूस्खलन आने की सम्भावना बढ़ जाती है।

हिमखण्डों का गिरना

राज्य के ऊँचाई वाले क्षेत्रों में शीत ऋतु में पहाड़ों से हिमखण्डों के लुढ़कने व गिरने की घटनाएँ होती हैं।
ये हिमखण्ड सामान्यतया ढलान या घाटियों में गिरते हैं, जिससे जन-धन की हानि होती है।

बाढ़

  • राज्य में पहाड़ी क्षेत्रों से बहने वाली नदियों के अत्यधिक ढालयुक्त होने के कारण यहाँ बाढ़ आने की सम्भावना कम होती है, परन्तु कभी-कभी अत्यधिक वर्षा या भूस्खलन के कारण नदी मार्ग के अवरुद्ध होने, बाँधों के टूटने तथा बादल फटने जैसी घटनाओं के परिणामस्वरूप बाढ़ जैसी आपदा का सामना करना पड़ता है।
  • भूस्खलन के कारण मार्गों के अवरुद्ध हो जाने से किच्छा, सितारगंज, रुद्रपुर जैसे मैदानी क्षेत्रों में भी बाढ़ की सम्भावना बढ़ जाती है।

वनाग्नि

  • वनों में प्राकृतिक (पत्थरों का आपसी घर्षण) या मानवीय कारणों (जलती माचिस की तीली अथवा कृषकों द्वारा खेत के अवशेष जलाने से) से लगी आग को वनाग्नि कहा जाता है।
  • राज्य में लगभग 45.44% भू-भाग वनों से आच्छादित है।
  • वनों में आग लगने से अनेक बस्तियाँ इसकी चपेट में आ जाती हैं।

भूकम्प

  • भूकम्प एक प्राकृतिक आपदा है। भारत के 5 भूकम्पीय जोन में से 2 जोन (संवेदनशील जोन-4 तथा 5) उत्तराखण्ड में हैं।
  • राज्य में भूकम्प के सर्वाधिक प्रभाव का कारण प्लेटों की गतिशीलता व भ्रंशों की उपस्थिति का पाया जाना है।
  • संवेदनशील जोन-4 के अन्तर्गत राज्य के देहरादून, टिहरी, उत्तरकाशी, नैनीताल, उधमसिंह नगर आदि जिले आते हैं।
  • अतिसंवेदनशील जोन-5 के अन्तर्गत राज्य के चमोली, रुद्रप्रयाग, अल्मोड़ा, बागेश्वर, पिथौरागढ़ तथा चम्पावत जिले आते हैं।
  • भूकम्प की दृष्टि से अतिसंवेदनशील जिले चमोली एवं रुद्रप्रयाग हैं।

भूकम्प क्षेत्र

क्षेत्र रिक्टर स्केल तीव्रता
न्यूनतम प्रभाव क्षेत्र 5 से कम तीव्रता
न्यून प्रभाव क्षेत्र 5.01 से 6 तीव्रता
मध्यम प्रभाव क्षेत्र 6.01 से 7 तीव्रता
अधिक प्रभाव क्षेत्र 7.01 से 9 तीव्रता
अधिकतम प्रभाव क्षेत्र 9 से अधिक तीव्रता

नोट- राज्य में भूकम्प की तीव्रता मापने के लिए भूकम्पमापी स्टेशन टिहरी, देहरादून तथा गरुड़गंगा में स्थापित किए गए हैं।

केन्द्रीय भ्रंश रेखा

वृहद् हिमालय तथा मध्य हिमालय के मध्य मुख्य केन्द्रीय भ्रंश रेखा स्थित है। यह चमोली, गोपेश्वर, देवलधार, पीपलकोटी, गुलाब गोटी तथा गंगा घाटी से गुजरती हुई कुमाऊँ के कई स्थानों से होते हुए नेपाल की ओर चली जाती है। वैज्ञानिकों के अनुसार केन्द्रीय भ्रंश रेखा टिहरी बाँध से होकर जाती है, इस कारण बाँध का विरोध भी हुआ था।

उत्तराखण्ड में आए मुख्य भूकम्प

समय स्थान रिक्टर स्केल तीव्रता
22 मई, 1803 उत्तरकाशी 6.0
1 सितम्बर, 1803 बद्रीनाथ 9.0
मार्च, 1809 गढ़वाल 8.0
28 मई, 1816 गंगोत्री 7.0
11 अप्रैल, 1843 चमोली 5
14 फरवरी, 1851 नैनीताल 5
22 मई, 1871 लण्ढौर 6
28 अक्टूबर, 1916 धारचूला 7.5
2 अक्टूबर, 1937 देहरादून 8.0
4 जून, 1945 अल्मोड़ा 6.5
28 दिसम्बर, 1958 धारचूला/चमोली 6.25
27 जुलाई, 1966 कपकोट 6.3
28 अगस्त, 1968 धारचूला 7.0
20 अक्टूबर, 1991 उत्तरकाशी 6.6
29 मार्च, 1999 चमोली 6.8
14 दिसम्बर, 2005 सम्पूर्ण उत्तराखण्ड 5.2
23 जुलाई, 2007 सम्पूर्ण उत्तराखण्ड 5.0
7 जुलाई, 2010 पिथौरागढ़ 5.1
6 नवम्बर, 2017 तोलियों-रुद्रप्रयाग 5.5

भूस्खलन

उत्तराखण्ड में सबसे बड़ी प्राकृतिक आपदा भूस्खलन है।
नैनीताल में सर्वप्रथम भूस्खलन की घटना 1866-67 ई. में अल्मा पहाड़ी पर हुई थी। 18 सितम्बर, 1880 को नैनीताल में सबसे बड़ा भूस्खलन हुआ था, जिसमें 151 लोग दबकर मर गए थे।
  • उत्तराखण्ड में बेलाकुची आपदा 20 जुलाई, 1970 को आई थी, जब अलकनन्दा नदी के उफान से चमोली जिले में भारी तबाही हुई थी। इसके कारण चमोली जिले के सरकारी भवन नदी के कटाव से बह गए थे, जिसके बाद जिला मुख्यालय चमोली से गोपेश्वर स्थानान्तरित कर दिया गया था।
18 अगस्त, 1998 को मापला भूस्खलन पिथौरागढ़ में हुआ था।
ऑपरेशन ब्लू एंजल, मापला भूस्खलन में राहत अभियान के लिए चलाया गया था।
27 जुलाई, 2024 को टिहरी के बूढ़ाकेदार के तिनगढ गाँव में भूस्खलन से लगभग 15 मकान मलबे में दब गए परन्तु जनहानि नहीं हुई।

केदारनाथ आपदा

  • 16-17 जून, 2013 को केदारनाथ में राज्य की सबसे बड़ी प्राकृतिक आपदा आई थी। चौराबाड़ी ग्लेशियर की ऊपरी परत विखण्डित होकर गाँधी सरोवर में गिरने से मन्दाकिनी नदी का प्रवाह क्षेत्र 5 किमी बढ़ गया था, जो आपदा का मुख्य कारण था।
  • इससे बचाव हेतु जून, 2013 में ऑपरेशन सूर्या होप चलाया गया था। इसके अन्तर्गत स्थानीय नागरिक योगेन्द्र राणा ने सेना की सहायता की थी।
  • इस ऑपरेशन में थल सेना, वायु सेना, इन्डो-तिब्बत बॉर्डर पुलिस, नेशनल डिजास्टर रिस्पॉन्स फोर्स तथा सीमा सड़क संगठन ने भाग लिया था।
  • केदारनाथ में ऑपरेशन राहत भारतीय वायु सेना द्वारा चलाया गया था।
  • आधिकारिक तौर पर 11 मार्च, 2014 को केदारनाथ पुनर्निर्माण कार्य नेहरू पर्वतारोहण संस्थान को सौंपा गया।
  • कर्नल अजय कोठियाल ने आपदाग्रस्त केदारनाथ के पुनर्निर्माण में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया था।

उत्तराखण्ड के अन्य प्रमुख भूस्खलन प्रभावित क्षेत्र

समय भूस्खलन प्रभावित क्षेत्र
23 जून, 1980 ज्ञानसू (उत्तरकाशी)
11 अगस्त, 1998 ऊखीमठ भूस्खलन
वर्ष 2001 ब्योमगाड़-भड़ासू भूस्खलन
वर्ष 2002 बूढ़ाकेदार टिहरी (टिहरी)
अगस्त, 2004 टिहरी बाँध भूस्खलन
अगस्त, 2009 मुनस्यारी भूस्खलन (पिथौरागढ़)
अगस्त, 2010 कपकोट भूस्खलन

आपदाओं के मानवीय कारण

मानवकृत आपदा के कारणों को निम्नलिखित वर्गों में विभाजित किया जा सकता है-

शहरीकरण का प्रसार
बढ़ती जनसंख्या के कारण लोग अब शहरों में निवास करने लगे हैं, जिससे राज्य में शहरीकरण का प्रसार हो रहा है।
2011 की जनगणना के अनुसार राज्य में शहरी आबादी की संख्या लगभग 30% हो गई है।
शहरीकरण के कारण प्रदेश में पहाड़ों को तोड़कर व वनों को काटकर सड़क व आवास बनाए जा रहे हैं, जो आपदाओं को बढ़ावा दे रहे हैं।

वन ह्रास एवं जलीय तन्त्र में बदलाव
  • वर्ष 1981-2011 के दौरान 5.85% प्राकृतिक वन नष्ट हो चुके हैं।
  • राज्य में मानवीय गतिविधियों के कारण 30-40% प्राकृतिक झरने पूर्ण रूप से सूख गए हैं।
  • इस कारण पिछले तीन दशकों के दौरान 15 से 17% भूस्खलन तथा बाढ़ की घटनाओं में वृद्धि हुई है।
  • वर्ष 1981-2011 के दौरान जल बहाव में 11%, जबकि सिंचाई की क्षमता में 15% की कमी हुई है।
  • विगत 100 वर्षों के दौरान भीमताल और नैनीताल जैसी झीलों की जल क्षमता कम हो चुकी है।

नदियों पर बाँध एवं बिजली संयन्त्रों का निर्माण
  • बाँधों एवं बिजली संयन्त्रों के अधिक निर्माण से जल, जैव तथा जमीन का सन्तुलन बिगड़ गया है।
  • राज्य की गंगा और इसकी सहायक नदियों मन्दाकिनी, भागीरथी तथा अलकनन्दा पर अनेक बाँध व पनबिजली परियोजनाएँ निर्मित हैं, जो कभी-कभी आपदा का कारण बन जाती हैं।

गैर-शोधित सीवेज
गैर-शोधित सीवेज सीधे नदी में छोड़े जाने के कारण नदी का जल प्रदूषित होता है एवं किनारे ऊपर उठ जाते हैं।

अवैध खनन
  • राज्य में नदियों के किनारों पर पत्थरों का अवैध खनन तेजी से बढ़ रहा है।
  • राज्य में विधि के अनुसार चुगान या हाथ से ही पत्थर उठाने की अनुमति है, लेकिन मशीन द्वारा अवैध रूप से अत्यधिक खनन होने के कारण भूस्खलन की सम्भावनाएँ बढ़ गई हैं।

पर्यटन तथा तीर्थाटन
राज्य में अनेक पर्यटन स्थल हैं, जिनको देखने के लिए प्रत्येक वर्ष भारी संख्या में पर्यटक तीर्थाटन के लिए आते हैं।
इन पर्यटकों के लिए प्रदेश में अवैध रूप से अनेक निर्माण किए गए हैं, जिससे वहाँ के पारिस्थितिकीय तन्त्र को नुकसान पहुँच रहा है।

आपदाओं को नियन्त्रित करने हेतु समाधान

  • हिमालय क्षेत्र के वानस्पतिक तन्त्र में छेड़छाड़ किए बिना विकास का मार्ग तय करना होगा।
  • विस्फोटकों के प्रयोग से भूस्खलन की सम्भावना बढ़ जाती है। अतः परियोजनाओं की नए सिरे से समीक्षा किए जाने की आवश्यकता है।
  • राज्य में प्राकृतिक पर्यटन की अवधारणा पर फिर से विचार करना होगा।
  • इस क्षेत्र के विकास हेतु नीति बनाते समय हमें क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधनों-जंगल, जल और जैव-विविधताओं का ध्यान रखना होगा।
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Kartik Budholiya

Kartik Budholiya

उत्तराखंड की ऐतिहासिक विरासत, भूगोल, नदी प्रणालियों और सामान्य ज्ञान के विशेषज्ञ Kartik Budholiya छात्रों को UKPSC, UKSSSC, Uttarakhand Police, Patwari, Forest Guard और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता दिलाने के लिए निरंतर शोध-परक कंटेंट साझा करते हैं।