उत्तराखण्ड के लोकनृत्य

उत्तराखण्ड के लोकनृत्य

उत्तराखण्ड की समृद्ध संस्कृति को दर्शाने वाले यहाँ के लोकनृत्य परीक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण विषय हैं। यदि आप UKPSC, UKSSSC, उत्तराखण्ड पुलिस, पटवारी या फॉरेस्ट गार्ड जैसी किसी भी राज्य स्तरीय प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं, तो इस टॉपिक से निश्चित ही प्रश्न पूछे जाते हैं। आइए, इन महत्वपूर्ण नृत्यों को जानकर अपनी तैयारी को और अधिक मजबूत बनाएं!
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इस लेख में आप क्या-क्या पढ़ेंगे:
  • धार्मिक और युद्ध नृत्य शैलियां: रम्माण, नागराज, छोलिया, रणभूत और पौणा जैसे प्रसिद्ध नृत्यों के पीछे की ऐतिहासिक और धार्मिक मान्यताएं क्या हैं।
  • विभिन्न क्षेत्रों के प्रमुख लोकनृत्य: गढ़वाल, कुमाऊँ और जौनसार क्षेत्र में किए जाने वाले थड़िया, हारुल, झुमैलो और बैर नृत्य की सम्पूर्ण विशेषताएँ।
  • अद्वितीय और विशेष नृत्य: असम के बिहू व गुजरात के गरबा के समान 'चौंफला नृत्य' का महत्व, जिसमें किसी वाद्ययंत्र का प्रयोग नहीं होता, और पांडवों के जीवन पर आधारित पाण्डव नृत्य।
  • परीक्षा उपयोगी महत्वपूर्ण तथ्य: कौन सा नृत्य किस विशेष अवसर पर, किन वाद्ययंत्रों (जैसे हुड़का, रामतुला, ढोल) के साथ और किन लोगों द्वारा किया जाता है।

उत्तराखण्ड राज्य में प्रचलित प्रमुख लोकनृत्य निम्न प्रकार हैं-

धार्मिक नृत्य

  • नागराज नृत्य : डौंर थाली का प्रयोग कम्पन्न उत्पन्न करने के लिए किया जाता है। श्रीकृष्ण के रूप में नागराजा की पूजा गढ़वाल और कुमाऊँ क्षेत्र में की जाती है।
  • निरंकार नृत्य : भगवान शिव के रूप में पैयां वृक्ष की पूजा है।
  • नरसिंह नृत्य : गुरु गोरखनाथ के शिष्य की पूजा की जाती है। नृत्य में औतरू रूप में पश्वा आते हैं। इसके अन्तर्गत दूधिया नरसिंह नृत्य कोमल रूप नृत्य है।
  • महाकाली देवी नृत्य : इसकी प्रमुख विशेषता तांडव शैली है।
  • रम्माण नृत्य : इसमें लकड़ी के मुखौटे लगाकर रामायण पर आधारित लोकनाट्य प्रस्तुत किया जाता है।

युद्ध नृत्य शैली

  • पौणा नृत्य : भोटिया जनजाति के द्वारा शादी-विवाह तथा मांगलिक अवसर पर किया जाता है।
  • रणभूत नृत्य : गढ़वाल क्षेत्र युद्ध में वीरगति को प्राप्त लोगों को देवताओं के समान सम्मान प्राप्त होता है। इसे देवता घिराना के नाम से भी जाना जाता है। शहीदों की स्मृति में इस नृत्य का आयोजन होता है।
  • छोलिया नृत्य : कुमाऊँ क्षेत्र में किरजीं कुम्भ मेले में यह प्रसिद्ध युद्ध नृत्य धार्मिक आयोजन के रूप में किया जाता है। यह तलवार और ढाल के साथ किया जाने वाला नृत्य है। इस नृत्य में गीत नहीं गाया जाता। पाण्डव, नरसिंह एवं नागराज लीला इस नृत्य से सम्बन्धित हैं।

अन्य प्रमुख नृत्य


सरौं नृत्य
  • गढ़वाल के टिहरी व उत्तरकाशी जिले में
  • वाद्ययन्त्र के रूप में - ढोल का प्रयोग
  • इस नृत्य के प्रथम चरण में - ढोल-ढोली जोड़े के करतब
  • दूसरे चरण में - तलवार की ढाल पर स्वांग
  • यह नृत्य शादी-विवाह के अवसर पर प्रमुख रूप से किया जाता है।

थड़िया नृत्य
  • गढ़वाल क्षेत्र में - बसन्त पंचमी से बिखोत संक्रान्ति (विषुवत संक्रान्ति) तक
  • इस नृत्य को - खुले मैदान में वे विवाहित लड़कियाँ करती हैं, जो पहली बार मायके आती हैं।
  • नृत्य गीत के रूप में - लास्य शैली का प्रयोग
  • विषयवस्तु सामाजिक तथा आध्यात्मिक

हारुल नृत्य
  • जौनसार क्षेत्र में प्रसिद्ध
  • प्रयुक्त वाद्ययन्त्र - रामतुला वाद्ययन्त्र
  • विषयवस्तु - पाण्डवों के जीवन से सम्बन्धित

बुड़ियात नृत्य
यह शुभ अवसरों पर जौनसारी क्षेत्रों में किया जाता है।

लंगविर नृत्य
  • प्रसिद्ध नट नृत्य के रूप में
  • प्रमुख विशेषता - पुरुषों के द्वारा खम्भे पर चढ़कर नृत्य किया जाना

झुमैलो नृत्य
  • गढ़वाल क्षेत्र में
  • विशेषता- नवविवाहित कन्याओं के द्वारा मायके वापस आने पर

बैर नृत्य
  • नृत्य कुमाऊँ क्षेत्र में प्रसिद्ध है।
  • विशेषता नृत्य गीत को अधिकतर गायन-प्रतियोगिताओं में प्रदर्शित किया जाता है।

भगनौल नृत्य
  • आयोजन नृत्य मेलों के अवसर पर कुमाऊँ क्षेत्र में
  • वाद्ययन्त्र का प्रयोग हुड़का एवं नगाड़ा

पाण्डव नृत्य
  • आयोजन गढ़वाल क्षेत्र में
  • विषयवस्तु पाण्डवों का जीवन और नृत्य में चाड़ी के माध्यम से पाण्डव आपसी संवाद
  • नृत्य का माध्यम पण्डौं की चाड़ीगें
  • अन्य नाम - गैण्डी बध लोकनृत्य

सिपैया नृत्य
यह नृत्य देशभक्ति से सम्बन्धित है।

गूजर नृत्य
  • विशेषता- इसके अन्तर्गत बंजारा व नाटी नृत्य प्रमुखता से किए जाते हैं।
  • इस नृत्य को चार शैली के अन्तर्गत किया जाता है।
  • वाद्ययन्त्र - डफली व खजरी

रांसौ नृत्य
यह लोकनृत्य उत्तरकाशी जिले के टकनौर क्षेत्र से सम्बन्धित है।

तांदी नृत्य
यह लोकनृत्य गढ़वाल के रंवाई क्षेत्र में प्रसिद्ध है।

चाँचंरी नृत्य

  • विशेषता- यह नृत्य गढ़वाल क्षेत्र का एक श्रृंगारिक नृत्य है।
  • इसे स्त्री एवं पुरुष के द्वारा बसन्त ऋतु की चाँदनी रात में किया जाता है।
  • वाद्ययन्त्र - नृत्य में हुड़की नामक वाद्ययन्त्र का प्रयोग
  • अन्य नाम कुमाऊँ क्षेत्र में इस नृत्य को झोड़ा कहा जाता है, जिसे होली के बाद किया जाता है।

मण्डाण नृत्य

  • आयोजन टिहरी व उत्तरकाशी में
  • इसे चार तालों में किया जाता है।
  • अन्य नाम - केदार नृत्य
  • चाली या भौर के साथ नृत्य का आयोजन समाप्त होता है।

घुघती नृत्य
यह नृत्य नन्हें बालक-बालिकाओं के द्वारा गढ़वाल क्षेत्र में मनोरंजन के लिए किया जाता है।

चौंफला नृत्य

  • यह गढ़वाल क्षेत्र का श्रृंगार भाव प्रधान नृत्य है। इसमें किसी वाद्ययन्त्र का प्रयोग नहीं होता है।
  • इस नृत्य में पुरुष नर्तकों को चौंफला व स्त्री नर्तकी को चौंफलों कहा जाता है।
  • इसमें हाथों की ताली, पैरों की थाप, झांझ की झंकार, कंगन व पाजेब की सुमधुर ध्वनियों का प्रयोग किया जाता है।
  • यह नृत्य असम के बिहू, गुजरात के गरबा व मणिपुर के राँस नृत्य के समान है।
  • धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस नृत्य के माध्यम से ही देवी पार्वती ने शिव को प्रसन्न किया था। समूह 'ग' 2024
  • इस नृत्य की अन्य शैली खड़ा, चौंफला, मयूर चौंफला, लालुडी चौंफला हैं।
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Kartik Budholiya

Kartik Budholiya

उत्तराखंड की ऐतिहासिक विरासत, भूगोल, नदी प्रणालियों और सामान्य ज्ञान के विशेषज्ञ Kartik Budholiya छात्रों को UKPSC, UKSSSC, Uttarakhand Police, Patwari, Forest Guard और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता दिलाने के लिए निरंतर शोध-परक कंटेंट साझा करते हैं।