उत्तराखण्ड के प्रमुख लोकगीत
उत्तराखण्ड की समृद्ध संस्कृति और विरासत का सबसे खूबसूरत हिस्सा यहाँ के लोकगीत और लोकगाथाएँ हैं। परीक्षा की दृष्टि से यह विषय अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि UKPSC, UKSSSC, Uttarakhand Police, Patwari, Forest Guard जैसी राज्य की सभी प्रतियोगी परीक्षाओं में यहाँ से अक्सर सीधे प्रश्न पूछे जाते हैं। आइए, इस शानदार सारांश के माध्यम से अपने अंकों को पक्का करें!
इस लेख में आप क्या-क्या पढ़ेंगे:
- प्रेम और विरह के गीत: गढ़वाल और कुमाऊँ क्षेत्र में गाए जाने वाले प्रणय गीत (जैसे- चौंफला, झुमैलो) और मायके की याद में गाए जाने वाले मार्मिक विरह व ऋतु गीत (खुदेड़, चौमासा, बासन्ती)।
- नृत्य और संस्कार गीत: उत्तरायणी और माघ जैसे मेलों में गाए जाने वाले सामूहिक नृत्य गीत (चाँचरी, झोड़ा, बैर) तथा शुभ अवसरों पर गाए जाने वाले शकुनाखर और मांगल जैसे प्रमुख संस्कार गीत।
- पौराणिक लोकगाथाएँ और जागर: देवी-देवताओं के आह्वान के लिए गाए जाने वाले 'जागर' (पाण्डव, गंगनाथ जागर) और राज्य की प्रसिद्ध लौकिक गाथाओं (राजुला मालूशाही, जीतू बगड़वाल) का परीक्षापयोगी और विस्तृत विवरण।
उत्तराखण्ड के प्रमुख लोकगीतों का विवरण निम्न प्रकार है-
प्रेम गीत
- चौंफला गीत : यह प्रेम व मिलन का गीत है। यह स्त्री व पुरुष द्वारा सामूहिक रूप से गाया जाने वाला नृत्य प्रधान गीत है। इस गीत में रति, हास, अनुनय तथा मनहार चारों भावों का समावेश होता है।
- झुमैलो गीत : यह गढ़वाल क्षेत्र का प्रणय प्रसंग गीत है। इसमें नारी हृदय की वेदना और सौन्दर्य का वर्णन मिलता है।
- छोपती गीत : यह सामूहिक रूप से गाया जाने वाला श्रृंगार प्रधान गीत है। यह मुख्यतः रंवाई-जौनपुर क्षेत्र में अधिक प्रचलित है। इसमें हुड़का बजाने वाला गीत गाता है और अन्य व्यक्ति नाचते हैं।
- लामण एवं छपेली गीत : ये एक प्रकार के प्रणय गीत हैं।
ऋतु या विरह गीत
- बासन्ती गीत : वसन्त ऋतु के आगमन पर गढ़वाल क्षेत्र की किशोरियाँ घर के आँगन में देहली को सजाती हुई गाती हैं। देहलियों और द्वारों को सजाने के लिए किशोरियाँ फ्यूंली के फूलों को प्रयोग में लाती हैं।
- चौमासा गीत : यह एक विरह गीत है। यह गीत वर्षा ऋतु में गाया जाता है।
- बारामासा गीत : इस प्रकार के गीतों में गढ़वाली स्त्रियाँ बारह महीनों के लक्षणों का वर्णन करती हैं। ये गीत मुख्यतः मौसम, फूल तथा प्राकृतिक सौन्दर्य को वर्णित करते हैं।
खुदेड़ गीत यह एक विरह गीत है। यह गीत नवविवाहिताओं द्वारा ससुराल में मायके की याद में गाया जाता है। समूह 'ग' 2024
- सयना गीत : जौनसार में दीपावली के अवसर पर लड़कियाँ जब शादी के बाद पहली बार अपने घर आती हैं, तो सहेलियों के साथ सयना गीत गाती हैं।
- होरी गीत : यह गीत वसन्त के मौसम में होली के अवसर पर गाया जाता है।
- लाली गीत : राज्य में गाया जाने वाला यह गीत भी ऋतु या विरह का प्रमुख गीत माना जाता है।
नृत्य गीत
- चाँचरी (भौंनी) गीत : यह गीत उत्तरायणी मेले के अवसर पर गढ़वाल एवं कुमाऊँ क्षेत्र के मध्य गाया जाता है।
- झोड़ा गीत : यह एक समूह गीत है, जो कुमाऊँ क्षेत्र में माघ महीने में गाया जाता है।
- थड्या गीत : इस गीत में लोक नायकों की गाथाएँ प्रमुख रूप से गाई जाती हैं। यह एक सामूहिक नृत्य प्रधान गीत है, जिसे विलम्बित व मध्य लय में गाया जाता है।
- बैर गीत : कुमाऊँ क्षेत्र में प्रतियोगिता के रूप में आयोजित होने वाला यह तर्क प्रधान नृत्य गीत है। इसमें बैरिया (कुशाग्र बुद्धि वाला) गायन के माध्यम से अपना पक्ष रखता है।
संस्कार गीत
- सोगुना : यह जोहार के भोटिया लोगों का संस्कार गीत है।
- शकुनाखर व न्यूतणो : ये कुमाऊँ के प्रसिद्ध संस्कार गीत हैं।
- मांगल : गढ़वाल के प्रसिद्ध संस्कार गीत हैं, जिन्हें शगुन गीत के नाम से भी जाना जाता है।
अन्य प्रमुख गीत
| गीत | विवरण |
|---|---|
| पवाड़े और भड़ौ | गढ़वाल में पवाड़ा और कुमाऊँ में भड़ौ या कटकू वीरों के जीवन पर आधारित लोकगीत हैं। |
| भगनौल एवं न्यौली गीत | यह अनुभूति प्रधान गीत कुमाऊँ क्षेत्र में गाया जाता है। भगनौल गीत मेलों में हुड़के तथा नगाड़ों की धुन पर नृत्य करते हुए गाया जाता है। |
| कफुवा गीत | गढ़वाल में 'समेसुर देवता' के लिए यह गीत गाया जाता है। |
| कुलाचार विरुदावली गीत | यह गीत औजी तथा बद्दी जाति के लोग मांगलिक अवसरों पर अपने यजमान के घर गाते हैं। इन गीतों में यजमान और उनकी जाति वंश का गुणगान किया जाता है। |
| चूरा (छूड़ा) गीत | युवा चरवाहों को सीख देने के लिए बूढ़े चरवाहों द्वारा गाया जाता है। |
| ठुलखेल गीत | यह गीत भाद्रपद माह में कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर कुमाऊँ क्षेत्र में पुरुषों द्वारा गाया जाता है। इस गीत के मुख्य गायक को बखणनियाँ कहते हैं। ये गीत रामायण कथा पर आधारित होते हैं। |
| छपेली गीत | यह गीत मेला एवं विवाह आदि उत्सवों पर गाया जाता है। |
| हुड़की बोल गीत | ये गीत कृषि से सम्बन्धित हैं तथा कुमाऊँ में प्रचलित हैं। इस गीत को कृषक हुड़के (वाद्ययन्त्र) के साथ खेतों में श्रम करते हुए गाते हैं। |
| पट गीत | इन्हें उपदेशों के कारण उपदेशात्मक गीत भी कहा जाता है। |
| दूड़ा गीत | यह गीत स्वयंप्रथा के रूप में गाया जाता है। |
| बाजूबन्द नृत्य गीत | यह विवाह से सम्बन्धित गीत है जो पेड़ के नीचे बैठकर गाया जाता है। यह रवांई-जौनपुर क्षेत्र में गाया जाने वाला प्रणय संवाद नृत्य गीत है। इसे दूड़ा नृत्य गीत भी कहते हैं। |
| भान्टा-सान्टा | यह एक मनोरंजनात्मक गीत है। |
| संदेई गीत | गढ़वाल में यह गीत भाई-बहन के प्रेम से सम्बन्धित है। |
प्रमुख लोकगाथाएँ
- पौराणिक लोकगाथाओं को राज्य में जागर के नाम से जानते हैं।
- जागर क्षेत्रीय देवी-देवताओं के गीत होते हैं। इनमें विभिन्न सम्प्रदायों (नाथ, वज्रयानी, सिद्ध तथा बौद्ध) का प्रभाव भी मिलता है।
- इन्हें देवताओं, पौराणिक व्यक्तियों के आह्वान अथवा सम्मान में गाया जाता है।
- इसमें डमरू-थाली, हुड़की, ढोल-दमामा आदि वाद्ययन्त्र का प्रयोग किया जाता है।
- पाण्डव जागर, गंगनाथ जागर, भैरवनाथ जागर प्रमुख गीत हैं।
- राजुला मालूशाही व जीतू बगड़वाल गीत कुमाऊँ एवं गढ़वाल में प्रसिद्ध लौकिक लोकगाथाएँ हैं। इन्हें पंवाड़े भी कहा जाता है।
- चन्द्र शासक त्रिमलचन्द व भारतीचन्द के पंवाड़े कुमाऊँ में प्रसिद्ध हैं।
- रामी-बौराणी यह लोकगाथा गढ़वाल में प्रसिद्ध है।
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