उत्तराखण्ड में कृषि

उत्तराखण्ड में कृषि

दोस्तों, उत्तराखण्ड की अर्थव्यवस्था और भौगोलिक संरचना को गहराई से समझने के लिए 'उत्तराखण्ड में कृषि' (Agriculture in Uttarakhand) एक बेहद महत्वपूर्ण टॉपिक है। यदि आप UKPSC, UKSSSC, Uttarakhand Police, Patwari, Forest Guard या अन्य किसी भी राज्य स्तरीय परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं, तो निश्चित रहें कि इस विषय से हर बार परीक्षा में कई प्रश्न पूछे जाते हैं। अपनी तैयारी को धार देने के लिए आइए इसके मुख्य तथ्यों को जानते हैं।
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इस लेख में आप क्या-क्या पढ़ेंगे:
  • उत्तराखण्ड की कृषि भूमि का स्वरूप: राज्य में कृषि योग्य भूमि के प्रकार (तलाऊँ, उपराऊँ व इजरान) तथा सर्वाधिक और न्यूनतम कृषि व ऊसर भूमि वाले जिलों के महत्वपूर्ण आंकड़े।
  • प्रमुख फसलें एवं GI टैग: राज्य की मुख्य खाद्यान्न फसलें (गेहूँ, धान, मण्डुआ) और वर्ष 2023 में किन विशेष पर्वतीय उत्पादों (लाल चावल, गहत दाल, बेरीनाग चाय आदि) को प्रतिष्ठित GI टैग प्रदान किया गया है।
  • बागवानी व उभरता स्वरोजगार: राज्य में सेब व चाय की खेती का इतिहास और मशरूम उत्पादन जैसे स्वरोजगार के बेहतरीन विकल्पों की विस्तृत जानकारी।
  • कृषि नीतियां और योजनाएं: उत्तराखण्ड कृषि नीति 2018 के मुख्य बिंदु, जैविक कृषि एक्ट बनाने वाले प्रथम राज्य की उपलब्धि और प्रमुख मेगा फूड पार्क्स से जुड़े परीक्षा उपयोगी तथ्य।
उत्तराखण्ड एक कृषि प्रधान राज्य है। राज्य की लगभग 69.77% से अधिक जनसंख्या गाँवों में निवास करती है, जिसका मुख्य व्यवसाय कृषि पर आधारित है। राज्य का मैदानी भाग कृषि हेतु उपयुक्त है।
राज्य के कुल क्षेत्रफल के लगभग 12.5% भाग पर कृषि की जाती है।
राज्य के सर्वाधिक एवं न्यूनतम शुद्ध बोए भूमि क्षेत्रफल वाले जिले ऊधमसिंह नगर एवं चम्पावत हैं।
सर्वाधिक एवं न्यूनतम ऊसर भूमि वाले जिले चमोली एवं नैनीताल हैं।
सबसे अधिक चरागाह भूमि का क्षेत्रफल चमोली में है।
सर्वाधिक एवं न्यूनतम परती भूमि का क्षेत्रफल पौड़ी एवं रुद्रप्रयाग में है।

उत्तराखण्ड में कृषि भूमि के प्रकार

सिंचाई की उपलब्धता की दृष्टि से राज्य में तीन प्रकार की कृषि भूमि मिलती है- तलाऊँ, उपराऊँ व इजरान।

कृषि भूमि के प्रकार

भूमि का प्रकार विवरण
तलाऊँ भूमि
  • घाटी के तलों में पाई जाती है, जहाँ सिंचाई की सर्वोत्तम व्यवस्था होती है।
  • उपराऊँ भूमि से तीन गुना उपजाऊ
उपराऊँ भूमि
  • यह असिंचित भूमि ऊपरी भागों में मिलती है।
  • प्रकार-उपराऊँ अव्वल (उपराऊँ दोयम से 1.5 गुना उपजाऊ), उपराऊँ दोयम
इजरान भूमि
  • वनों के बीच या किनारे की अपरिपक्व पथरीली भूमि
  • पर्वतीय क्षेत्रों में गाँवों के निकट की भूमि घरया, मध्य की विचलया तथा वनों से लगी भूमि बुण्या कहलाती है।

उत्तराखण्ड में कृषि के प्रकार

कृषि का प्रकार विवरण
समोच्चरेखीय कृषि यह कृषि पहाड़ी ढालों के विपरीत कण्टूर रेखा (ऊँचाई) के अलग-अलग बिन्दुओं को मिलाने वाली काल्पनिक रेखा पर की जाती है।
सीढ़ीदार कृषि यह कृषि पर्वतीय ढालों को सीढ़ियों में परिवर्तित कर अधिक ढाल वाली भूमि पर, आड़ी जुताई द्वारा की जाती है। पर्वतीय क्षेत्रों में 15% तक ढालू भूमि बनाई जा सकती है।
स्थानान्तरणशील कृषि इसमें कृषि करने के लिए वनों को काटकर और वनस्पतियों को जलाकर भूमि साफ की जाती है। इसे झूम (झूमिंग) कृषि भी कहते हैं। यह मुख्यतः आदिम जनजातियों द्वारा की जाती है।

उत्तराखण्ड की प्रमुख फसलें

  • उत्तराखण्ड में बोई जाने वाली फसलों में मुख्य फसल गेहूँ, धान, मण्डुआ, आलू इत्यादि हैं। मण्डुआ (मड़वा) व झंगोरा राज्य के लघु मोटे अनाज हैं।
  • राज्य में गढ़वाल मण्डल की अपेक्षा कुमाऊँ मण्डल में अधिक कृषि की जाती है।
  • उत्तराखण्ड की मण्डुआ, झंगोरा, गहत दाल, लाल चावल, चौलाई (रामदाना) व पहाड़ी तूर दाल फसलों को वर्ष 2023 में जीआई टैग प्राप्त हुआ है।

राज्य की प्रमुख फसलों का वर्णन निम्न प्रकार है-

गेहूँ

  • उत्पादक जिले देहरादून, उधमसिंह नगर, हरिद्वार, पौड़ी, नैनीताल
  • यह राज्य की सबसे महत्त्वपूर्ण फसल है।
  • आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 के अनुसार, कुल बोये गए क्षेत्रफल के 29% भाग पर गेहूँ उत्पादित किया जाता है।
  • नैनीताल के अतिरिक्त यह फसल सभी जिलों की प्रथम क्रम की फसल है।

चावल

  • प्रमुख उत्पादक जिले - देहरादून, उधमसिंह नगर, हरिद्वार, नैनीताल, टिहरी, पौड़ी, बागेश्वर
  • आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 के अनुसार कुल बोये गए क्षेत्रफल के 27% भाग पर चावल उत्पादित होता है।
  • नैनीताल की प्रथम क्रम की फसल, अन्य सभी जिलों में द्वितीय क्रम की फसल है।
  • रवांई घाटी (उत्तरकाशी) लाल चावल के लिए प्रसिद्ध है।
  • उधमसिंह नगर में सर्वाधिक चावल की मिलें हैं।

मण्डुआ (कोदा)

प्रमुख उत्पादक जिले - अल्मोड़ा, नैनीताल, बागेश्वर
जापान को निर्यात किया जाता है।

उत्तराखण्ड की अन्य प्रमुख फसलें

फसल विवरण
मक्का प्रमुख उत्पादक जिले देहरादून एवं पिथौरागढ़
कुल बोये गए क्षेत्रफल के 2% भाग पर उत्पादन
झंगोरा वर्षा आधारित क्षेत्रों में उगाई जाने वाली घरेलू बाजरे की फसल
जौ गढ़वाल मण्डल में सर्वाधिक खेती
उत्पादक जिले देहरादून, चमोली, उत्तरकाशी, टिहरी, पौड़ी, अल्मोड़ा व नैनीताल
सरसों उत्पादक जिले अल्मोड़ा, नैनीताल, उधमसिंह नगर, हरिद्वार, देहरादून, पौड़ी, चमोली

गन्ना

  • सबसे अधिक उत्पादन - उधमसिंह नगर
  • उपयुक्त मृदा - तराई की दलदली मृदा
  • राज्य की तीसरी प्रमुख नकदी फसल - गन्ना
  • उत्पादक भाबर एवं तराई क्षेत्र के चार जिलों (उधमसिंह नगर, नैनीताल, हरिद्वार तथा देहरादून) में 40% कृषि भूमि पर गन्ने की खेती की जाती है।

दालें

  • रबी दलहन - मटर, मसूर, चना
  • खरीफ दलहन - अरहर, गहत (कुल्थी), उड़द, लोबिया व सोयाबीन
  • प्रमुख दाल उत्पादक जिले - नैनीताल, देहरादून, उत्तरकाशी, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, टिहरी व चमोली
  • आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 के अनुसार कुल बोये गए क्षेत्रफल के 6% भाग पर दालों का उत्पादन किया जाता है।
  • गहत शुष्क क्षेत्रों की महत्त्वपूर्ण दाल है।
  • हर्षिल क्षेत्र (उत्तरकाशी) पतले छिलके वाले राजमा के लिए प्रसिद्ध है।
नोट- शैवाल की खेती के लिए उत्तराखण्ड सरकार ने इजरायली कम्पनी से समझौता किया है।

राज्य की अन्य प्रमुख खाद्यान्न फसलें एवं उत्पादक क्षेत्र

प्रमुख फसल सर्वाधिक उत्पादक जिले
साँवा पिथौरागढ़, अल्मोड़ा, नैनीताल, देहरादून, हरिद्वार
मसूर पिथौरागढ़, नैनीताल, चमोली
चना नैनीताल, अल्मोड़ा, देहरादून आदि
उड़द अल्मोड़ा, देहरादून, हरिद्वार, उधमसिंह नगर
मटर नैनीताल, अल्मोड़ा, टिहरी, उत्तरकाशी
सोयाबीन नैनीताल, पिथौरागढ़, अल्मोड़ा, चमोली, उत्तरकाशी
काली सोयाबीन
(काला भट्ट)
कुमाऊँ क्षेत्र में (वर्ष 2023 में जीआई टैग प्राप्त)
सूरजमुखी नैनीताल, देहरादून, अल्मोड़ा, हरिद्वार आदि

सब्जियाँ

  • उत्तराखण्ड में सब्जी उत्पादन में प्रथम स्थान आलू का है, जो लगभग सभी जिलों में उगाया जाता है।
  • अन्य सब्जियाँ - फूलगोभी, पत्तागोभी, शिमला मिर्च, टमाटर, बैंगन
  • मुख्य मसाले - हल्दी, अदरक, मिर्च, लहसुन, धनिया व बड़ी इलायची
  • आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 के अनुसार, उत्तराखण्ड में वर्ष 2023-24 के दौरान 4.77 लाख मीट्रिक टन सब्जियों का उत्पादन हुआ।
  • अल्मोड़ा घाटी में उत्पादित लाखौरी मिर्च को वर्ष 2023 में GI टैग प्राप्त हुआ।
  • हिमालय मसाला उद्यान सौनी (रानीखेत) में वन अनुसन्धान केन्द्र, हल्द्वानी द्वारा स्थापित किया गया है।

उत्तराखण्ड में बागवानी

1869 ई. में यूरोपीय मिशनरियों तथा सेना के अधिकारियों द्वारा उत्तराखण्ड में बागवानी की शुरुआत की गई।
आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 के अनुसार, उत्तराखण्ड का शीतोष्ण फलों के तहत सर्वाधिक उत्पादन क्रमशः सेब, आडू व नाशपाती का होता है।

उत्तराखण्ड की प्रमुख बागवानी फसलें

राज्य की प्रमुख बागवानी फसलों का विवरण निम्न प्रकार है-

सेब

  • उत्पादक जिले - उत्तरकाशी, नैनीताल, देहरादून व चमोली
  • उत्तरकाशी में स्थित हर्षिल सेब की बागवानी के लिए विश्व प्रसिद्ध है।
  • 1864 ई. में फ्रेडरिक विल्सन द्वारा हर्षिल में बागवानी फसलों की कृषि प्रारम्भ की गई थी।
  • राज्य में उत्पादित सेब को दिल्ली में न्यूजीलैण्ड ब्राण्ड के नाम से बेचा जाता है।

उत्तराखण्ड में मशरूम उत्पादन

उत्पादक जिले पौड़ी, रुद्रप्रयाग, उत्तरकाशी, पिथौरागढ़, अल्मोड़ा, देहरादून, नैनीताल
मशरूम उत्पादन उत्तराखण्ड के स्वरोजगार के अग्रणी विकल्प के रूप में उभर रहा है।
इसे बढ़ावा देने हेतु सरकार मशरूम उत्पादन के लिए 50% सहायता प्रदान कर रही है। राज्य में नैनीताल के ज्योलीकोट तथा भवाली में व देहरादून के शंकरपुर में कम्पोस्ट इकाई स्थापित की गई है।
आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 के अनुसार, राज्य में 20,000 मीट्रिक टन मशरूम का उत्पादन किया जाता है।

चाय

  • उत्पादक जिले - अल्मोड़ा, बागेश्वर, पौड़ी, नैनीताल, चमोली, पिथौरागढ़, देहरादून, कौसानी, भीमताल, भुवानी, कोटा बाग, चौकड़ी आदि।
  • उत्तराखण्ड में उत्पादित सर्वश्रेष्ठ चाय ऑर्गेनिक चाय है।
  • ब्रिटिश काल में राज्य की बेरीनाग चाय अपने स्वाद, सुगन्ध व रंग के लिए प्रसिद्ध थी। वर्तमान में यह केवल पिथौरागढ़ जिले के चौकोड़ी व बेरीनाग स्थित चाय बागानों में ही उगाई जाती है।
  • वर्ष 2023 में राज्य की बेरीनाग चाय को जी आई टैग प्राप्त हुआ है।
  • बागेश्वर की गरुड़ पहाड़ी पर चाय फैक्ट्री स्थित है।
  • देहरादून में उत्तराखण्ड स्टेट ऑर्गेनिक सर्टिफिकेशन एजेन्सी का गठन 8 जून, 2001 में किया गया।

उत्तराखण्ड की अन्य बागवानी फसलें

फसल उत्पादक जिले
नाशपाती नैनीताल, अल्मोड़ा, बागेश्वर, हरिद्वार तथा देहरादून
आड़ू एवं लीची नैनीताल, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़ और चमोली, देहरादून, उधमसिंह नगर
सन्तरा और नींबू अल्मोड़ा, नैनीताल, देहरादून, हरिद्वार
अखरोट पिथौरागढ़, चमोली, उत्तरकाशी व पौड़ी

उत्तराखण्ड की लीची, आडू एवं सन्तरे की माल्टा प्रजाति को वर्ष 2023 में जीआई टैग प्राप्त हुआ।

उत्तराखण्ड कृषि नीति, 2018

  • नई कृषि नीति की शुरुआत उत्तराखण्ड में वर्ष 2018 से की गई, जिसकी मुख्य प्रावधान निम्न हैं-
  • सतत् कृषि विकास को बढ़ावा देना
  • परती/बंजर भूमि का समुचित प्रबन्धन
  • मोटे एवं पौष्टिक अनाज के उत्पादन, उपभोग व प्रसंस्करण मूल्यवर्द्धन को बढ़ावा देकर विपणन की व्यवस्था करना
  • स्थानीय फसलों का न्यूनतम सुनिश्चित मूल्य घोषित करना
  • पर्वतीय क्षेत्रों में मृदा एवं नमी संरक्षण तथा वर्षा जल संरक्षण करना
  • जड़ी-बूटी की खेती, मशरूम उत्पादन तथा मौन पालन को बढ़ावा देना।
  • जैविक कृषि विधेयक, 2019 को मंजूरी मिलने के बाद उत्तराखण्ड जैविक कृषि एक्ट बनाने वाला पहला राज्य बन गया।

कृषि विकास कार्यक्रम

प्रधानमन्त्री फसल बीमा योजना 13 जनवरी, 2016 को शुरू यह योजना उत्तराखण्ड में भी लागू है। प्राकृतिक आपदाओं (आग, तड़ित, तूफान, ओलावृष्टि, चक्रवात, टाइफून, बाढ़, फलप्लावन एवं भूस्खलन आदि) से हानि की क्षतिपूर्ति के लिए व्यापक जोखिम बीमा उत्तराखण्ड में लागू है।
हर खेत को पानी वर्ष 2021 में शुरू; मुख्य उद्देश्य लघु सिंचाई के माध्यम से नए जल स्रोतों का विकास, (सतह एवं भूमिगत जल दोनों सम्मिलित) ; प्रक्षेत्र में जल वितरण प्रणाली का सुदृढ़ीकरण; जल वितरण एवं जल प्रबन्धन को बढ़ाना, कमाण्ड एरिया का कम-से-कम 10% क्षेत्र माइक्रो/प्रिसिसियन सिंचाई में लाना और विभिन्न स्रोतों से जल संचय को बढ़ाना

मेगा फूड पार्क

उत्तराखण्ड 100 करोड़ की लागत से दो मेगा फूड पार्क पतंजलि फूड एण्ड हर्बल पार्क हरिद्वार में तथा हिमालय मेगा फूड पार्क महुआखेड़ा, काशीपुर (उधमसिंह नगर) में स्थापित हैं।

कृषि विकास हेतु अन्य महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम

योजना विवरण
प्रधानमन्त्री किसान सम्मान निधि 1 दिसम्बर, 2018 को केन्द्र सरकार द्वारा शुरू; समस्त किसान परिवारों को ₹ 6 हजार प्रतिवर्ष डी.बी.टी. के माध्यम से
वीर शिरोमणि माधोसिंह भण्डारी एकीकृत आदर्श ग्राम योजना असिंचित कृषि क्षेत्रों में सिंचाई साधन विकसित करने हेतु वर्ष 2017-18 में शुरु
किसान रत्न सम्मान वर्ष 2010 में शुरु, पशुपालन में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले किसानों को सम्मानित करने हेतु
कृषि आमदनी बीमा योजना 21 जनवरी, 2004 को शुरु एवं प्राकृतिक आपदा में लघु/सीमान्त किसानों को 75% तथा अन्य को 50% प्रीमियम भारत सरकार द्वारा
किसान चैनल योजना 21 जनवरी, 2004 को शुरु; किसानों को कृषि सम्बन्धी जानकारी देने हेतु
कृषि विविधीकरण परियोजना वर्ष 2001 से लागू; मुख्यालय- देहरादून में; यह परियोजना किसानों को विभिन्न प्रकार की सहायता प्रदान करती है।
कोर वैली बीज उत्पादन योजना पर्वतीय क्षेत्रों में बीजों की कमी को दूर करने के लिए संचालित।
कृषक कवच योजना सीमान्त एवं गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले किसानों को निःशुल्क दुर्घटना बीमा; दुर्घटनाग्रस्त किसानों को ₹ 50,000 की सहायता
व्यक्तिगत दुर्घटना सहायता योजना अधिसूचित क्षेत्रों के किसानों, खेतिहर मजदूरों तथा मण्डी मजदूरों को शारीरिक क्षति होने पर वित्तीय सहायता; मृत्यु पर ₹ 1 लाख
बीज ग्राम योजना केन्द्र पोषित; चयनित कृषकों को 50% अनुदान पर बीज (आधा एकड़ के लिए) प्रदान किया जाता है।
मुख्यमंत्री बीज ग्राम योजना चयनित ग्रामों में संचालित अनुदान पर उपलब्ध
कृषक सूचना एवं परामर्श केन्द्र विकासखण्ड स्तर पर कृषक सम्बन्धित जानकारी केन्द्र की स्थापना
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Kartik Budholiya

Kartik Budholiya

उत्तराखंड की ऐतिहासिक विरासत, भूगोल, नदी प्रणालियों और सामान्य ज्ञान के विशेषज्ञ Kartik Budholiya छात्रों को UKPSC, UKSSSC, Uttarakhand Police, Patwari, Forest Guard और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता दिलाने के लिए निरंतर शोध-परक कंटेंट साझा करते हैं।