उत्तराखण्ड की मूर्तिकला
उत्तराखण्ड का कला एवं संस्कृति खंड राज्य स्तरीय परीक्षाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस लेख में हम 'उत्तराखण्ड की मूर्तिकला' और यहाँ के ऐतिहासिक मंदिरों व स्थलों से प्राप्त प्राचीन मूर्तियों पर विस्तार से चर्चा करेंगे। यह महत्वपूर्ण विषय आगामी UKPSC, UKSSSC, Uttarakhand Police, Patwari, Forest Guard और अन्य सभी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए बेहद उपयोगी है, जिससे अक्सर सीधे प्रश्न पूछे जाते हैं।
इस लेख में आप क्या-क्या पढ़ेंगे:
- उत्तराखण्ड में मूर्तिकला का स्वरूप और 'डिकारे' या 'डिकरा' (देवताओं की रंगीन मूर्तियों) से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य।
- शैव धर्म से संबंधित अद्भुत मूर्तियाँ, जैसे- लाखामण्डल से प्राप्त शिव की संहारक मूर्ति, जागेश्वर का नटराज मंदिर और जोशीमठ में नृत्य करते गणपति व मयूरासन्न कार्तिकेय की प्रतिमाएँ।
- वैष्णव धर्म के अंतर्गत काशीपुर से प्राप्त विष्णु के वामन अवतार और विभिन्न मंदिरों में उत्कीर्ण शेष-शयन मूर्तियों की जानकारी।
- द्वाराहाट (अल्मोड़ा) और बैजनाथ से प्राप्त भगवान ब्रह्मा की प्राचीन व दुर्लभ मूर्तियों के परीक्षापयोगी बिंदु।
उत्तराखण्ड में अधिकांश मूर्तियाँ स्थापत्य कृतियों के रूप में मिलती हैं। इनका निर्माण प्रायः मन्दिरों की प्राचीरों, आधार पीठिकाओं, छतों, द्वार स्तम्भों तथा शिलापट्टिकाओं आदि पर हुआ है।
राज्य में डिकारे या डिकरा देवताओं की रंगीन मूर्तियों को कहा जाता है। उत्तराखण्ड में विभिन्न धर्मों से सम्बन्धित अनेक मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं जिनका वर्णन निम्न प्रकार है-
शैव धर्म से सम्बन्धित मूर्तियाँ
- शिव की संहारक मूर्ति लाखामण्डल से शिव की संहारक रूप वाली मूर्ति प्राप्त हुई है। यह मूर्ति धनुषाकार मुद्रा में आठ भुजाओं से युक्त है। शैली और सज्जा की दृष्टि से यह मूर्ति आठवीं शताब्दी की मानी जाती है।
- नृत्य करते हुए शिव की मूर्ति जागेश्वर के नटराज मन्दिर में स्थित है।
- बैजनाथ की मूर्ति भगवान शिव की यह मूर्ति वीरासन मुद्रा में है। इसके चार हाथ हैं, जो विभिन्न मुद्राओं में दिखाई देते हैं।
- बद्रीनाथ की मूर्ति इस मूर्ति के अधिकांश लक्षण कालीमठ की प्रतिमा से मिलते हैं। इस मूर्ति की दस भुजाएँ तथा तीन मुख हैं, जो अब तक प्राप्त शैव मूर्तियों में सबसे विशिष्ट लक्षण है।
- नृत्य करते गणपति की मूर्ति जोशीमठ में गणेश की केवल एक नृत्यधारी मूर्ति मिलती है, जो शैली एवं मुद्रा की दृष्टि से उत्तराखण्ड की विशिष्ट कृति है।
- इस मूर्ति में गणेश देवता नृत्य मुद्रा में आठ भुजाओं से युक्त हैं। यह मूर्ति 11वीं शताब्दी के आस-पास की मानी जाती है।
- जोशीमठ में मयूरासन्न कार्तिकेय मूर्ति स्थित है।
- लाखामण्डल की मूर्ति यह गणपति की एक विशिष्ट मूर्ति है। मूर्ति के चार हाथ एवं छः सिर हैं, जो क्रमशः दो पंक्तियों में तीन-तीन की संख्या में स्थापित हैं। इसमें गणपति एक मोर की पीठ पर सवार हैं तथा दोनों ओर दो मोर हैं, जो देवता की ओर निहार रहे हैं। इस मूर्ति पर दक्षिण कला का प्रभाव दिखाई पड़ता है।
वैष्णव धर्म से सम्बन्धित मूर्तियाँ
- शैव धर्म के पश्चात् उत्तराखण्ड का दूसरा प्रमुख धर्म वैष्णव धर्म है।
- यहाँ केदार की भाँति पंचबद्री की कल्पना तथा भगवान विष्णु के विभिन्न जन्मों से सम्बन्धित मूर्तियाँ मिलती हैं।
वैष्णव धर्म से सम्बन्धित निम्नलिखित मूर्तियाँ उल्लेखनीय हैं-
- वामन मूर्ति भगवान विष्णु के 5वें अवतार के प्रतीक वामन की प्रतिमा काशीपुर (उधमसिंह नगर) में है, जो रेतीले पत्थर से निर्मित है।
- शेष-शयन मूर्ति भगवान विष्णु के इस रूप की अधिकांश मूर्तियाँ उत्तराखण्ड के मन्दिरों की प्राचीरों, पट्टिकाओं, छतों तथा द्वारों पर उत्कीर्ण मिलती हैं।
ब्रह्मा की मूर्तियाँ
ब्रह्म देवता की सर्वप्रथम मूर्ति द्वाराहाट (अल्मोड़ा) में रत्नदेव के छोटे मन्दिर की द्वारशीर्ष पट्टिका पर उत्कीर्ण मिलती है। इस मूर्ति में ब्रह्म देवता की चार भुजाएँ हैं और वह कमलासन्न पर आसीन हैं।
इनकी दूसरी मूर्ति बैजनाथ संग्रहालय से प्राप्त हुई है।
उत्तराखण्ड के लोक देवी-देवता
| नाम | मुख्य क्षेत्र | विशेषता/मान्यता |
|---|---|---|
| गोलू देवता | कुमाऊँ, चम्पावत, अल्मोड़ा | न्याय के देवता, घण्टियों और अर्जियों के साथ पूजा की जाती है। |
| नागराजा | जौनसार-बावर, चकराता | नाग देवता, वर्षा और कृषि से जुड़ा सम्मान |
| भोलानाथ | गढ़वाल, विशेषकर चमोली | शिव का रूप, ग्रामीणों के रक्षक देवता |
| नरसिंह देवता | जोशीमठ, बद्रीनाथ मार्ग | विष्णु के अवतार, धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से महत्त्वपूर्ण |
| ऐड़ी देवता | पिथौरागढ़, चम्पावत | योद्धा देवता, बल और वीरता का प्रतीक |
| जाल देवता | अल्मोड़ा, बागेश्वर | सुरक्षात्मक देवता, विशेष अवसरों पर पूजा होती है। |
| बासुकी नाग | गढ़वाल, उत्तरकाशी | नाग देवता, जल स्रोतों से जुड़े हुए |
| शीतला माता | कुमाऊँ, गढ़वाल | रोगों से सुरक्षा देने वाली देवी |
| कलिंगा देवता | टिहरी, रुद्रप्रयाग | युद्ध और शक्ति के देवता |
| सम देवता | रुद्रप्रयाग, टिहरी | प्राकृतिक आपदाओं से रक्षा करने वाले देवता। |
| बिनसर महादेव | पौड़ी गढ़वाल | भगवान शिव का ही एक रूप |
| ज्वालपा देवी | पौड़ी | देवी पार्वती का रूप नवालिका नदी के किनारे अवस्थित |
| गंगनाथ | कुमाऊँ | न्याय के देवता |
| चन्द्रबदनी | टिहरी गढ़वाल | माता सती के 52 शक्तिपीठों में से एक |
| क्षेत्रपाल | कुमाऊँ और गढ़वाल | भूमि/क्षेत्र का रक्षक |
| चौमू | चम्पावत | पशुपालकों का देवता |
| नन्दादेवी | कुमाऊँ और गढ़वाल | उत्तराखण्ड की अधिष्ठात्री देवी |
| हारु/हरु | कुमाऊँ | ये हरदेव या हरिदेव के नाम से भी प्रसिद्ध हैं। |
| भैरवनाथ | केदार क्षेत्र | काल भैरव भी कहा जाता है। |
| महासू | हनोल (उत्तरकाशी) | न्याय के देवता |
| कण्डोलिया | पौड़ी | मान्यतानुसार संकट की पूर्व सूचना या चेतावनी देते है, शिव के रूप हैं। |
| भदराज (भद्राज) | मसूरी/जौनसार | भगवान के रूप, पशुपालकों के देवता |
| गोरखनाथ | चम्पावत | गौ रक्षक के रूप में भी पूजे जाते हैं। |
| भूमिया | कुमाऊँ और गढ़वाल मण्डल | गाँव के रक्षक देवता |
| धामदेव | कुमाऊँ | न्यायकारी धर्मशील, गौ ब्राह्मण रक्षक और प्रजापालक देवता |
| बधाण | मोस्तामानु (पिथौरागढ़ क्षेत्र) | - |
| धारी देवी | पौड़ी गढ़वाल | चार धामों की रक्षक दिन मे तीन बार रूप परिवर्तन |
| घण्ड्याल (घड़ियाल/घण्टाकर्ण) | टिहरी | बद्रीनाथ धाम के रक्षक |
| निरंकार | गढ़वाल और कुमाऊँ | सबसे बड़े देवता की उपाधि, पहली उपज इन्हें अर्पित की जाती है। |
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