उत्तराखण्ड की लोकचित्र कला
उत्तराखण्ड अपनी समृद्ध संस्कृति और अनूठी कलाओं के लिए विश्वभर में विख्यात है। राज्य की 'लोकचित्र कला' (Folk Art) इसकी सांस्कृतिक विरासत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह विषय आगामी सभी उत्तराखण्ड राज्य स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं जैसे UKPSC, UKSSSC, Uttarakhand Police, Patwari, Forest Guard आदि के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि कला और संस्कृति खण्ड से अक्सर सीधे प्रश्न परीक्षाओं में पूछे जाते हैं।
इस लेख में आप क्या-क्या पढ़ेंगे:
- उत्तराखण्ड की प्रसिद्ध 'ऐंपण' (अल्पना) कला की सम्पूर्ण जानकारी, इसके विभिन्न नाम और इसके निर्माण में प्रयुक्त विशेष सामग्री।
- 'बार-बूँद' चित्रकला की बारीकियाँ और 'ज्यूंति मातृका' चित्रों का धार्मिक महत्व तथा उनके पारंपरिक स्वरूप की विशेषताएँ।
- कपास व मिट्टी से निर्मित 'दिकारा' मूर्तियों और दीपावली जैसे शुभ अवसरों पर बनाए जाने वाले 'लक्ष्मी पौ' एवं 'वसुधारा' चित्रों से जुड़े महत्वपूर्ण परीक्षापयोगी तथ्य।
उत्तराखण्ड की प्रमुख लोक चित्रकलाओं का विवरण निम्न है-
ऐंपण (छिपण)
- 'ऐंपण' शब्द अल्पना का स्थानीय रूपान्तरण है
- यह मांगलिक अवसर पर घर-आँगन में प्रवेश द्वार, पूजा स्थल की भूमि और दीवारों आदि पर बनाए जाने वाले सुन्दर चित्र हैं।
- इसके अन्य नाम चौक पूरना, अल्पना व रंगोली हैं।
- इसका निर्माण पानी, लाल मिट्टी और चावल की लेई से होता है।
- इसके प्रमुख चित्र सूर्य, चन्द्र, शंख, स्वास्तिक, बेल बूटे आदि हैं।
बार-बूँद
- एक ही नमूने से पूरी दीवार को चित्रित करने को बार-बूँद बनाना कहते हैं।
- परम्परा के अनुसार कुछ निश्चित बिन्दुओं को बनाकर उनको रेखाओं से जोड़कर दीवार पर विभिन्न नमूने बनाए जाते हैं।
- इस प्रकार बनाए गए नमूनों को विविध रंगों द्वारा भरा जाता है।
ज्यूंति मातृका चित्र
- मुख्य रूप से विभिन्न देवी-देवताओं को विभिन्न रूपों में दर्शाया जाता है तथा उनमें रंग भरा जाता है।
- यह नवरात्रि, दशहरा और दीपावली आदि त्योहारों पर बनाए जाते हैं।
दिकारा
- दिकारा, देवी-देवताओं की मिट्टी की तीन दिशाओं में उभारदार मूर्तियाँ होती हैं। इनको कपास मिश्रित चिकनी मिट्टी से लड़कियाँ और स्त्रियाँ बनाती हैं।
- सूखने पर इनको चावल पीसकर बनाए गए सफेद रंग से रंगा जाता है। इसके बाद रंगों में गोन्द मिलाकर इन्हें पेण्ट किया जाता है।
लक्ष्मी पौ चित्र
- ये महालक्ष्मी पूजा के दिन (दीपावली के अवसर पर) घर के मुख्य द्वार या ओखली से तिजोरी या थान (पूजागृह) तक लक्ष्मी के पद चिह्न बनाए जाते हैं।
वसुधारा चित्र
- यह घर के पूजा स्थल व देहली को गेरू से लीपकर बिस्वार के पतले घोल की धारा से बना चित्र होता है। यह विशेष अवसरों पर बनाया जाता है।
अन्य चित्रकला
| चित्र | विवरण |
|---|---|
| थापा चित्र | चावल पीसकर रंगों का प्रयोग मांगलिक अवसर पर किया जाता है। |
| नत या टुपुक | रसोईघरों की दीवारों पर चावल के आटे के घोल से चित्र तैयार किया जाता है। |
| सेली चित्र | आरती की थाली में किया जाता है। |
| स्यो चित्र | शुभ कार्यों में बुरी आत्माओं से रक्षा के लिए यह चित्र बनाया जाता है। |
| खोड़िया चित्र | मण्डप पर बनाए जाते हैं। |
| म्वाली | विभिन्न रंगों द्वारा प्रवेश द्वारों पर बनाए जाते हैं। |
| गोदना या गाजे | शरीर पर देवी देवताओं या फूल पत्ती के रूप में किया जाता है। |
| प्रकीर्ण चित्र | रंग व ब्रश या अँगुलियों से कागज, दरवाजों, चौराहों आदि पर प्रकीर्ण चित्र बनाए जाते हैं। |
उत्तराखण्ड में शिल्पकला
- रिंगाल शिल्प
- मृत्तिका शिल्प
- चर्म शिल्प (बाडई या शारकी)
- काष्ठ शिल्प
- मांगलिक मूर्ति शिल्प (केले के तने, गन्ने एवं नारियल से निर्मित)
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