उत्तराखण्ड के प्रमुख मेले | uttarakhand ke pramukh mele

उत्तराखण्ड के प्रमुख मेले

उत्तराखण्ड की समृद्ध संस्कृति, यहाँ के ऐतिहासिक मेलों (कौथीक), पारम्परिक परिधानों और आभूषणों से जुड़ी यह जानकारी हर प्रतियोगी छात्र के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। आगामी UKPSC, UKSSSC, Uttarakhand Police, Patwari, Forest Guard आदि जैसी सभी राज्य स्तरीय परीक्षाओं में इस विषय से निश्चित रूप से सीधे प्रश्न पूछे जाते हैं। अपनी तैयारी को सटीक दिशा देने के लिए इसे अवश्य पढ़ें!
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इस लेख में आप क्या-क्या पढ़ेंगे:
  • उत्तराखण्ड के प्रमुख ऐतिहासिक मेले: राज्य के महत्त्वपूर्ण मेलों (जैसे- उत्तरायणी, बग्वाल, कुम्भ, माघ और झण्डा मेला) के आयोजन स्थल, समय और उनकी पौराणिक व ऐतिहासिक मान्यताओं से जुड़े परीक्षापयोगी तथ्य।
  • पारम्परिक परिधानों की पहचान: गढ़वाल और कुमाऊँ अंचल की संस्कृति को दर्शाने वाले पुरुषों, महिलाओं तथा बच्चों के विशेष वस्त्रों (जैसे- पिछोड़ा, आंगड़ी, भोटू और मिर्जई) की विस्तृत जानकारी।
  • प्रमुख आभूषण और उनका वर्गीकरण: शरीर के विभिन्न अंगों (सिर, कान, नाक, गले, हाथ, कमर और पैर) पर पहने जाने वाले उत्तराखण्ड के पारम्परिक आभूषणों (जैसे- नथुली, मुर्खली, तिलहरी, गुलबन्द और प्वल्या) का सम्पूर्ण विवरण।
उत्तराखण्ड की संस्कृति में अनेक सांस्कृतिक तत्त्वों का समावेश है। यहाँ के त्योहार, मेले, वेशभूषा एवं आभूषण, यहाँ की सांस्कृतिक धरोहर हैं। राज्य में क्षेत्रीय विभिन्नता के साथ-साथ सांस्कृतिक विभिन्नता भी देखने को मिलती है।
उत्तराखण्ड में मेले को सामान्यतः कौथीक (कौथीग) कहा जाता है। यह शब्द सम्भवतः 'कौतुक' (खेल-तमाशा) का अपभ्रंश है। मेलों की परम्परा प्रियजनों को परस्पर मिलाने एवं आस्था से जुड़े मनोभावों को मुखरित करने और उसकी सामाजिक महत्ता को सिद्ध करने का माध्यम है।

उत्सव का नाम - चैती (बालसुन्दरी मेला)
  • स्थान - कुण्डेश्वरी मन्दिर, काशीपुर के पास, उधमसिंह नगर
  • समय - नवरात्रि (चैत्र) (1 दिवसीय)
  • मुख्य विशेषताएँ - बालसुन्दरी देवी कुमाऊँ के चन्द्रवंशीय राजाओं की कुलदेवी मानी जाती है, अष्टमी के दिन देवी की स्वर्ण प्रतिमा को मन्दिर में स्थापित किया जाता है। बोक्सा जनजाति इसमें सक्रिय रूप से भाग लेती है।

उत्सव का नाम - माघ मेला (बाड़ाहाट का थौल)
  • स्थान - उत्तरकाशी
  • समय - 14 जनवरी से (8 दिवसीय)
  • मुख्य विशेषताएँ - कंडार देवता की डोली के साथ शुरू लोग देवी-देवताओं को डोली में लाकर स्नान कराते हैं।

उत्सव का नाम - उत्तरायणी मेला
  • स्थान - कुमाऊँ-गढ़वाल क्षेत्र में
  • समय - 14 जनवरी (मकर संक्रान्ति) (1 दिवसीय)
  • मुख्य विशेषताएँ - घुघतियात्यार के नाम से भी जाना जाता है। वर्ष 1921 में इसी मेले में मकर संक्रान्ति के दिन बागेश्वर में कुली बेगार प्रथा समाप्त। कुमाऊँ के शिल्पकार, नेपाल और तिब्बत के व्यापारी भाग लेते हैं। वर्ष 1929 में महात्मा गाँधी ने स्वराज मन्दिर का शिलान्यास किया।

उत्सव का नाम - लोसर मेला
  • स्थान - डुण्डा, उत्तरकाशी
  • समय - बसन्त का आगमन (बौद्ध पंचांग के अनुसार)
  • मुख्य विशेषताएँ - जाड़-भोटिया समुदाय द्वारा बसन्त के स्वागत में आयोजित

उत्सव का नाम - पूर्णागिरी मेला
  • स्थान - पूर्णागिरी शक्तिपीठ, चम्पावत (टनकपुर से 20 किमी)
  • समय - नवरात्रि (वर्ष में दो बार)
  • मुख्य विशेषताएँ - काली नदी के किनारे पहाड़ी पर स्थित शक्तिपीठ

उत्सव का नाम - दूनागिरी मेला
  • स्थान - दुर्गा मन्दिर, रानीखेत (52 किमी दूर)
  • समय - नवरात्रि
  • मुख्य विशेषताएँ - देवी दुर्गा को समर्पित

उत्सव का नाम - झण्डा मेला
  • स्थान - देहरादून
  • समय - होली के 5वें दिन (15 दिवसीय)
  • मुख्य विशेषताएँ - गुरु राम राय के जन्मदिन (1699 से) पर। ध्वजदण्ड की पूजा और शहर में जुलूस

उत्सव का नाम - पिरान कलियर (उर्स)
  • स्थान - कलियर गाँव हरिद्वार के पास
  • समय - अगस्त में
  • मुख्य विशेषताएँ - सूफी सन्त हजरत अलाउद्दीन अली अहमद, इमामुद्दीन और किलकिली साहब के मजार पर

उत्सव का नाम - थल मेला
  • स्थान - बालेश्वर थल मन्दिर, पिथौरागढ़
  • समय - बैशाखी (13 अप्रैल)
  • मुख्य विशेषताएँ - वर्ष 1940 में जलियाँवाला बाग दिवस के उपलक्ष्य से शुरुआत

उत्सव का नाम - हरियाली पूड़ा मेला
  • स्थान - नौटी गाँव, चमोली
  • समय - चैत्र का पहला (अप्रैल)
  • मुख्य विशेषताएँ - बसन्त के आगमन का उत्सव

उत्सव का नाम - चन्द्रबदनी मेला
  • स्थान - चन्द्रबदनी मन्दिर, टिहरी
  • समय - अप्रैल
  • मुख्य विशेषताएँ - गढ़वाल के चार प्रमुख शक्तिपीठों में से एक

उत्सव का नाम -स्याल्दे बिखौती मेला
  • स्थान - द्वाराहाट, अल्मोड़ा
  • समय - बैशाख का पहला दिन और रात (मई) (1 दिवसीय)
  • मुख्य विशेषताएँ - कत्यूरी शासनकाल से प्रारम्भ/बिखौती और स्यालदे उत्सव

उत्सव का नाम - मौंण मेला
  • स्थान - जौनसार क्षेत्र
  • समय -
  • मुख्य विशेषताएँ - 1866 ई. में टिहरी नरेश द्वारा शुरू, सबसे बड़ा सामूहिक मछली पकड़ने का मेला, टिमरू जड़ी का उपयोग।

उत्सव का नाम - सोमनाथ मेला
  • स्थान - रानीखेत के समीप, अल्मोड़ा
  • समय - बैशाख का अन्तिम रविवार (मई)
  • मुख्य विशेषताएँ - पशुओं का क्रय-विक्रय

उत्सव का नाम - बिस्सू मेला
  • स्थान - उत्तरकाशी
  • समय - विषुवत् संक्रान्ति (बैशाख का पहला दिन)
  • मुख्य विशेषताएँ - धनुष बाण युद्ध के लिए प्रसिद्ध

उत्सव का नाम - मोष्टामानु मेला
  • स्थान - पिथौरागढ़
  • समय - अगस्त व सितम्बर के बीच तीन दिन के लिए
  • मुख्य विशेषताएँ - इसके दौरान भगवान मोष्टा की पालकी निकाली जाती है।

उत्सव का नाम - पौराणिक तिमुड़ा मेला
  • स्थान - जोशीमठ, बद्रीनाथ
  • समय - शनिवार
  • मुख्य विशेषताएँ - बद्रीनाथ मन्दिर के कपाट खुलने से पहले

उत्सव का नाम - भद्रराज देवता मेला
  • स्थान - भद्रराज मन्दिर मयुरी (देहरादून से 15 किमी)
  • समय - बैशाख (मई)
  • मुख्य विशेषताएँ - भद्रराज देवता को समर्पित

उत्सव का नाम - बग्वाल (आषाढ़ी कौथीक मेला)
  • स्थान - बाराही देवी मन्दिर देवीधुरा, चम्पावत
  • समय - श्रावण माह में (अगस्त)
  • मुख्य विशेषताएँ - देवीधुरा मेला के नाम से भी जाना जाता है। वर्ष 2013 से फूल-फल युद्ध (पहले पत्थर युद्ध)। चम्याल, वालिक, गहड़वाल, लमगड़िया समूह भाग लेते हैं।

उत्सव का नाम - मानेश्वर मेला
  • स्थान - मानेश्वर चम्पावत
  • समय - श्रावण (अगस्त)
  • मुख्य विशेषताएँ - चमत्कारी शिला की पूजा, पशुओं के स्वास्थ्य के लिए

उत्सव का नाम - नुणाई मेला
  • स्थान - जौनसार क्षेत्र, देहरादून
  • समय - श्रावण (अगस्त)
  • मुख्य विशेषताएँ - भेड़-बकरी पालकों के लिए समर्पित

उत्सव का नाम - टपकेश्वर मेला
  • स्थान - टपकेश्वर मन्दिर देवधारा, देहरादून
  • समय - शिवरात्रि
  • मुख्य विशेषताएँ - भगवान शिव को समर्पित

उत्सव का नाम - नन्दा देवी मेला
  • स्थान - अल्मोड़ा, कुमाऊँ, गढ़वाल (मुख्यतः नन्दादेवी, परिसर, अल्मोड़ा)
  • समय - भाद्र शुक्ल पंचमी (सितम्बर से)
  • मुख्य विशेषताएँ - 16वीं सदी में राजा कल्याणचन्द द्वारा नन्दा देवी की पूजा शुरुआत

उत्सव का नाम - लखवा मेला
  • स्थान - चकराता, मसूरी से 78 किमी दूर
  • समय - सितम्बर- अक्टूबर
  • मुख्य विशेषताएँ - जनजाति क्षेत्र में आयोजित

उत्सव का नाम - बग्वाली पोखर मेला
  • स्थान - बग्वाली पोखर, अल्मोड़ा
  • समय - अश्विन (सितम्बर- अक्टूबर) (8 दिवसीय)
  • मुख्य विशेषताएँ - सरकार के सहयोग से आयोजित

उत्सव का नाम - गणनाथ मेला
  • स्थान - गणनाथ, अल्मोड़ा
  • समय - कार्तिक पूर्णिमा (अक्टूबर-नवम्बर)
  • मुख्य विशेषताएँ - स्थानीय देवताओं को समर्पित

उत्सव का नाम - बिनाथेश्वर मेला
  • स्थान - अल्मोड़ा
  • समय - कार्तिक (अक्टूबर-नवम्बर)
  • मुख्य विशेषताएँ - महिलाएँ सन्तान प्राप्ति के लिए घी का दीपक जलाकर पूजा करती हैं।

उत्सव का नाम - लड़ीधुरा मेला
  • स्थान - पम्पदा देवी मन्दिर, बाराकोट चम्पावत
  • समय - कार्तिक पूर्णिमा (अक्टूबर-नवम्बर) (1 माह)
  • मुख्य विशेषताएँ - देवी की पूजा को समर्पित

उत्सव का नाम - जौलजीबी मेला
  • स्थान - काली और गोरी नदी संगम, पिथौरागढ़
  • समय - 14-19 नवम्बर (6 दिवसीय)
  • मुख्य विशेषताएँ - वर्ष 1914 में मार्गशीर्ष संक्रान्ति पर शुरू

उत्सव का नाम - रणभूत मेला
  • स्थान - नैलचामी पट्टी के समीप, टिहरी
  • समय - कार्तिक (नवम्बर)
  • मुख्य विशेषताएँ - युद्ध में मरे सैनिकों की स्मृति में भूत नृत्य

उत्सव का नाम - बैकुण्ठ चतुर्दशी मेला
  • स्थान - कमलेश्वर मन्दिर श्रीनगर, पौड़ी
  • समय - बैकुण्ठ चतुर्दशी (नवम्बर)
  • मुख्य विशेषताएँ - दम्पत्ति सन्तान प्राप्ति के लिए रातभर दीपक जलाकर पूजा करते हैं।

उत्सव का नाम - कुम्भ मेला
  • स्थान - हरिद्वार
  • समय - प्रत्येक 12 वर्ष पर (गुरु के कुम्भ राशि व सूर्य के मेष राशि पर स्थित होने पर)
  • मुख्य विशेषताएँ - ह्वेनसाँग ने इसे मोक्ष पर्व कहा। हर्षवर्धन ने हरि की पौड़ी पर यज्ञ स्नान किया। यह मकर संक्रान्ति से दशहरे तक लगता है।

उत्सव का नाम - अर्द्धकुम्भ मेला
  • स्थान - हरिद्वार
  • समय - कुम्भ के 6वें वर्ष
  • मुख्य विशेषताएँ - वर्ष 2027 में अगला अर्द्धकुम्भ आयोजित होगा।

प्रमुख पारम्परिक परिधान

गढ़वाल क्षेत्र
  • पुरुष : धोती, चूड़ीदार पायजामा, कुर्ता, मिरजई, सफेद टोपी, बास्कट (मोरी), गुलबन्द, अचकन, पगड़ी
  • महिला : आंगड़ी, गाती, धोती, पिछोड़ा
  • बच्चे : झगुली, घाघरा, कोट, चूड़ीदार पायजामा, संतराथ

कुमाऊँ क्षेत्र
  • पुरुष : धोती, पायजामा, सुराव, कोट, कुर्ता, भोटू , कमीज, मिरजई, टांक
  • महिला : घागरी (घाघरा), आंगड़ा/आंगड़ी, धोती, पिछोड़ा
  • बच्चे : झगुली (लम्बी फ्रॉक), झगुल कोट, संतराथ (स्लैक्स)

प्रमुख आभूषण

  • सिर के आभूषण : सीसफूल, बन्दी (बाँदी)।
  • कान के आभूषण : मुर्खली (मुर्खी), मुन्दड़ा, मुनाड़, बुजनी, कुण्डल, कर्णफूल (कानों के किनारों पर पहने जाते हैं), तुग्यल/तगल्प (कुमाऊँ में प्रचलित)
  • नाक के आभूषण : फूली (कुँवारी स्त्रियों द्वारा पहनी जाती है), नथुली (विवाहित स्त्रियों द्वारा पहनी जाती है), बुलांक/फुल्ली (विवाहित)।
  • गले के आभूषण : चन्द्रहार (विवाहित स्त्रियों द्वारा पहना जाता है), लॉकेट (विवाहित स्त्रियों द्वारा पहना जाता है), हँसुली (सूत), गुलबन्द (रामनवमी), तिलहरी, चरे (चरयो), चवन्नीमाला/हमेल पुरानी (22 चवन्नियों से बना हार)।
  • हाथ के आभूषण : मुन्दरी, गोखले (बाजू में पहना जाता है), गुण्ठी, ठ्वाक, धगुला, खण्डवे, पौंछी।
  • कमर के आभूषण : कमर ज्योड़ि या करधनी, तगड़ी (तिगड़ी)।
  • पैरों के आभूषण : प्वल्या (बिछुआ), झाँवर (झिंवरा), अमिरतीतार/अमृततार, इमरती, पौण्टा, खुड़ले (भोटिया जनजाति द्वारा पहना जाता है)।
  • कन्धे के आभूषण : स्यूण-सांगल।
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Kartik Budholiya

उत्तराखंड की ऐतिहासिक विरासत, भूगोल, नदी प्रणालियों और सामान्य ज्ञान के विशेषज्ञ Kartik Budholiya छात्रों को UKPSC, UKSSSC, Uttarakhand Police, Patwari, Forest Guard और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता दिलाने के लिए निरंतर शोध-परक कंटेंट साझा करते हैं।