उत्तराखण्ड के चार धाम
देवभूमि उत्तराखण्ड के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक भूगोल में 'चार धाम' (बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री) का विशेष एवं सर्वोच्च स्थान है। यह टॉपिक उत्तराखण्ड राज्य की सभी प्रमुख प्रतियोगी परीक्षाओं जैसे UKPSC, UKSSSC, Uttarakhand Police, Patwari, Forest Guard आदि के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। परीक्षाओं में अक्सर इन धामों की भौगोलिक स्थिति, निर्माणकर्ताओं और शीतकालीन प्रवास से जुड़े प्रश्न पूछे जाते हैं, जिन्हें इस सार में स्पष्ट किया गया है।
इस लेख में आप क्या-क्या पढ़ेंगे:
- बद्रीनाथ एवं केदारनाथ मन्दिर के अद्भुत तथ्य: इन प्रमुख धामों की स्थापना, समुद्र तल से ऊँचाई, आदिगुरु शंकराचार्य से जुड़ा इतिहास और शीतकाल में भगवान की पूजा के स्थानों (जोशीमठ एवं ऊखीमठ) की सटीक जानकारी।
- गंगोत्री और यमुनोत्री का भौगोलिक एवं ऐतिहासिक महत्व: गोरखा सेनापति अमरसिंह थापा से लेकर जयपुर के राजाओं द्वारा किये गए निर्माण कार्यों का विवरण तथा मन्दिरों की स्थापत्य शैली (कत्यूरी व पैगोड़ा शैली)।
- कपाट व्यवस्था और प्रमुख उत्सव: बसन्त पंचमी, महाशिवरात्रि, अक्षय तृतीया और भैयादूज जैसे पर्वों पर कपाट खुलने/बंद होने की तिथियां तथा कढ़ाई उत्सव व भतूज उत्सव जैसे महत्वपूर्ण मेलों की जानकारी।
- परीक्षा-उपयोगी विशिष्ट बिंदु: प्रमुख रक्षक देवता (क्षेत्रपाल और भैरवनाथ), सूर्यकुण्ड का तापमान और मन्दिरों के मुख्य पुजारियों के सम्प्रदाय जैसे वे महत्वपूर्ण तथ्य जो सीधे एक्जाम पेपर में छपते हैं।
बद्रीनाथ मन्दिर
- अवस्थिति - चमोली जिले में अलकनन्दा के तट पर
- समुद्र तल से ऊँचाई लगभग - 3133 मी
- निर्माण - कत्यूरियों द्वारा
- पुनर्निर्माण - परमार शासक अजयपाल द्वारा
- जीर्णोद्धार - ग्वालियर नरेश दौलत राव सिन्धिया द्वारा
- रक्षक देवता - क्षेत्रपाल
- यह मन्दिर नर (अर्जुन) एवं नारायण (विष्णु) पर्वत शिखरों के मध्य अलकनन्दा नदी के किनारे स्थित है।
- बद्रीनाथ मन्दिर में भगवान विष्णु की पूजा होती है।
- जोशीमठ के नरसिंह मन्दिर में शीतकाल में भगवान बद्रीनाथ की पूजा होती है।
- शंकराचार्य के वंशज रावल बद्रीनाथ मन्दिर के पुजारी होते हैं, जो केरल के नम्बूदरी सम्प्रदाय के ब्राह्मण हैं।
- बसन्त पंचमी के दिन बद्रीनाथ मन्दिर के कपाट खुलने का समय निश्चित किया जाता है।
- शरद ऋतु में नवम्बर महीने के लगभग तीसरे सप्ताह में इसके कपाट बन्द हो जाते हैं।
- कढ़ाई उत्सव बद्रीनाथ में मनाया जाता है।
- श्री धनसिंह बर्त्वाल द्वारा बद्रीनाथ भगवान की आरती लिखी गई है।
केदारनाथ मन्दिर
- अवस्थिति - रुद्रप्रयाग जिले में
- समुद्रतल से ऊँचाई - 3584 मी
- जीर्णोद्धार - आदिगुरु शंकराचार्य ने
- पुनर्निर्माण - अहिल्याबाई होल्कर द्वारा (18वीं शताब्दी में)
- रक्षक देवता - भैरवनाथ
- यह शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यह खर्चाकुण्ड, भरतखण्ड एवं केदारनाथ शिखरों के मध्य स्थित है।
- केदारनाथ को महाभारत के वनपर्व में भृगुतुंग कहा गया है।
- ब्रह्मकमल चढ़ाकर केदारनाथ भगवान की पूजा की जाती है।
- ऊखीमठ के ओंकारेश्वर महादेव मन्दिर में भगवान केदारनाथ की पूजा शरद ऋतु में की जाती है।
- वर्ष 1948 में केदारनाथ मन्दिर समिति का गठन किया गया। केदारनाथ में अन्नकूट उत्सव या भतूज उत्सव मनाया जाता है।
- इस मन्दिर का निर्माण कत्यूरी शैली में किया गया है।
- महाशिवरात्रि पर्व पर केदारनाथ मन्दिर के कपाट खुलने की तिथि की घोषणा की जाती है।
- भैयादूज के दिन (अक्टूबर-नवम्बर) शीतकाल के लिए कपाट बन्द किए जाने की परम्परा प्रचलित है।
गंगोत्री मन्दिर
- अवस्थिति - उत्तरकाशी जिले में भागीरथी के तट पर
- समुद्रतल से ऊँचाई - 3048 मी
- निर्माण - गोरखा सेनापति अमरसिंह थापा द्वारा (18वीं शताब्दी में)
- पुनरुद्धार - वर्ष 1935 में जयपुर के राजा माधोसिंह द्वारा
- यहाँ से निकट गौमुख ग्लेशियर गंगा नदी का उद्गम स्थान है।
- सफेद ग्रेनाइट से निर्मित गंगोत्री मन्दिर की शैली कत्यूरी शिखर (छत्र) व पैगोड़ा शैली की है।
- मुखवा गाँव के निवासी गंगोत्री मन्दिर के पुजारी होते हैं।
- मुखवा गाँव के मार्कण्डेय मन्दिर में माँ गंगा का शीत ऋतु प्रवास होता है।
- भैयादूज के दिन गंगोत्री मन्दिर के कपाट बन्द हो जाते हैं।
- प्रतिवर्ष अक्षय तृतीया को गंगा दशहरा पर्व मनाया जाता है, गंगोत्री मन्दिर के कपाट खुलते हैं।
यमुनोत्री मन्दिर
- अवस्थिति - उत्तरकाशी जिले में यमुना नदी के तट पर
- समुद्र तल से ऊँचाई - 3,235 मी
- निर्माणकर्ता - सुदर्शन शाह (1850 ई. में लकड़ी से)
- आधुनिक मन्दिर का निर्माण - गढ़वाल नरेश प्रताप शाह (वर्ष 1919 में)
- पुनर्निर्माण - जयपुर की महारानी गुलेरिया ने
- यह यमुना नदी का उद्गम स्थल है।
- यमुनोत्री में काले पत्थर की यमुना मैया की मूर्ति भवानी शाह ने 1862 ई. में स्थापित कराई थी।
- शीत ऋतु में भैयादूज पर यमुनोत्री के कपाट बन्द हो जाते हैं।
- ग्रीष्मकाल में प्रतिवर्ष वैशाख शुक्ल की तृतीया को यमुना मन्दिर के कपाट खुलते हैं।
- शीत प्रवास में यमुना माँ की डोली खरसाली गाँव में रहती है।
- सूर्यकुण्ड का तापमान लगभग 195 डिग्री फारेनहाइट है।
- सूर्यकुण्ड से निकलने वाली विशेष ध्वनि को ओम ध्वनि कहते हैं।
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