उत्तराखण्ड की अनुसूचित जाति एवं जनजातियाँ
उत्तराखण्ड की कला, संस्कृति और जनसांख्यिकी को गहराई से समझने के लिए 'उत्तराखण्ड की जनजातियाँ' एक बेहद महत्वपूर्ण विषय है। यदि आप UKPSC, UKSSSC, उत्तराखण्ड पुलिस, पटवारी, फॉरेस्ट गार्ड जैसी आगामी राज्य स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं, तो इस टॉपिक से निश्चित रूप से प्रश्न पूछे जाते हैं। यह बेहतरीन लेख आपकी परीक्षा की तैयारी को सटीक और परिणामदायी बनाने के लिए तैयार किया गया है!
इस लेख में आप क्या-क्या पढ़ेंगे:
- उत्तराखण्ड की पाँच प्रमुख अनुसूचित जनजातियों (थारू, जौनसारी, बोक्सा, भोटिया और राजी) का विस्तृत भौगोलिक निवास, उत्पत्ति, और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि।
- इन जनजातीय समुदायों की अनूठी सांस्कृतिक परम्पराएँ, विवाह प्रथाएँ, पारम्परिक परिधान, प्रमुख इष्टदेव और उनके द्वारा मनाए जाने वाले प्रसिद्ध लोक-त्योहार व नृत्य।
- परीक्षाओं के दृष्टिकोण से बेहद महत्वपूर्ण तथ्य; जैसे- सर्वाधिक जनसंख्या (थारू) और सबसे कम जनसंख्या (राजी) वाले समुदाय, आदिम जनजातियों का दर्जा तथा विधानसभा व लोकसभा में इनके लिए आरक्षित सीटों की जानकारी।
वर्ष 1967 में लोकुर समिति की सिफारिश पर उत्तराखण्ड की पाँच जनजातियों को अनुसूचित जनजातियों का दर्जा दिया गया।
उत्तराखण्ड राज्य में मुख्य रूप से थारू, जौनसारी, भोटिया, बोक्सा व राजी पाँच जनजातियाँ निवास करती हैं।
राज्य की दो जनजाति राजी व बोक्सा को भारत सरकार द्वारा आदिम जनजाति घोषित किया गया।
राज्य की नानकमत्ता व चकराता विधानसभा सीट अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं।
उत्तराखण्ड की अल्मोड़ा लोकसभा सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है। UKPSC 2024
जनगणना 2011 के अनुसार, राज्य में सबसे कम जनसंख्या राजी जनजाति की व सबसे अधिक थारू जनजाति की है।
राज्य में सर्वाधिक अनुसूचित जनजाति ऊधमसिंह नगर में तथा सबसे कम रुद्रप्रयाग में निवास करती है।
राठी जनजाति राज्य के पौड़ी जिले के पर्वतीय भागों में निवास करती है। इनके विकास के लिए राठ विकास अभिकरण का गठन किया गया है।
उत्तराखण्ड की प्रमुख अनुसूचित जनजातियों का वर्णन इस प्रकार है-
थारू जनजाति
- मुख्य निवास स्थान - उधमसिंह नगर (90%), नैनीताल से लेकर चम्पावत तक (तराई व भाबर क्षेत्र)
- वंशज/उत्पत्ति - किरात वंश/महाराणा प्रताप
- नृवंशीय विशेषता - मंगोल प्रजाति (कद में छोटे, चौड़ी मुखाकृति तथा समतल नासिका)
- पारिवारिक परम्परा - पितृवंशीय, पितृस्थानीय, मातृसत्तात्मक
- गोत्र (कुरियों) - बड़वायक, बट्ठा, रावत, वृत्तियां, महतो, डहैत
- धर्म - हिन्दू (पुरुष हिन्दुत्व के प्रतीक रूप में सिर पर बड़ी चोटी रखते हैं)
- परिवार प्रथा - संयुक्त एवं एकाकी
- विवाह प्रथा - बदला विवाह (बहनों का आदान-प्रदान)
- इष्टदेव - खड़गाभूत व पछावन
- उपजातियाँ - राणा, डंगरिया, पछिमाह, जेगिमा व कठरिया
- पारम्परिक पोशाक - पुरुष लंगोटी, धोती, कुर्ता, टोपी आदि; स्त्रियाँ-बूटेदार कुर्ता तथा रंगीन घाघरे और बालों को ढकने के लिए काले रंग का रूमाल
- भोजन - चावल और मछली
- प्रमुख पेय पदार्थ - तम्बाकू व मदिरा
- पारम्परिक पेशा - कृषि (धान की खेती), पशुपालन व आखेट
- प्रमुख त्योहार - माघ की खिचड़ी, कन्हैया अष्टमी, होली, दशहरा, दीपावली तथा बजहर
- नृत्य - लहचारी
- नृत्य गीत - झुमड़ा
- भाषा - पहाड़ी, अवधी, नेपाली एवं भाँवरी
- जाड़ - चावल से स्वयं निर्मित मदिरा
- राज्य एवं कुमाऊँ क्षेत्र का सबसे बड़ा जनजातीय समुदाय थारू (जनसंख्या के अनुसार) है।
- पंचायतों में चार प्रकार के अधिकारी होते हैं। एक मुख्य अधिकारी चौधरी (महतौ) तथा उनकी सहायता के लिए भलेमानस, चौकीदार तथा बड़घेर होते हैं।
- थारू जनजाति में पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं को उच्च स्थान प्राप्त है।
- बड़वायक गोत्र को थारू जनजाति में उच्च माना जाता है।
- इस जनजाति की महिलाएँ शरीर पर गोदना गुदवाती हैं तथा पीतल, कांस्य व चाँदी के आभूषण पहनती हैं।
- थारूओं में मद्यपंचगण की प्रथा न्याय से सम्बन्धित है।
जौनसारी जनजाति
- मुख्य निवास स्थान - देहरादून (जौनसार भाबर क्षेत्र - कालसी, चकराता, त्यूनी व लाखमण्डल), उत्तरकाशी (परग नेकाना क्षेत्र) तथा टिहरी (जौनपुर क्षेत्र)
- वंशज/उत्पत्ति - स्वयं को पाण्डवों का वंशज मानते हैं
- नृवंशीय विशेषता - मंगोल एवं डोम प्रजाति के मिश्रित लक्षण
- पारिवारिक परम्परा - पितृसत्तात्मक
- गोत्र - कुरियों
- धर्म - हिन्दू
- विवाह प्रथा - बेवीकी, बोईदोदीकी तथा बाजदिया (उच्च कोटि)
- ईष्टदेव - महासू देवता (महाशिव)
- पारम्परिक पोशाक - पुरुष-ऊनी कोट, ऊनी पायजामा (झंगोली) तथा ऊनी टोपी (डिगुवा); स्त्रियाँ - सूती घाघरा व कुर्ती, कमीज (झगा), ढाँट (एक प्रकार का बडा रुमाल)
- पारम्परिक पेशा - कृषि एवं पशुपालन
- प्रमुख त्योहार - बिस्सू (बैसाखी), जागड़ा, पंचाई (दशहरा), दियाई (दीपावली), नुणाई, जागड़ा
- नृत्य - भैला नृत्य (दीपावली के अवसर), जंगबाजी नृत्य बिस्सू मेले के अवसर पर)
- भाषा - जौनसारी, देवघारी भाषा, बावरी भाषा व हिमाचली
- जौनसारी राज्य का दूसरा सबसे अधिक आबादी वाला जनजातीय समुदाय तथा गढ़वाल क्षेत्र का सबसे बड़ा जनजातीय समुदाय है।
- जौनसारी जनजाति तीन वर्गों (खसास, कारीगर तथा हरिजन खसास) में विभाजित है।
- इस जनजाति में झाड़-फूँक या उपचार की बायथा प्रथा प्रचलित है।
- जौनसारी लोग गाय को दहेज के रूप में देते हैं।
- इस जनजाति के लोग ऊन व अन्य चीजों से बने जूते पहनते हैं, जिन्हें आल कहा जाता है।
- ये पाँच पाण्डवों को प्रमुख देवता तथा माता कुन्ती को अपनी देवी मानकर उनकी पूजा करते हैं।
- हनौल, लाखामण्डल व कालसी जौनसारियों के प्रमुख तीर्थस्थल हैं।
- जौनसारी लोग विजयदशमी को पांयता तथा दशहरा को पाण्डव कहते हैं। यह जनजाति दशहरे को पाँच रूप में मनाती है।
बोक्सा जनजाति
- निवास स्थान - ऊधमसिंह नगर (बाजपुर व काशीपुर), पौड़ी (कोटद्वार भाबर क्षेत्र) व देहरादून (विकासनगर)
- नृवंशीय विशेषता/शारीरिक बनावट - कद में छोटा और मध्यम, चौड़ा मुख, होंठ पतले तथा चपटी नासिका
- गोत्र/उपजातियाँ - यदुवंशी, पंवार, राजवंशी, पतराजा एवं तनवार
- धर्म - हिन्दू
- परिवार प्रथा - पितृवंशीय एवं पितृसत्तात्मक
- विवाह प्रथा - हिन्दू वैदिक कर्मकाण्ड पर आधारित
- ईष्टदेव - चौमुण्डा देवी
- स्थानीय देवी-देवता - ग्राम खेड़ी देवी, साकरिया देवता, ज्वाल्पा देवी, हुल्का देवी
- पारम्परिक पोशाक - पुरुष-धोती, कुर्ता, सदरी तथा सिर पर पगड़ी धारण; स्त्रियाँ - चाँदी के गहने, लहंगा, चोली
- पारम्परिक पेशा - कृषि, पशुपालन व दस्तकारी
- प्रमुख त्योहार - चैती, नौबी, होली, नवरात्रि, ढल्या, गोटरे, होगण, मोरो तथा दीपावली
- भाषा - भावरी, कुमय्याँ एवं रच भैंसी, हिन्दी एवं कुमाऊँनी का सम्मिश्रण
- व्यवसाय - कृषि, लकड़ी, लोहे का काम, मकान बनाना, डालियाँ बनाना
- राज्य में ऊधमसिंह नगर तथा नैनीताल जिले के बोक्सा बहुल क्षेत्र को बोक्सार (बुक्साड़) के नाम से जाना जाता है।
- बोक्सा जनजाति को देहरादून में महर बोक्सा भी कहा जाता है।
- बोक्सा जनजाति हिन्दू धर्म के अत्यधिक समीप है। ये लोग महादेव, काली, दुर्गा, राम, कृष्ण आदि देवी-देवताओं की पूजा करते हैं।
- बोक्सा जनजाति में तन्त्र-मन्त्र ज्ञाता व्यक्ति को भरारे या तान्त्रिक कहा जाता है।
- बोक्सा गाँवों (मंझरा) में न्याय एवं कानून व्यवस्था के लिए एक बिरादरी पंचायत होती है, जिसमें मुन्सिफ, दरोगा एवं सिपाही होते हैं। यह 5 सदस्यी पंचायत होती है।
- पंचायत का सबसे बड़ा अधिकारी तखत होता है।
- राज्य में नैनीताल एवं उधमसिंह नगर जिले में बोक्सा परिषद् की स्थापना की गई है।
भोटिया जनजाति
- मुख्य निवास स्थान - चमोली में माणा, मलारी नीति व टोला गाँव तथा उत्तरकाशी जिले में जादूँग, नेलंग, अंगर
- वंशज - किरातवंशीय तथा खस राजपूत
- नृवंशीय विशेषता/शारीरिक बनावट - कद छोटा, सिर बडा, आँखे छोटी, नाक चपटी व चेहरा गोल (तिब्बती व मंगोलियन जाति का मिश्रित रूप)
- विवाह प्रथा - तत्सत एवं दामोला
- देवी-देवता - ग्वाला, भूम्याल, बैग-रैग-चिम, नन्दादेवी, दुर्गा, कैलाश पर्वत, द्रोणागिरी, हाथी पर्वत, घण्टाकर्ण देवता, साई देवता, सिध्वा विध्वा, तिब्बती देवी-देवता फैला व घूरमा
- उपजातियाँ - मारछा, तोलच्छा, जोहारी, शौका, दरमिया, चौंदासी, व्यासी, जाड़, जेठरा एवं छापड़ा (बखरिया)
- पारम्परिक पोशाक - पुरुष-घुटनों तक लम्बे चोगे (रंगा), सिर पर टोपी (चुकल) तथा गैजू या खगचसी (ऊनी पायजामा) ; स्त्रियाँ-आधी बाँह वाला कोट (च्यूं) तथा पूरी बाँह वाला कोट (च्यूमाला), च्यूबती (कमर में बाँधने वाला वस्त्र) तथा च्यूकलां (टोपीनुमा वस्त्र)
- भोजन - चावल या मण्डुवा का भात (छाकू), जौ-मण्डुआ गेहूँ का सत्तू, पतौड़ा, माँस
- प्रमुख पेय पदार्थ ज्या (दूध, मक्खन, चाय से बनाया जाता है) तथा छ्यकती या छंग (शराब)
- पारम्परिक पेशा कृषि, पशुपालन, व्यापार व ऊनी दस्तकारी
- प्रमुख त्योहार - प्रत्येक 12वें वर्ष कण्डाली उत्सव (किर्जी उत्सव)
- नृत्य - विवाह के अवसर पर पौणा नृत्य
- महाहिमालय में सर्वाधिक आबादी वाली जनजाति भोटिया है।
- वे भोटिया जो नीति घाटी में रहते हैं उन्हें नीरी रंड्पा तथा माणा घाटी में रहने वालों को डूनी रंड्पा कहा जाता है।
- भोटिया जनजाति ऋतु प्रवास वाली जनजाति है।
- सोसा रंड्पा उत्तरकाशी जिले में रहने वाले भोटियों को कहते हैं।
- शीतकाल प्रारम्भ होते ही ये अपने परिवार व पशुओं के साथ मुनसा या गुण्डा आ जाते हैं।
- ऊन से बने जूते को भोटिया लोग बांखे कहते हैं।
- साली-पुली शब्द का प्रयोग भोटिया लोग आभूषण के लिए करते हैं।
- भोटिया लोग लाल मनके की माला (मंसाली) तथा चाँदी के सिक्कों से बनी माला (बलडंग) को गले में पहनते हैं।
- भोटिया जनजाति की महिलाएँ सिर पर बीरावली व पतेली वाली एवं छाकरी वाली नामक आभूषण पहनती हैं।
- भोटिया लोग अँगूठी प्रकार के आभूषण को लक्षेप कहते हैं।
- भोटिया जनजाति द्वारा बड़ी रोटी को पूली तथा चावल से बने भोजन को छाकू या भात कहा जाता है।
- बाजू-वीर रस प्रधान, तिमली-सामाजिक विषय पर आधारित तथा तुबेरा लोकगीत की प्रकृति रसिया प्रकार की है।
- भोटिया लोग भेड़, बकरी एवं जीबू (गाय की तरह दिखने वाला) आदि पशुओं को पालते हैं।
- चमोली के भोटिया के सम्बन्ध में मैत एवं गुनसा से तात्पर्य निवास स्थान से है। UKPSC 2025
जाड़ जनजाति: भोटिया की उपजाति
- उत्तरकाशी में पाई जाने वाली जाड़ जनजाति बौद्ध धर्म की अनुयायी है तथा ये स्वयं को जनक वंशज मानती है।
- जाड़ लोग जादूंग व नेलांग घाटी में निवास करते हैं।
- जाड़ लोगों के प्रमुख त्योहार लोसर एवं शूरगैन हैं। लोसर त्योहार बसन्त पंचमी को मनाया जाता है।
- इस जनजाति के लोग चोगा या वपकन नामक वस्त्र धारण करते हैं।
- इसकी भाषा रोम्बा तिब्बती भाषा से मिलती-जुलती है।
- जाड़ जनजाति में लामा बौद्ध धर्म में ब्राह्मण कार्य करने वाले को कहा जाता है।
- इनमें आधुनिकता का प्रभाव कम दिखाई देता है। इनमें विघटित परिवार व्यवस्था पाई जाती है, जिसमें पुत्रों के वयस्क हो जाने पर उन्हें परिवार से अलग कर दिया जाता है।
- भवन निर्माण, कला, चित्रकारी आदि के उत्कृष्ट नमूने इनके मूल स्थान बगोरी नेलांग में देखे जा सकते हैं।
राजी जनजाति
- मुख्य निवास स्थान - पिथौरागढ़ (धारचूला, कनालीछीना, डीडीहाट), चम्पावत एवं नैनीताल
- वंशज - कोल-किरात
- नृवंशीय विशेषता/ शारीरिक बनावट - कद छोटा, मुखाकृति चपटी, होंठ बाहर की ओर मुड़े हुए
- धर्म - हिन्दू, वर्ण क्रम में रजवार (राजपूत)
- विवाह प्रथा - पलायन विवाह
- ईष्टदेव - बाघनाथ
- देवी-देवता - मलैनाथ, गणनाथ, मल्लिकार्जुन, छुरमल, नन्दादेवी
- पारम्परिक पोशाक - पुरुष-धोती, पगड़ी और अंगरखा; स्त्रियाँ लहँगा, चोली एवं ओढ़नी
- आवास - रौत्यूड़ा
- पारम्परिक पेशा - काष्ठ कला, झूम खेती
- प्रमुख त्योहार - कारक (कर्क) और मकारा (मकर) की संक्रान्ति
- नृत्य - थाड़िया
- बोली - मुण्डा (भाषा में तिब्बती तथा संस्कृत शब्दों की अधिकता), कुमाऊँनी
- राजी को बनरौत, बनराउत, जंगल का राजा तथा वनराजी आदि भी कहा जाता है।
- राजी जनजाति राज्य में सबसे कम आबादी वाली जनजाति है।
- इस जनजाति में स्त्रियों को परदे में रखने की परम्परा है। इनमें गोदना गुदवाने की भी प्रथा है।
- राजियों में सप्ताह के दिनों के नाम का अलग स्वरूप है।
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