कुमाऊँ क्षेत्र की बोलियाँ
उत्तराखण्ड की समृद्ध संस्कृति और विरासत को गहराई से समझने के लिए 'कुमाऊँ क्षेत्र की बोलियाँ और लोक साहित्य' एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है। यदि आप UKPSC, UKSSSC, Uttarakhand Police, Patwari, Forest Guard या राज्य की अन्य किसी भी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं, तो परीक्षा की दृष्टि से यह टॉपिक आपके लिए बेहद उपयोगी और स्कोरिंग साबित होगा।
इस लेख में आप क्या-क्या पढ़ेंगे:
- पहाड़ी हिन्दी और कुमाऊँनी का उद्भव: मध्य पहाड़ी समूह के अंतर्गत कुमाऊँनी व गढ़वाली बोलियों का विकास, देवनागरी लिपि का प्रयोग और विभिन्न विद्वानों (जैसे- डॉ. धीरेन्द्र वर्मा, डी.डी. शर्मा) के अनुसार इसके मूल स्रोत।
- बोलियों का वर्गीकरण: भाषा वैज्ञानिक डॉ. त्रिलोचन पाण्डे द्वारा उच्चारण और ध्वनि के आधार पर कुमाऊँनी बोली का 4 वर्गों और 12 प्रमुख बोलियों में विभाजन।
- लिखित लोक साहित्य का इतिहास: 10वीं-11वीं सदी के प्राचीन अभिलेखों (दिगांस अभिलेख) से लेकर गुमानी पन्त, सुमित्रानन्दन पन्त और 'अल्मोड़ा अखबार' के साहित्यिक योगदान की विस्तृत जानकारी।
- मौखिक लोक साहित्य व लोकगाथाएँ: कुमाऊँ की प्रसिद्ध मौखिक परम्पराएं जिनमें मालूशाही, रम्मौल, पौराणिक जागर, वीरगाथाएं (भड़ो) और पहेलियाँ (आण) शामिल हैं।
उत्तराखण्ड में बोली जाने वाली भाषाओं के समूह को पर्वतीय, पहाड़ी या उत्तरांचली कहते हैं।
पहाड़ी हिन्दी को तीन वर्गों पूर्वी पहाड़ी हिन्दी, पश्चिमी पहाड़ी हिन्दी तथा मध्य पहाड़ी हिन्दी में बाँटा गया है।
जौनसारी, हिमाचली आदि बोलियाँ पश्चिमी पहाड़ी के अन्तर्गत आती हैं।
उत्तराखण्ड राज्य का लगभग सम्पूर्ण क्षेत्र मध्य पहाड़ी समूह के अन्तर्गत आता है।
मध्य पहाड़ी हिन्दी के अन्तर्गत मुख्य रूप से गढ़वाली एवं कुमाऊँनी बोलियाँ आती हैं।
कुमाऊँनी व गढ़वाली बोलियों के लेखन में देवनागरी लिपि का प्रयोग किया जाता है।
लोकरत्न गुमानी पन्त को उत्तराखण्ड में खड़ी बोली का प्रारम्भिक रचनाकार माना जाता है।
गुमानी पन्त को हिन्दी साहित्य के अन्तर्गत रीतिकाल का कवि माना जाता है।
- कुमाऊँनी भाषा राज्य के उत्तरी तथा दक्षिणी सीमान्त को छोड़कर सम्पूर्ण कुमाऊँ क्षेत्र में बोली जाती है।
- महेश्वर प्रसाद जोशी पिथौरागढ़ के दिगांस से प्राप्त 1105-06 ई. के अभिलेख को कुमाऊँनी बोली का सर्वप्रथम प्राप्त प्राचीन तिथियुक्त अभिलेख मानते हैं।
- कुमाऊँनी बोली पर खड़ी बोली का प्रभाव अधिक होने के कारण इसे पहाड़ी हिन्दी भी कहा जाता है।
- डॉ. धीरेन्द्र वर्मा एवं बद्रीदत्त पाण्डे कुमाऊँनी बोली का विकास शौरसेनी अपभ्रंश से मानते हैं।
- खस पैशाची, प्राकृत तथा दरद से कुमाऊँनी बोली के विकास को डॉ. ग्रियर्सन, डी.डी. शर्मा व डॉ. सुनीति कुमार चटर्जी द्वारा मान्यता दी गई है।
- डी.डी. शर्मा कुमाऊँनी बोली का मूल स्रोत दरद पहाड़ी को मानते हैं।
- भाषा वैज्ञानिक डॉ. त्रिलोचन पाण्डे ने उच्चारण, ध्वनि, तत्त्व और रूप रचना के आधार पर कुमाऊँनी बोली को चार वर्गों में बाँटकर प्रमुख 12 बोलियाँ निर्धारित की हैं।
पूर्वी कुमाऊँनी वर्ग की प्रमुख बोलियाँ
| बोली | क्षेत्र |
|---|---|
| अस्कोटी | पिथौरागढ़ जिले में सीरा क्षेत्र के उत्तर-पूर्व में अस्कोट के आस-पास। इस पर सीराली, नेपाली और जौहारी बोलियों का प्रभाव दिखाई देता है। |
| सीराली | अस्कोट (पिथौरागढ़) के पश्चिम में सीरा क्षेत्र में |
| सौर्याली | पिथौरागढ़ जिले के सोर परगने में तथा दक्षिण जौहार और पूर्वी गंगोली क्षेत्र में |
| कुमाय्याँ/कुमाई | नैनीताल से लगे काली कुमाऊँ क्षेत्र, उत्तर में सरयू और पनार, पूर्व में काली, पश्चिम में देवीधुरा तथा दक्षिण में टनकपुर क्षेत्र में |
पश्चिमी कुमाऊँनी वर्ग की प्रमुख बोलियाँ
| बोली | क्षेत्र |
|---|---|
| गंगोली (गंगोई) | दानपुर व गंगोली की कुछ पट्टियों में |
| दनपुरिया | अल्मोड़ा के दानापुर के उत्तरी भाग और जौहार के दक्षिणी भाग में, इस पर गंगोली, सीराली और भोटिया बोलियों का प्रभाव दिखाई देता है। |
| चौगर्खिया | चौगर्खा क्षेत्र में, इसके अन्तर्गत रीठागाड़, रंगोड़, दारूण, सालम और लखनपुर पट्टियाँ आती हैं। |
| खसपर्जिया / खस पराजिया |
यह अल्मोड़ा जिले के बारामण्डल और दानापुर के आस-पास बोली जाती है। यह मुख्यतः खस जाति द्वारा बोली जाती है, इसलिए इसका नाम खसपर्जिया पड़ा। |
| पछाईं | यह अल्मोड़ा जिले के पछाऊँ क्षेत्र में बोली जाती है। पछाईं बोली के मुख्य केन्द्र फल्दाकोट, रानीखेत, चौखुटिया, द्वाराहाट, मासी आदि हैं। |
| फाल्दा कोटी बोली | पाली पछाऊँ के कुछ क्षेत्रों तथा फल्दाकोट, अल्मोड़ा व नैनीताल में बोली जाती है। |
पूर्व तथा पश्चिमी कुमाऊँनी के मध्य अन्तर
| पूर्व कुमाउँनी | पश्चिमी कुमाउँनी |
|---|---|
| 'न' का प्रयोग उदा पानि, स्यौनि, नान, ध्वीन, बौनि |
'न' के स्थान पर 'ण' का प्रयोग उदा पाणि, स्यौणि, नाण, ध्वीण, बौणि |
| शब्दान्त में 'ल' की ध्वनि उदा भोल, काल, बिरालु |
शब्दान्त में 'ल' की ध्वनि 'व', 'इ', 'उ' उदा भोव, काव, बिराउ |
| व्यंजन-द्वित्त्व की प्रवृत्ति | व्यंजन-द्वित्त्व का अभाव |
उत्तरी तथा दक्षिणी कुमाऊँनी वर्ग में अन्तर
| उत्तरी कुमाऊँनी वर्ग | दक्षिणी कुमाऊँनी वर्ग |
|---|---|
| जौहारी | नैनीताल कुमाऊँनी या रचभैंसी |
| यह जौहार व कुमाऊँ के उत्तर सीमावर्ती क्षेत्रों की बोली है। जौहारी पर तिब्बती भाषा का प्रभाव भी दिखाई पड़ता है। |
यह नैनीताल के रौ और चौभैंसी पट्टियों, भीमताल, काठगोदाम, हल्द्वानी आदि क्षेत्रों में बोली जाती है। |
| जौहार व कुमाऊँ के उत्तर सीमावर्ती क्षेत्रों के भोटिया लोग भी जौहारी भाषा का प्रयोग करते हैं। | नैनीताल कुमाऊँनी को कुछ स्थानों पर नैणतिलया भी कहते हैं। |
कुमाऊँनी की अन्य बोलियाँ
| बोली | विवरण |
|---|---|
| मझकुमैया | यह पृथक् बोली न होकर गढ़वाल और कुमाऊँ के सीमावर्ती क्षेत्रों में बोली जाने वाली मिश्रित बोली है, जिसमें गढ़वाली और कुमाऊँनी दोनों का मिश्रण रहता है। |
| गोरखाली बोली | प्रवासी गोरखों द्वारा नेपाल के सीमावर्ती क्षेत्रों तथा अल्मोड़ा क्षेत्रों में बोली जाती है। |
| बोक्साडी बोली | यह कुमाऊँ के दक्षिणी छोर पर रहने वाले बोक्सा जनजाति के लोगों द्वारा बोली जाती है। |
| भावरी बोली | टनकपुर (चम्पावत) से काशीपुर (उधमसिंह नगर) के मध्य क्षेत्रों में बोली जाती है। |
| रं ल्वू (रंग ल्वू) | यह बोली पिथौरागढ़ के दारमा, व्यास, चौंदास पट्टियों में बोली जाती है。 दारमा में इसे रङ ल्वू भी कहा जाता है। कुमाऊँनी बोली पर अवधि बोली का प्रभाव अधिक होने के कारण स के स्थान पर श का प्रयोग अधिक होता है। |
| शौका बोली | यह पिथौरागढ़ के उत्तरी क्षेत्र में मुख्य रूप से बोली जाती है। |
कुमाऊँनी भाषा शब्दावली
| कुमाऊँनी शब्द | हिन्दी अर्थ | कुमाऊँनी शब्द | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|---|
| कौथिक | मेला | उड्यार | गुफा |
| कौतुक | खेल-तमाशा | छिड़ | जलप्रपात |
| रात्तै | सुबह | सिमार | दलदली भूमि |
| भोल | कल | रौ | तालाब |
| छ | है | लोण | नमक |
| कत्यै | किधर | नान | छोटा |
| घ्वाग | मक्का | ब्याल | बीता हुआ कल |
| पिनाऊ | अरबी या पिण्डालू | बूबू | दादा |
| ज्यून | चन्द्रमा | इजा | माँ या माता |
| ढाँड | ओले | दैंण | सरसों |
| दिजू | बड़ी बहन | कितौल | केंचुआ |
| भौजी | भाभी | च्यल | बेटा या पुत्र |
कुमाऊँनी लोक साहित्य
कुमाऊँनी लोक साहित्य को लिखित एवं मौखिक साहित्य में वर्गीकृत किया जाता है।
लिखित लोक साहित्य
- कुमाऊँनी के विद्वान डॉ. योगेश चतुर्वेदी के अनुसार, चम्पावत के राजा थोर अभयचन्द का 989 ई. का कुमाऊँनी भाषा में लिखित ताम्रपत्र मिला है, जिससे स्पष्ट होता है कि 10वीं सदी में कुमाऊँनी, भाषा के रूप में प्रतिष्ठित थी।
- महेश्वर जोशी कुमाऊँनी भाषा का प्रथम तिथियुक्त नमूना 1105-06 ई. के दिंगास अभिलेख (पिथौरागढ़) को मानते हुए कुमाऊँनी को (संस्कृत-अपभ्रंश परम्परा से) 10वीं-11वीं शताब्दी में विकसित हुआ मानते हैं।
- लिखित साहित्य का प्रारम्भ 1800 ई. के पश्चात् से माना जाता है।
- राज्य के प्रमुख साहित्यकार गुमानी पन्त, कृष्ण पाण्डे, चिन्तामणि जोशी, गंगादत्त उप्रेती, शिवदत्त सती, ज्वालादत्त जोशी आदि हैं।
- 1871 ई. में अल्मोड़ा अखबार व वर्ष 1918 में प्रकाशित होने वाले साप्ताहिक शक्ति का साहित्य के विकास में अधिक योगदान रहा।
- कुमाऊँनी भाषा की विख्यात कविता बुरांश के रचयिता सुमित्रानन्दन पन्त हैं।
- 'अनपढ़' नाम से प्रसिद्ध शेरसिंह बिष्ट के प्रभाव से 20वीं सदी के उत्तरार्द्ध की कुमाऊँनी भाषा के शिल्प और कथ्य दोनों में परिवर्तन आया।
मौखिक लोक साहित्य
- कुमाऊँनी भाषा की प्रमुख लोकगाथा मालूशाही और रम्मौल है।
- मौखिक लोक साहित्य में लोकगीत, लोककथाएँ एवं लोकगाथाएँ आदि शामिल हैं।
- कुमाऊँनी लोकगाथा मालूशाही को पुस्तक का रूप प्रदान करने में डॉ. उर्वीदत्त उपाध्याय, डॉ. रमेश पन्त व यमुनादत्त वैष्णव का प्रमुख योगदान है।
- पौराणिक लोकगाथाओं जागर व वीरगाथाओं को भड़ो कहा जाता था।
- प्रमुख लोक धार्मिक गाथाएँ ग्वल्ल, मसाण, गढ़नाथ, एड़ी, सैम आदि हैं।
- पहेलियों को स्थानीय भाषा में आण कहते हैं।
- कुमाऊँनी लोक साहित्य में मुहावरों, पहेलियों व लोकोक्तियों का अत्यधिक प्रयोग किया जाता है।
उत्तराखण्ड की सभी प्रतियोगी परीक्षाओं की शानदार और सटीक तैयारी के लिए हमारी वेबसाइट https://www.uttarakhandgk.com/ पर नियमित रूप से विजिट करें। अपनी तैयारी को और मजबूत बनाने के लिए वेबसाइट का नाम हमेशा याद रखें - WWW.UTTARAKHANDGK.COM!

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें