गढ़वाली क्षेत्र की बोलियाँ
उत्तराखण्ड की कला, संस्कृति और भाषा का अध्ययन राज्य की सभी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। इस लेख में हम 'गढ़वाली भाषा, बोलियां और लोक साहित्य' का विस्तृत और रोचक अध्ययन करेंगे। यह शानदार टॉपिक UKPSC, UKSSSC, Uttarakhand Police, Patwari, Forest Guard जैसी सभी महत्वपूर्ण परीक्षाओं की दृष्टि से अत्यंत उपयोगी और स्कोरिंग है।
इस लेख में आप क्या-क्या पढ़ेंगे:
- गढ़वाली भाषा का स्वरूप व उत्पत्ति: शौरसैनी अपभ्रंश से गढ़वाली की उत्पत्ति और डॉ. ग्रियर्सन द्वारा किए गए गढ़वाली बोलियों के 8 प्रमुख वर्गीकरणों का स्पष्ट विवरण।
- लिखित लोक साहित्य का ऐतिहासिक सफर: 'गोरखवाणी' से साहित्य के आरम्भ से लेकर, भजन सिंह की प्रसिद्ध 'सिंहनाद' कविता और स्वतन्त्रता आन्दोलन से प्रेरित रचनाओं की पूरी विकास यात्रा।
- मौखिक साहित्य व लोक गाथाएं: उत्तराखण्ड की वीर रस से भरपूर गाथाएं (पँवाड़े) जैसे- तीलू रौतेली व कफ्फू चौहान, प्रणय गाथाएं (जीतू बगड़वाल), और पौराणिक गाथाओं (जागर) का अद्भुत संग्रह।
- महत्वपूर्ण गढ़वाली शब्दावली: परीक्षाओं में सीधे तौर पर पूछे जाने वाले विशेष स्थानीय शब्द जैसे- अखाणा-पखाणा (लोकोक्तियाँ), आण/ऐण (पहेलियां) और पण्डूली (लोकवार्ता)।
गढ़वाली भाषा - मैदानी क्षेत्र, उत्तरी सीमान्त एवं जनजातीय क्षेत्रों के अतिरिक्त सम्पूर्ण गढ़वाल में
भाषा की लिपि - देवनागरी
उत्पत्ति - शौरसैनी अपभ्रंश (अधिकांश विद्वानानुसार)
मैक्समूलर की पुस्तक साइंस ऑफ लैंग्वेज में इसकी उत्पत्ति - प्राकृत भाषा से मानी गई है।
बोली की दृष्टि से डॉ. ग्रियर्सन ने गढ़वाली भाषा को 8 भागों में (श्रीनगरी, मांझ कुमैया, राठी, टिहरयाली, दसौल्या, बधाणी, सलाणी, नागपुरिया) विभक्त किया।
मानक गढ़वाली भाषा टिहरी एवं श्रीनगर के आस-पास के क्षेत्रों में बोली जाती है।
प्रमुख गढ़वाली बोलियाँ
| बोली/उपबोली | क्षेत्र |
|---|---|
| खड़ी बोली | हरिद्वार, रुड़की और देहरादून |
| नागपुरिया उपबोली | चमोली की नागपुरी पट्टी और उसके उत्तर पश्चिमी समीपवर्ती |
| गंगाड़ी बोली | भागीरथी नदी घाटी |
| राठी बोली | दूधातोली, बिनसर, थलीसैंण के चाँदपुर और देवलगढ़ सहित चौंदकोट के तीस गाँवों में |
| सलाणी बोली | सलाव में |
| चौंदकोटी बोली, | पौड़ी जिले में |
| रवॉल्टी बोली | उत्तरकाशी के रंवाई में |
| बंगाणी बोली | उत्तरकाशी जिले के बंगाण में |
| श्रीनगरी उपबोली | श्रीनगर, देवल और इनके निकटवर्ती क्षेत्रों में |
गढ़वाली लोक साहित्य
गढ़वाली लोक साहित्य को दो भागों (लिखित एवं मौखिक साहित्य) में विभाजित किया जा सकता है
लिखित लोक साहित्य
- सामान्य रूप से गढ़वाली साहित्य का आरम्भ 1750 ई. से श्यामचन्द्र नेगी, सुदर्शन शाह (1815-56) के द्वारा गढ़वाली में लिखित गोरखवाणी से प्रारम्भ माना जाता है।
- गढ़वाली साहित्य विकास की दृष्टि से पाँच भागों (आरम्भिक काल, गढ़वाली काल, सिंहकाल, पांथरी एवं आधुनिक काल) में विभक्त है।
- गढ़वाली बोली की प्रारम्भिक काव्य रचनाएँ चेतावनी (हरिकृष्ण दोर्गादन्ति), विरह (लीलानन्द कोटनाला), बुरो संग (हर्षपुरी) आदि हैं।
- गढ़वाली साहित्य का अनमोल हीरा भजन सिंह द्वारा लिखित सिंहनाद कविता है।
- भगवती प्रसाद पंधरी द्वारा लिखित हिलांसी स्वतन्त्रता आन्दोलन से प्रेरित थी।
- गढ़वाली काल का प्रारम्भ वर्ष 1905 में प्रकाशित गढ़वाली पत्र से माना जाता है। सत्यनारायण रतूड़ी की कविता उठो गढ़वालियों का अंकन इसके प्रथम अंक में हुआ था।
- गढ़वाल जनसाहित्य परिषद् की स्थापना आधुनिक काल के प्रमुख साहित्यकारों दामोदर थपलियाल, गोपेश्वर कोठियाल, घनश्याम रतूड़ी आदि के प्रयासों से हुई थी।
मौखिक लोक साहित्य
- मौखिक लोक साहित्य की प्रमुख विधाएँ लोकगीत, लोककथा तथा लोक गाथा हैं।
- लोक गाथाएँ लोक जीवन के कथात्मक लोकगीत व गाथाओं के गायन में वाद्ययन्त्र के साथ-साथ थोड़ा-बहुत नृत्य भी शामिल है।
लोक गाथाओं के दो भाग-
- (क) लौकिक या ऐतिहासिक लोक गाथाएँ (पँवाड़े)
- (ख) पौराणिक लोक गाथाएँ (जागर)
राज्य में मुख्यतः दो प्रकार की लौकिक लोक गाथाएँ प्रेम या प्रणय गाथाएँ तथा वीरतापूर्ण गाथाएँ प्रचलित हैं।
प्रमुख वीरतापूर्ण गाथाएँ तीलू रौतेली, ऊदी, कफ्फू चौहान, गढू सुम्याल, भानू भौपेला आदि हैं।
प्रमुख प्रणय गाथाएँ जीतू बगड़वाल, फ्युंजी, कुसुमा कोलिणे आदि हैं।
पौराणिक लोक गाथाएँ (जागर) : पौराणिक काल की घटनाओं से सम्बन्धित होती हैं; जैसे- कृष्ण सम्बन्धी गाथाएँ, पाण्डव सम्बन्धी गाथाएँ।
गढ़वाली क्षेत्र में लोकोक्तियों को अखाणा-पखाणा या किस्स तथा पहेलियों को आण या ऐण कहा जाता है।
लोकवार्ता को पण्डूली नाम से जाना जाता है।
गढ़वाली में प्रयुक्त शब्दावली
| शब्द | अर्थ | शब्द | अर्थ |
|---|---|---|---|
| काका | चाचा | जवाड़ा | जौ का खेत |
| बौ | भाभी | यख-वख | यहाँ-वहाँ |
| द्यूराण | देवर की पत्नी | ब्यखनी | शाम |
| ल्य्या | सरसों | अबाटा | गलत रास्ता |
| भट | सोयाबीन | अल्खण | शरारत |
| कलौं | मटर | किरमुल | चींटी |
| भैजी | बड़ा भाई | बल्द | बैल |
| गाड़ | छोटी नदी | खुद्द | याद |
| बुण्या | जंगली भूमि | ढुंगा | पत्थर |
| बिचल्या | गाँव एवं जंगल के बीच की भूमि |
भुला | छोटा भाई |
| सट्टी | धान | जिठाणा | पति का बड़ा भाई |
| कोदा | मंडुवा | सामणि | सम्मुख या सामने |
| ओडैल | तूफान या आँधी | बौडा-बौडी | ताऊ-ताई |
| ओड़ा | दो खेतों का विभाजक बिन्दु |
नौनू-नौनी | लड़का-लड़की |
| गंगलोड़ा | नदी किनारे गोल पत्थर |
घौर | घर |
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