उत्तराखण्ड की प्राचीन महाश्म संस्कृति/प्रागैतिहासिक काल | uttarakhand ki prachin mahasam sanskriti
उत्तराखण्ड की प्राचीन महाश्म संस्कृति
उत्तराखण्ड की समृद्ध ऐतिहासिक विरासत को समझना न केवल रोमांचक है, बल्कि राज्य की आगामी परीक्षाओं की दृष्टि से अत्यंत अनिवार्य भी है। इस लेख में हमने उत्तराखण्ड के प्रागैतिहासिक काल से लेकर ऐतिहासिक काल तक के उन सभी महत्वपूर्ण तथ्यों का संकलन किया है, जो UKPSC, UKSSSC, उत्तराखण्ड पुलिस, पटवारी, फॉरेस्ट गार्ड और अन्य राज्य स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए 'गेम-चेंजर' साबित हो सकते हैं। यह लेख आपको राज्य की प्राचीन महाश्म संस्कृति, प्रमुख शिलालेखों और पौराणिक स्थलों की गहन जानकारी प्रदान करता है।
इस लेख में आप क्या-क्या पढ़ेंगे:
- प्राचीन खोजें और कपमार्क्स: रॉबर्ट कार्नाक द्वारा खोजी गई महाश्म संस्कृति और द्वाराहाट के चन्द्रेश्वर मन्दिर से मिले प्रसिद्ध ओखल (कपमार्क्स) का विवरण।
- प्रमुख प्रागैतिहासिक स्थल: लाखु उड्यार, ग्वारख्या गुफा, और मलारी गाँव से प्राप्त 5.2 किग्रा सोने के मुखौटे जैसे दुर्लभ साक्ष्यों की पूरी जानकारी।
- पौराणिक एवं ऐतिहासिक संदर्भ: ऋग्वेद, स्कन्दपुराण और महाभारत काल में उत्तराखण्ड के विभिन्न क्षेत्रों (गढ़वाल और कुमाऊँ) के प्राचीन नाम और उनके महत्व।
- महत्वपूर्ण शिलालेख और लिपियाँ: सम्राट अशोक का कालसी शिलालेख, राजकुमारी ईश्वरा का लाखामण्डल लेख और विभिन्न स्थानों से प्राप्त ताम्रपत्रों का विस्तृत विश्लेषण।
रॉबर्ट कार्नाक द्वारा 1877 ई. में महाश्म संस्कृति की आकृतियों की खोज की गई थी। इन्होंने कपमार्क्स का सर्वप्रथम उल्लेख किया था, जिनका सम्बन्ध महाश्म संस्कृति से है।
द्वाराहाट के चन्द्रेश्वर मन्दिर के दक्षिण से महाश्म संस्कृति से सम्बन्धित लगभग 200 कपमार्क्स (ओखल), 12 समानान्तर पंक्तियों में खुदे मिले हैं।
उत्तराखण्ड इतिहास के कालखण्ड
विभिन्न कालों के अनुक्रम में राज्य का इतिहास प्रागैतिहासिक, आद्य ऐतिहासिक एवं ऐतिहासिक काल में विभाजित किया जा सकता है, जिनका विवरण इस प्रकार है-
प्रागैतिहासिक काल
जिस कालखण्ड के अध्ययन हेतु केवल पुरातात्विक स्रोत ही उपलब्ध होते हैं, वह प्रागैतिहासिक काल कहलाता है।
उत्तराखण्ड में निम्न प्रागैतिहासिक साक्ष्य उपलब्ध हैं-
- उत्तरकाशी (पौराणिक नाम सौम्यकाशी) के हुडली (यमुना घाटी) नामक स्थान से नीले रंग में चित्रित शैलचित्र प्राप्त हुए हैं।
- चित्रित धूसर मृद्भाण्ड के साक्ष्य गढ़वाल क्षेत्र से प्राप्त किए गए हैं।
- अल्मोड़ा के कालामाटी व मल्लापैनाली नामक स्थानों से भी शैलचित्र मिले हैं।
उत्तराखण्ड के प्रमुख प्रागैतिहासिककालीन स्थल
| स्थल/स्थिति | खोजकर्ता (वर्ष) | साक्ष्य |
|---|---|---|
| खुटानीनाला (नैनीताल) | यशोधर मठपाल | पाषाणकालीन उपकरण |
| लाखु उड्यार (गुफा) (दलबैण्ड, अल्मोड़ा, सुयाल नदी के तट पर) | डॉ. एम.पी. जोशी (1968) | लाखु गुफा से मानव एवं पशुओं के रंगीन शैलचित्र प्राप्त हुए हैं। इसमें तीन प्रकार के रंगों का प्रयोग हुआ है। इन शैलचित्रों का मुख्य विषय सामूहिक नृत्य या नृत्तक मण्डली है। |
| ल्वेथाप (अल्मोड़ा) | - | लाल रंग में चित्रित तीन शैलाश्रय |
| पेटशाल व फड़कानौली (अल्मोड़ा, सुयाल नदी के तट पर) | यशोधर मठपाल फड़कानौली (1985 में) तथा पेटशाल (1989 में) | पेटशाल से मानव आकृतियाँ प्राप्त हुई हैं, जिनका रंग कत्थई है। फड़कानौली से तीन शैलाश्रयों की खोज की गई है। |
| फलसीमा (अल्मोड़ा) | - | योग तथा नृत्य मुद्रा में मानव चित्र, फलसीमा में दो चट्टानों से दो कपमार्क्स (ओखल) प्राप्त |
| अल्मोड़ा के पाषाणकालीन स्थल (नौला-जैनल गाँव तथा सानणा एवं बसेड़ी गाँव) | यशोधर मठपाल | सानणा एवं बसेड़ी ग्राम से दो प्रकार के शवाधान सिस्ट व अर्न बैरियल |
| बनकोट (पिथौरागढ़) | 1989 | 8 ताम्र मानव आकृतियाँ (अल्मोड़ा के राजकीय संग्रहालय में संरक्षित) |
| ग्वारख्या गुफा (डुंग्री गाँव, चमोली) | राकेश भट्ट | मनुष्यों का त्रिशूल आकार में अंकन तथा मनुष्यों द्वारा पशुओं को हांका मारकर घेरते या भगाते हुए चित्र |
| किमनी गाँव (पिण्डर घाटी, थराली) | - | हल्के सफेद रंग से चित्रित हथियार तथा पशुओं के शैलचित्र |
मण्डलाकार शवाधान
खोजकर्ता - शिवप्रसाद डबराल (वर्ष 1956)
राहुल सांकृत्यायन ने इन्हें खस जाति के शवाधान बताया है।
ये शवाधान पहाड़ी काटकर बनाए गए थे, जिनमें शवों के घुटनों को मोड़कर पार्श्व स्थिति में लिटाया जाता था।
ऐतिहासिक काल
- ऐतिहासिक काल की जानकारी के स्रोत - पौराणिक ग्रन्थ
- उत्तराखण्ड राज्य का प्रथम उल्लेख - ऋग्वेद में (देवभूमि एवं मनीषियों की पूर्ण भूमि के रूप में)
- ऋग्वेद में उत्तराखण्ड क्षेत्र का नाम - उशीनगर
- उत्तराखण्ड के लिए उत्तर-कुरु शब्द का प्रयोग - ऐतरेय ब्राह्मण ग्रन्थ में
- वाकदेवी (सरस्वती) का निवास स्थान - बद्रीनाथ/बद्रिकाश्रम (ब्राह्मण ग्रन्थ 'कौषतकी' के अनुसार)
- स्कन्दपुराण में उल्लेखित 5 हिमाालयी खण्ड - नेपाल, मानसखण्ड, केदारखण्ड, जालन्धर एवं कश्मीर
पुराणों में मायाक्षेत्र व गंगाद्वार (हरिद्वार) से हिमालय तक के विस्तृत क्षेत्र को केदारखण्ड (गढ़वाल) कहा गया है।
ऋग्वैदिक काल में आर्य समाज 5 कबीलों पुरु, अनु, यदु, तुर्वश और द्रुह्यु में विभक्त था। इनमें से एक समूह पुरुवंशी जिसको कालान्तर में कुरुवंशी या भरतवंशी भी कहा गया था, इन्हीं में से एक राजा त्रित्सु मध्य हैमवत का शासक था।
महान कवि कालिदास ने अपने महाकाव्य 'रघुवंश' में गढ़वाल हिमालय के लिए गौरी-गुरु शब्द का प्रयोग किया है।
वर्तमान क्षेत्रों के प्राचीन नाम
| प्राचीन नाम | वर्तमान क्षेत्र |
|---|---|
| बाड़ाहाट | उत्तरकाशी |
| केदारखण्ड, तपोभूमि, बद्रिकाश्रम क्षेत्र, हिमवन्त, उत्तरकुरु, स्वर्गभूमि | गढ़वाल |
| मानसखण्ड | कुमाऊँ |
| मायाक्षेत्र व गंगाद्वार | हरिद्वार |
| गोविषाण | काशीपुर कनिष्ठ सहायक 2023 |
| सुबाहुपुर व श्रीक्षेत्र | श्रीनगर |
मलारी गाँव
- वर्ष 1983 व 2001 में गढ़वाल विश्वविद्यालय द्वारा मलारी गाँव का सर्वेक्षण किया गया। यह गाँव चमोली जिले में जोशीमठ के पास भारत-तिब्बत सीमा के निकट स्थित है।
- मलारी सर्वेक्षण में एक पशु का कंकाल मिला है। इस पशु की पहचान हिमालयी पशु वृषभ जुबू (जोबा) के रूप में की गई है।
- 5.2 किग्रा सोने के मुखावरण (मुखौटा) वाले नरकंकाल व मिट्टी के बर्तन भी मलारी से प्राप्त हुए हैं। यहाँ से प्राप्त मिट्टी के बर्तन पाकिस्तान की स्वात घाटी के शिल्प के समान थे।
- एक हत्थे युक्त कुतुप और काले व धूसर मृद्भाण्ड पर चित्रित मोनाल का चित्र प्राप्त हुआ है।
उत्तराखण्ड का गढ़वाल क्षेत्र
- महाभारत काल में श्रीनगर का शासक - सुबाहु
- महाभारत काल में गंगाद्वार का शासक - नागराज कौरव्य
- गढ़वाल क्षेत्र में प्राचीनकालीन दो विद्यापीठ - बद्रिकाश्रम और कण्वाश्रम
- केदारखण्ड व मानसखण्ड की सीमाओं का विभाजक - बधाण क्षेत्र या नन्दादेवी पर्वत
- केदारखण्ड का विस्तार - गंगाद्वार से हिमालय व टोंस (तमसा) नदी से नन्दादेवी (बौद्धांचल)
- मनुष्यों के आदिपूर्वज मनु का निवास स्थल - गढ़वाल क्षेत्र के अल्कापुरी (कुबेर की राजधानी)
- प्राचीन ग्रन्थों में केदारनाथ का नाम - भृगुतुंग (महाभारत के वन पर्व में)
कण्वाश्रम
यह आश्रम पौड़ी जिले (कोटद्वार) में स्थित है। इसी आश्रम में चक्रवर्ती सम्राट राजा भरत का जन्म हुआ था।
कालिदास ने अभिज्ञानशाकुन्तलम् की रचना मालिनी नदी के तट पर स्थित कण्वाश्रम में की थी।
इस आश्रम को वर्तमान में चौकाघाट के नाम से जाना जाता है। यहाँ बसन्त पंचमी के दिन मेला लगता है।
कण्वाश्रम हस्तिनापुर के शासक राजा दुष्यन्त व गुरु विश्वामित्र व मेनका की पुत्री शकुन्तला की प्रेम कहानी के कारण प्रसिद्ध है।
- पंवार वंश के राजा अजयपाल ने उत्तराखण्ड के 52 गढ़ों (पहाड़ी किलों) को जीता था, जिसके बाद से इस क्षेत्र को गढ़वाल कहा जाने लगा।
- इस क्षेत्र में बहने वाली छोटी-छोटी गाड़ों (नहरों) की अधिकता के कारण हरिदत्त भट्ट शैलेश ने यहाँ से गढ़वाल शब्द की उत्पत्ति बताई है।
- गढ़वाल की सीमाओं की लम्बाई 50 योजन व चौड़ाई 30 योजन केदारखण्ड में बताई गई है।
- ऋग्वेद में वर्णित है कि इस क्षेत्र के असुर राजा शम्बर के 100 गढ़ों को देवराज इन्द्र और सुदास ने नष्ट कर दिया था।
- महाभारतकालीन राजा विराट जिनकी पुत्री उत्तरा का विवाह अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु से हुआ था, की राजधानी जौनसार के विराटगढ़ी में थी।
- महाभारत के आदिपर्व के अनुसार, नागराज कौरव्य की कन्या उलुपी का विवाह अर्जुन के साथ गंगाद्वार में हुआ था।
- देवप्रयाग को महाभारत में तीर्थ शिरोमणि व समग्र पापों का विनाशक कहकर सम्बोधित किया गया है।
- महाभारत के वन पर्व (गढ़वाल क्षेत्र) में पाण्डवों का आगमन लोमश ऋषि के साथ बताया गया है।
- बौद्ध साहित्य में उशीरध्वज नामक स्थान पर भगवान बुद्ध के गमन की जानकारी मिलती है, जिसे वर्तमान कनखल के रूप में जाना जाता है।
उत्तराखण्ड का कुमाऊँ क्षेत्र
- कुमाऊँ शब्द की उत्पत्ति संस्कृत शब्द 'कूर्मांचल' से मानी जाती है।
- मानसखण्ड के क्षेत्र का कूर्मांचल नाम कान्तेश्वर पर्वत (वर्तमान नाम-काण्डादेव या कानदेव) के नाम पर रखा गया है।
- भगवान विष्णु का कच्छपावतार का स्थान कान्तेश्वर पर्वत (चम्पावत) है।
कुमाऊँ (रामक्षेत्र) का प्रथम उल्लेख स्कन्दपुराण के मानसखण्ड में मिलता है। पटवारी परीक्षा 2023
- ब्रह्म एवं वायुपुराण के अनुसार कुमाऊँ क्षेत्र में किरात, किन्नर, यक्ष, गन्धर्व, नाग एवं विद्याधर जातियाँ निवास करती थीं।
- महाभारत काल में कूर्मांचल क्षेत्र में किरात, किन्नर, यक्ष, तंगव, कुलिन्द (कुणिन्द) तथा खस जातियाँ निवास करती थीं।
- अल्मोड़ा के जाखन देवी मन्दिर से कूर्मांचल क्षेत्र में यक्षों के निवास के साक्ष्य प्राप्त होते हैं।
- कुमाऊँ के लिए कामादेश का सम्बोधन पुरुषोत्तम सिंह के बोधगया अभिलेख में मिलता है।
उत्तराखण्ड के विभिन्न ऐतिहासिक स्थलों के नाम व उनके स्रोत
| नाम | स्रोत |
|---|---|
| उत्तरकौशल (कुमाऊँ) | रामायण काव्य |
| कूर्मांचल (कुमाऊँ) | मानोदय काव्य |
| कामादेश (कुमाऊँ) | बोधगया अभिलेख |
| अलकनन्दा | विष्णुपुराण |
| नगाधिराज | कुमारसम्भवम् |
| बद्रिकाश्रम, मन्दाकिनी | विनय पत्रिका |
| गौरी गुरु | रघुवंश महाकाव्य |
| कनखल, अल्कापुरी | मेघदूत |
| कौशकी, सरयू | वायुपुराण एवं श्रीमद्भागवत गीता |
| श्यामशाह, लक्ष्मीचन्द | जहाँगीरनामा |
| अल्कापुरी, कैलाश | मत्स्यपुराण |
| श्रीपर्वत, तुषार शैल | हर्षचरित |
| कुमाऊँगढ़ | पृथ्वीराजरासो |
उत्तराखण्ड के प्रमुख लेख
- शिलालेख प्राप्ति स्थल - कालसी, लाखामण्डल, सिरोली व माणा
- ईंट पर उत्कीर्ण लेख - बाड़वाला व नैनीताल से
- त्रिशूल लेख - रुद्रशिव मन्दिर, गोपेश्वर (नागपतिनाग व अशोकचल्ल के), बाड़ाहाट से
- मूर्तिपीठिका लेख - देवलगढ़ व कोलसारी से
- मुद्रालेख - मोरध्वज (तीसरी सदी का)
- शंख लिपि प्रयुक्त लेख - बाड़ाहाट (त्रिशूल लेख)
कुषाणकालीन मुद्राओं के प्रमुख प्राप्ति स्थल मुनिकीरेती तथा सुमाड़ी हैं।
कार्तिकेयपुर राजाओं के ताम्रपत्र एवं शिलालेख पाण्डुकेश्वर (4), कण्डारा (1) व बैजनाथ, बागेश्वर एवं बालेश्वर मन्दिर (चम्पावत) से प्राप्त हुए हैं।
देहरादून के जौनसार-बावर स्थित लाखामण्डल से प्राप्त राजकुमारी ईश्वरा के शिलालेख के अनुसार, यमुना उपत्यका में यादवों का शासन था।
देवप्रयाग व कल्पनाथ में गुफाओं के अन्दर दीवारों से लेख प्राप्त हुए हैं।
कालसी शिलालेख
- उत्कीर्णकर्ता- मौर्य शासक सम्राट अशोक (257 ई. पू.)
- स्थिति - कालसी (देहरादून) में टोंस तथा यमुना के संगम पर
- खोजकर्ता - मि. फॉरेस्ट (1860 के दशक में)
- भाषा - प्राकृत (ब्राह्मी लिपि)
अशोक के कालसी अभिलेख में राज्य के निवासियों के लिए पुलिन्द व क्षेत्र के लिए अपरान्त शब्द का प्रयोग किया गया है।
सुधनगर व कलकूट कालसी के प्राचीन नाम हैं, यह कुणिन्दों की राजधानी के रूप में भी प्रसिद्ध थी।
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