उत्तराखण्ड के प्राचीन राजवंश | Uttarakhand ke prachin rajvansh
उत्तराखण्ड के प्राचीन राजवंश
देवभूमि उत्तराखण्ड का इतिहास प्राचीन राजवंशों की गौरवगाथाओं और उनके ऐतिहासिक साक्ष्यों से भरा पड़ा है। इस विशेष लेख में हम कुणिन्द राजवंश, कुषाण, नागवंश और पौरव वंश जैसे प्रमुख राजवंशों पर विस्तार से चर्चा करेंगे। यह विषय UKPSC, UKSSSC, Uttarakhand Police, Patwari, Forest Guard आदि जैसी सभी उत्तराखण्ड राज्य स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
इस लेख में आप क्या-क्या पढ़ेंगे:
- कुणिन्द राजवंश का इतिहास: उत्तराखण्ड की प्रथम राजनीतिक शक्ति 'कुणिन्द वंश', उनके सबसे प्रतापी शासक अमोघभूति और अमोघभूति, अल्मोड़ा व चत्रेश्वर प्रकार की मुद्राओं की विस्तृत जानकारी।
- विभिन्न प्राचीन राजवंश व शिलालेख: शक, कुषाण, यौधेय, और नागवंश के प्रमुख ऐतिहासिक साक्ष्य, लाखामण्डल और गोपेश्वर त्रिशूल लेख से जुड़े परीक्षापयोगी महत्वपूर्ण तथ्य।
- हर्षवर्द्धन काल और पौरव वंश: हर्षवर्द्धन काल में उत्तराखण्ड की स्थिति, चीनी यात्री ह्वेनसांग के वृत्तान्त, तालेश्वर ताम्रपत्र और कान्यकुब्ज के विघटन के बाद बने ब्रह्मपुर (पौरव वंश) एवं गोविषाण राज्य का सम्पूर्ण ऐतिहासिक वर्णन।
कुणिन्द राजवंश
- उत्तराखण्ड पर शासन करने वाली प्रथम राजनीतिक शक्ति कुणिन्द थे।
- डॉ. यशवन्त कठौच के अनुसार, उत्तराखण्ड क्षेत्र में इनका शासन (200 ई. पू. से 300 ई. तक) रहा।
- इनकी दो राजधानियाँ थीं; प्रथम कालकूट (कालसी) तथा दूसरी शत्रुघ्न नगर (मथुरा)।
- कुणिन्द वंश का सबसे प्रतापी शासक अमोघभूति था। वह शैव धर्म का अनुयायी था।
- कुणिन्द शासन का उल्लेख पाणिनी की अष्टाध्यायी व यूनानी लेखक टॉलमी के ग्रन्थों में मिलता है।
- कालसी अभिलेख से ज्ञात होता है कि प्रारम्भिक कुणिन्द मौर्यों के अधीन थे।
- महाभारत में कुणिन्दों को द्विज तथा कुणिन्द नरेशों को द्विज श्रेष्ठ कहा गया है।
- पश्चिम में ब्यास से लेकर अलकनन्दा तक तथा दक्षिण में सुनेत से बेहद तक 'अमोघभूति' की रजत व ताम्र मुद्राएँ प्राप्त हुई हैं, जिन पर राज्ञ: कुणिन्दस अमोघभूतिस महरजस अंकित था।
- कुणिन्द शासक सुबाहु का उल्लेख महाभारत के वन पर्व में मिलता है।
कुणिन्द मुद्राएँ
कुणिन्दों के सम्बन्ध में जानकारी का स्रोत उनकी निम्न तीन प्रकार की मुद्राएँ हैं-
1. अमोघभूति मुद्राएँ
धातु
रजत व ताम्र
लिपि
ब्राह्मी लिपि व खरोष्ठी
मुद्राओं के अग्रभाग पर देवी, मृग, स्वास्तिक, चक्र, नाग व चैत्य का अंकन किया गया है।
2. अल्मोड़ा मुद्राएँ
वर्तमान तक अल्मोड़ा भाँति के लगभग 58 सिक्के प्रकाश में आए हैं, जिनमें आठ कुणिन्द शासकों शिवदत्त, हरदत्त, शिवपालित, शिवरक्षित, गोमित्र, विजयभूति, म-ग-भ-त-स एवं अशोक के नाम मिलते हैं। इनकी खोज वर्ष 1975 में हुई थी। ये ब्रिटिश संग्रहालय, लन्दन में संरक्षित हैं।
कत्यूर घाटी से कुणिन्द शासकों की 54 मुद्राएँ प्राप्त हुई हैं, जिनमें से एक शिवदत्त की, एक आसेक की और शेष मुद्राएँ गोमित्र की हैं।
डॉ. महेश्वर जोशी को मिली शिवरक्षित राजा की एक ताम्र मुद्रा भी ब्रिटिश संग्रहालय में संरक्षित है।
3. चत्रेश्वर मुद्राएँ
इन मुद्राओं पर ब्राह्मी लिपि में भागवत चत्रेश्वर महात्मनः लेख मिलता है। डी.सी. सरकार इसे भगवतः चत्रेश्वर महात्मनः मानते हैं।
ये मुद्राएँ कुणिन्दों के अधिष्ठाता देव छत्रेश्वर या चत्रेश्वर के नाम पर बनाई गई हैं। इसके पुरोभाग में दो हाथ वाली मूर्ति का अंकन है, जिसके दाँए हाथ में परशु-त्रिशूल है।
एम. पी. जोशी की प्रसिद्ध रचना, मॉर्फोलॉजी ऑफ कुणिन्दा कॉइन्स कुणिन्द मुद्राओं पर प्रकाश डालती है।
अमोघभूति के पश्चात् उत्तराखण्ड के मैदानी क्षेत्रों में शकों का अधिकार हो गया था।
उत्तराखण्ड में अन्य वंश
शक राजवंश
कुमाऊँ में शक सम्वत् के प्रचलन व कटारमल के सूर्य मन्दिर से उत्तराखण्ड में शकों के शासन की पुष्टि होती है।
कुषाण वंश
- कुषाणकालीन मुद्राएँ प्राप्ति स्थल - वीरभद्र (ऋषिकेश), मोरध्वज (कोटद्वार) और गोविषाण (काशीपुर)
- गोविषाण सिक्कों की खोज - के. पी. नौटियाल (वर्ष 1960 में)
शकों के पश्चात् प्रथम सदी के उत्तरार्द्ध में राज्य के तराई वाले भाग पर कुषाणों ने अधिकार कर लिया।
खटीमा से प्राप्त 7 स्वर्ण मुद्राओं पर वसु नामक शासक का नाम मिलता है।
यौधेय वंश
कुणिन्दों के समकालीन यौधेय शासकों की ताम्र मुद्राएँ जौनसार-भाबर (देहरादून) तथा कालो-डाण्डा (लैंसडाउन) से मिली हैं, जो उनके शासन की पुष्टि करती हैं।
इन पर इष्ट देवता शूलधारी कार्तिकेय का चित्र यौधेयकालीन मुद्राओं पर अंकित है।
यौधेय शासकों के द्वि व त्री मुद्रालेख वाले सिक्के भी प्राप्त हुए हैं।
युगशैल का गोत्रीय वंश
- राज्य - कालसी प्रदेश के निकटवर्ती क्षेत्र में
- सबसे प्रतापी शासक - शीलवर्मन
बाड़वाला यज्ञ वेदिका का निर्माण शीलवर्मन ने जगतग्राम (देहरादून) में कराया था।
कुलूत वंश व काशीपुर (गोविषाण) का मित्र वंश
- राज्य- काँगड़ा जिले की कुल्लू घाटी से
- सबसे प्रतापी शासक- वीरयश
- विवरण- वृहत्संहिता व मुद्रा राक्षस से
- कुलूत शासक वीरयश की वृत्ताकार रजत मुद्राएँ प्राप्त हुई हैं।
- मित्र वंश के शासक मातृमित्र व पृथ्वीमित्र का उल्लेख काशीपुर में मिलता है।
हिमालय का कर्त्तुपुर राज्य
- संस्थापक - कुणिन्द
- राजधानी - कार्तिकेयपुर
- राज्य में शामिल क्षेत्र - उत्तराखण्ड, हिमाचल प्रदेश तथा रोहिलखण्ड का उत्तरी भाग
समुद्रगुप्त के प्रयाग प्रशस्ति अभिलेख में कर्त्तुपुर को गुप्त साम्राज्य की उत्तरी सीमा पर स्थित एक अधीनस्थ राज्य कहा गया है।
राहुल सांकृत्यायन के अनुसार, हिमालय का कुछ भाग हूण शासक तोरमाण व मिहिरकुल के अधीन रहा था।
छागलेश वंश
- संस्थापक - नरपति जयदास
- अन्तिम राजा - नामक्षत
छागलेश वंश से सम्बन्धित साक्ष्य लाखामण्डल के खण्डित शिलालेख से मिले हैं। इस शिलालेख में 7 राजाओं के नाम मिलते हैं।
सिंहपुर का यदु वंश
- राज्य में शासन - 6वीं-7वीं शताब्दी
- संस्थापक - श्री सेनवर्मन
- राजधानी - यमुना प्रदेश सिंहपुर
- स्रोत - लाखामण्डल शिलालेख
यदु वंश की 11 पीढ़ियों व 12 शासकों के नाम लाखामण्डल से प्राप्त राजकुमारी ईश्वरा के लेख से मिलते हैं।
राजकुमारी ईश्वरा भास्करवर्मन की पुत्री तथा जालन्धर राजकुमार चन्द्रगुप्त की पत्नी थी।
राजकुमारी ईश्वरा ने लाखामण्डल में एक शिव मन्दिर का निर्माण कराया था।
नागवंश
- राज्य में शासन - 6वीं-7वीं शताब्दी
- नागवंश की पुष्टि - गोपेश्वर त्रिशूल लेख से
त्रिशूल लेख में 6वीं-7वीं शताब्दी में प्रचलित दक्षिणी ब्राह्मी लिपि का प्रयोग किया गया है।
इस लेख में 4 प्रमुख नाग राजाओं स्कन्दनाग, गणपति नाग, विभुनाग तथा अशुनाग के नाम का उल्लेख है।
गोपेश्वर त्रिशूल लेख के अनुसार, गणपति नाग ने अपने दूसरे राज्य वर्ष में रुद्रमहालय के सामने शक्ति (त्रिशूल) की स्थापना की थी।
मौखरि राजवंश
- राजधानी - कन्नौज
- प्रथम शासक - हरिवर्मा
- अन्तिम शासक - गृहवर्मा
मौखरि राजवंश का उत्तराखण्ड पर अधिकार 6वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध (नागों की सत्ता समाप्त कर) में हुआ।
गृहवर्मा की हत्या के पश्चात् मौखरि राज्य उसके बहनोई थानेश्वर नरेश हर्षवर्धन के अधीन हो गया।
हर्षवर्द्धन वंश काल में उत्तराखण्ड
- बाणभट्ट द्वारा रचित हर्षचरित में हर्षवर्द्धन के शासनकाल में उत्तराखण्ड भ्रमण पर आने वाले लोगों का वर्णन मिलता है।
- हर्षकालीन चीनी यात्री ह्वेनसांग, हिमालय में बौद्ध धर्म के लिए प्रसिद्ध पो-लो-हि-मो-पु-लो (ब्रह्मपुर) राज्य में गया था। उस समय यह राज्य हर्षवर्द्धन के अधीन था। ह्वेनसांग ने यहाँ 5 बौद्ध विहारों का उल्लेख किया है।
- ह्वेनसांग ने हरिद्वार के लिए मो-यु-लो शब्द का प्रयोग किया है तथा इसका क्षेत्रफल 20 ली (चीनी माप बताया) बताया है। ह्वेनसांग ने गंगा के लिए महाभद्रा शब्द का प्रयोग किया है।
- आधुनिक गढ़वाल व कुमाऊँ वाले सम्पूर्ण भू-भाग को एलेक्जेण्डर कनिंघम ने ब्रह्मपुर कहा है।
- 647 ई. में कान्यकुब्ज में वर्द्धन वंश का अन्त हो गया था।
- हर्षवर्द्धन की मृत्यु के पश्चात् कान्यकुब्ज राज्य तीन भागों में विघटित हो गया। ये तीन राज्य ब्रह्मपुर, शत्रुघ्न और गोविषाण थे। ब्रह्मपुर राज्य तीनों राज्यों में सबसे प्रमुख था।
- इन तीनों राज्यों का वर्णन ह्वेनसांग के यात्रा वृत्तान्त सी-यू-की से मिलता है।
ब्रह्मपुर राज्य का पौरव (पर्वताकार) वंश
कान्यकुब्ज राज्य के विघटन से उत्पन्न तीन राज्यों में से ब्रह्मपुर पर पौरव वंश का शासन था। विष्णुवर्मन पौरव वंश का संस्थापक था।
पौरव वंश की जानकारी हर्षवर्द्धन के मधुवन एवं बाँसखेड़ा अभिलेख से प्राप्त होती है।
गंगा नदी से लेकर पूर्व में करनाली नदी तक ब्रह्मपुर साम्राज्य विस्तृत था तथा सोनवंशीय पौरव राजा ब्रह्मपुर के नरेश थे।
पौरव वंश ने 6वीं से 8वीं शताब्दी तक शासन किया था।
अल्मोड़ा से प्राप्त तालेश्वर ताम्रपत्र की खोज वर्ष 1915 में हुई थी, जिसका सम्बन्ध पौरव एवं ब्रह्मपुर राज्य से था।
तालेश्वर ताम्रपत्र संस्कृत भाषा एवं गुप्त ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण है।
- ध्युतिवर्मन व विष्णुवर्मन शासकों का उल्लेख तालेश्वर ताम्रपत्र में मिलता है। कनिष्ठ सहायक, 2023
पौरव वंश के ताम्रपत्रों में 5 शासकों विष्णुवर्मन, विष्णुवर्मन-I, वृषवर्मन, अग्निवर्मन तथा ध्युतिवर्मन का नामोल्लेख मिलता है।
वीरणेश्वर स्वामी पौरवों के कुल देवता थे।
महाराजाधिराज परम भट्टारक पौरव वंश के शासकों की उपाधि थी।
गोविषाण राज्य
कान्यकुब्ज राज्य के विघटन से उत्पन्न तीसरा राज्य गोविषाण था।
इस राज्य का विस्तार पूर्व में शारदा नदी से पश्चिम में रामगंगा नदी तक था।
- गोविषाण राज्य के अधीन काशीपुर (उधमसिंह नगर) रामपुर व पीलीभीत (ब्रिटिश इतिहासकार एलेक्जेण्डर कनिंघम के अनुसार) क्षेत्र थे।
काशीपुर के उज्जैन गाँव में निर्मित पुराने दुर्ग या किले को भी कनिंघम ने गोविषाण राज्य से सम्बन्धित बताया है।
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