उत्तराखण्ड का कार्तिकेयपुर राजवंश | Uttarakhand ka kartikeypur rajvansh
उत्तराखण्ड का कार्तिकेयपुर राजवंश
उत्तराखण्ड के इतिहास को गहराई से समझने के लिए 'कार्तिकेयपुर राजवंश' का अध्ययन बेहद महत्वपूर्ण है। मध्य हिमालय और उत्तराखण्ड का यह प्रथम ऐतिहासिक राजवंश माना जाता है। यह महत्वपूर्ण टॉपिक UKPSC, UKSSSC, उत्तराखण्ड पुलिस, पटवारी, फॉरेस्ट गार्ड जैसी सभी आगामी राज्य स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से अत्यंत उपयोगी है। इस विषय से परीक्षाओं में लगातार प्रश्न पूछे जाते हैं, इसलिए अपनी तैयारी को यहाँ से और धार दें!
इस लेख में आप क्या-क्या पढ़ेंगे:
- प्रथम ऐतिहासिक राजवंश का उदय: कार्तिकेयपुर राजवंश की विभिन्न राजधानियों (जोशीमठ और बैजनाथ) और इस वंश के तीनों मुख्य परिवारों (जैसे- बसन्त देव, निम्बर और सलोणादित्य वंश) का विस्तृत वर्णन।
- प्रतापी शासक और उनकी उपलब्धियां: कत्यूरी वंश के सबसे शक्तिशाली राजा ललितशूर देव का शासनकाल और ईष्टगण देव द्वारा सम्पूर्ण उत्तराखण्ड को एक सूत्र में बांधने के ऐतिहासिक प्रयास।
- वास्तुकला का स्वर्णकाल: उत्तराखण्ड के इस स्वर्णकाल के दौरान हुए प्रमुख निर्माण कार्य; जैसे- नृसिंह मंदिर, बैजनाथ मंदिर, और पलेठी के सूर्य मन्दिर से जुड़े परीक्षापयोगी तथ्य।
- गुरु शंकराचार्य का उत्तराखण्ड आगमन: कार्तिकेयपुर शासनकाल में आदि गुरु शंकराचार्य जी का आगमन, ज्योतिर्मठ (बद्रिकाश्रम) की स्थापना और 820 ई. में केदारनाथ में उनके शरीर त्याग का प्रामाणिक विवरण।
बैजनाथ, पाण्डुकेश्वर, कण्डारा, बागेश्वर, चम्पावत से प्राप्त ताम्रपत्र एवं शिलालेखों के आधार पर मध्य हिमालय एवं उत्तराखण्ड का प्रथम ऐतिहासिक राजवंश कार्तिकेयपुर वंश को माना गया है।
- प्रारम्भिक राजधानी - कार्तिकेयपुर, जोशीमठ (चमोली) के दक्षिण में
- दूसरी राजधानी - बैद्यनाथ-कार्तिकेयपुर (अल्मोड़ा के कत्यूर घाटी स्थित बैजनाथ (बागेश्वर) के पास)
- कार्तिकेयपुर राजाओं के लिए एटकिंसन कत्यूरी शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग
- कार्तिकेयपुर का प्राचीन नाम - कबीरपुर (बद्रीदत्त पाण्डे के अनुसार)
- वास्तुकला तथा मूर्तिकला के क्षेत्र में यह उत्तराखण्ड का स्वर्णकाल माना जाता है।
- बद्रीदत्त पाण्डे के अनुसार कार्तिकेयपुर वंश के शासक सूर्यवंशी थे।
- लक्ष्मीदत्त जोशी के अनुसार, कार्तिकेयपुर के शासक मूलतः अयोध्या से थे।
700 ई. से 1030 ई. तक इस राजवंश के तीन वंशों या परिवारों के 14 नरेशों ने उत्तराखण्ड पर शासन किया था, जिसका वर्णन इस प्रकार है
कार्तिकेयपुर राजवंश का प्रथम परिवार
बसन्त देव
- कार्तिकेयपुर के प्रथम वंश के संस्थापक - राजा बसन्तदेव (बागेश्वर से प्राप्त त्रिभुवनराज के अभिलेख के अनुसार)
- उपाधि - परमभट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर
- निर्माण - नृसिंह मन्दिर, जोशीमठ
- बागेश्वर लेख के अनुसार, राजा बसन्तदेव द्वारा एक मन्दिर को स्वर्णेश्वर नामक ग्राम दान देने का पता चलता है।
खर्परदेव व अन्य शासक
- खर्परदेव का समकालीन शासक - कन्नौज का राजा यशोवर्मन
- खर्परदेव का पुत्र - कल्याणराज देव
- खर्परदेव वंश का अन्तिम शासक - त्रिभुवनराज देव (बागेश्वर लेख के अनुसार)
- त्रिभुवन राज की उपाधि - परम भट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर
- बागेश्वर लेख के अनुसार, त्रिभुवन राज ने किरातों के साथ सन्धि की तथा व्याघ्रेश्वर मन्दिर के लिए भूमि दान की।
कार्तिकेयपुर राजवंश का द्वितीय परिवार (निम्बर वंश)
निम्बर
- कार्तिकेयपुर के द्वितीय परिवार का संस्थापक - निम्बरदेव
- पत्नी - रानी दाशू या नाथू देवी
- अनुयायी - शैव धर्म
ईष्टगण देव
- पिता - निम्बरदेव
- अनुयायी - शैव धर्म
- निर्माण - जागेश्वर में लकुलीश, नटराज व नवदुर्गा महिषासुरमर्दिनी मन्दिर
- वह सम्पूर्ण उत्तराखण्ड को एक सूत्र में बाँधने का सर्वप्रथम प्रयास करने वाला कार्तिकेयपुर राजवंश का प्रथम शासक था।
ललितशूर देव
- पिता - इष्टगण देव
- राज्याभिषेक - 832 ई.
- कत्यूरी वंश का सबसे शक्तिशाली एवं प्रतापी शासक - ललितशूर देव
- सर्वाधिक ताम्रपत्र प्राप्त - ललितशूर देव के
- साम देवी ने भगवान नारायण के मन्दिर का निर्माण कराया था।
- ललितशूर देव को पाण्डुकेश्वर ताम्रपत्र में कलिकलंक पंक में मग्न धरती उद्धार के लिए वराहवतार के समान बताया गया।
भूदेव देव
- पिता - ललितशूर देव
- निर्माण - बैजनाथ मन्दिर
- शिलालेखों में भूदेव को राजाओं का राजा कहा गया है।
- बागेश्वर शिलालेख में भूदेव को परमबुद्धश्रमण रिपु कहा गया है। भूदेव बौद्ध धर्म का विरोधी था।
पलेठी शिलालेख
पलेठी शिलालेख में नरपति वर्मन का उल्लेख मिलता है।
पलेठी के सूर्य मन्दिर का निर्माण देवप्रयाग के हिण्डोला खाल में 7वीं-8वीं शताब्दी के मध्य हुआ था। इसका निर्माण कल्याण वर्मन ने कराया था।
कार्तिकेयपुर राजवंश का तृतीय परिवार (सलोणादित्य वंश)
- सलोणादित्य वंश का संस्थापक - इच्छतदेव (सलोणादित्य का पुत्र)
- कार्तिकेयपुर वंश व सलोणादित्य वंश का अन्तिम शासक - सुभिक्षराजदेव (14वाँ कत्यूरी शासक)
- सुभिक्षराजदेव की राजधानी - सुभिक्षपुर (कार्तिकेयपुर)
- इच्छतदेव के बाद क्रमशः देसतदेव व पदमट देव शासक बनें।
- दीन-दुखियों का रक्षक एवं स्वर्णदाता देसतदेव को कहा गया है।
- पदमट देव ने बद्रीनाथ मन्दिर के लिए भूमि दान दी थी। पदमट देव को सूर्य के समान प्रकाशवान एवं कर्ण से अधिक दानदाता कहा गया है।
नोट- कुछ इतिहासकार इच्छतदेव का नाम इच्छरदेव भी मानते हैं।
बैजनाथ-कार्तिकेयपुर नरेश (चतुर्थ परिवार)
- इसे कार्तिकेयपुर वंश का चतुर्थ परिवार या पाल वंश के नाम से भी जाना जाता है।
- बैजनाथ लेखों के अनुसार, कुमाऊँ की गोमती घाटी का नाम बैजनाथ-कार्तिकेयपुर मिलता है, जिसे सुभिक्षराजदेव के किसी वंशज ने राजधानी बनाया था।
- बैजनाथ-कार्तिकेयपुर नरेशों के नाम बैजनाथ लेखों से क्रमशः लखनपाल देव, इन्द्रपाल देव व त्रिभुवनपाल देव मिलते हैं।
शंकराचार्य का उत्तराखण्ड आगमन
- महान दार्शनिक व धर्मप्रवर्तक शंकराचार्य का आगमन उत्तराखण्ड में कार्तिकेयपुर राजवंश के शासनकाल में हुआ था।
- गुरु शंकराचार्य ईष्टगण देव के शासनकाल में उत्तराखण्ड आए थे।
- इन्होंने उत्तराखण्ड में ज्योतिर्मठ (बद्रिकाश्रम) की स्थापना की तथा 820 ई. में केदारनाथ में अपना शरीर त्याग कर दिया था।
- गुरु शंकराचार्य ने उत्तराखण्ड में ज्योतिर्मठ की स्थापना की थी, जो इनके द्वारा स्थापित 4 मठों में से एक है।
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