उत्तराखण्ड की जलवायु
उत्तराखण्ड का भूगोल और यहाँ की जलवायु राज्य स्तरीय परीक्षाओं का एक बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह खास टॉपिक UKPSC, UKSSSC, Uttarakhand Police, Patwari, Forest Guard आदि सभी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण है। इस लेख में हम राज्य की प्रमुख ऋतुओं, तापमान और जलवायु क्षेत्रों की सटीक जानकारी दे रहे हैं, जो परीक्षा में आपके मार्क्स निश्चित रूप से बढ़ा सकती है!
इस लेख में आप क्या-क्या पढ़ेंगे:
- जलवायु क्षेत्रों का वर्गीकरण: डॉ. एस. सी. खर्कवाल द्वारा ऊँचाई और ताप के आधार पर बाँटे गए उत्तराखण्ड के 6 प्रमुख जलवायु क्षेत्रों की विस्तृत जानकारी।
- स्थानीय ऋतुएँ और उनके नाम: ग्रीष्म (रूड़ी), वर्षा (बसगाल) और शीत (स्यून्द) ऋतुओं का भौगोलिक विवरण और उनसे जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य।
- वर्षा और तापमान के रोचक आंकड़े: राज्य में सर्वाधिक वर्षा वाले स्थान (नरेन्द्र नगर) और बंगाल की खाड़ी के मानसून के प्रभाव का विश्लेषण।
- विण्टर लाइन (Winter Line) और हिमानी क्षेत्र: सर्दियों में दिखने वाली अद्भुत 'विण्टर लाइन' की घटना और उच्च हिमालयी क्षेत्रों की बर्फीली जलवायु का ज्ञान।
अक्षांशीय एवं देशान्तरीय स्थिति, जल एवं स्थल का वितरण, उच्चावच, वायुदाब एवं पवनों की गति आदि कारक जलवायु को प्रभावित करते हैं।
जलवायु की दृष्टि से उत्तराखण्ड पर्वतीय राज्य हिमाचल प्रदेश की अपेक्षा अधिक गर्म एवं आर्द्र है।
राज्य के जलवायु क्षेत्र
डॉ. एस. सी. खर्कवाल ने ऊँचाई, ताप एवं वनस्पतियों के आधार पर राज्य को 6 जलवायु क्षेत्रों में विभाजित किया है, जो निम्न प्रकार हैं-
- उपोष्ण जलवायु 900 मी तक की ऊँचाई के क्षेत्रों-भाबर, तराई एवं दून में
- गर्म शीतोष्ण जलवायु 900 से 1,800 मी तक की ऊँचाई वाले क्षेत्रों में
- शीत शीतोष्ण जलवायु 1,800 से 3,000 मी तक ऊँचाई वाले क्षेत्रों में
- अल्पाइन जलवायु 3,000 से 4,200 मी तक ऊँचाई वाले क्षेत्र में
- हिमानी जलवायु 4,200 मी से ऊपर के क्षेत्र में
- शीत शुष्क जलवायु 2,500 से 3,500 मी तक की ऊँचाई वाले ट्रांस हिमालयी क्षेत्र में
राज्य की प्रमुख ऋतुएँ
उत्तराखण्ड राज्य में जलवायु का अध्ययन मुख्यतः ग्रीष्म, वर्षा तथा शीत ऋतुओं के आधार पर किया जाता है, जिनका विवरण निम्न प्रकार है-
ग्रीष्म ऋतु
- राज्य में ग्रीष्म ऋतु का प्रभाव मध्य मार्च से मध्य जून तक रहता है।
- ग्रीष्म ऋतु को उत्तराखण्ड की स्थानीय भाषा में रूड़ी, रूरी या खर्साऊ कहा जाता है।
- भूमध्य रेखा से सूर्य जब कर्क रेखा की ओर बढ़ता है, तब ग्रीष्म ऋतु प्रारम्भ होती है।
- मार्च के मध्य में तापमान धीरे-धीरे बढ़ने लगता है और दाब घटने लगता है, जिससे राज्य के निम्न भागों में तीव्र गर्जन के साथ हल्की वर्षा व कभी-कभी तूफान (ओडाल) आते हैं।
- इस समय उच्च हिमालय की चोटियाँ हिमाच्छादित रहती हैं।
- ग्रीष्म ऋतु में यहाँ उष्ण कटिबन्धीय दशाएँ पाई जाती हैं।
- ग्रीष्मकाल में सर्वाधिक एवं सबसे कम तापमान शिवालिक एवं वृहत् हिमालयी क्षेत्रों में पाया जाता है।
- राज्य का सबसे गर्म महीना जून है।
- शिवालिक अर्थात् बाह्य हिमालयी क्षेत्र का ग्रीष्मकालीन तापमान 29.4° से 38°C रहता है, जबकि इसके दक्षिण तथा निचली घाटियों में तापमान 40°C तक पहुँच जाता है।
- शिवालिक की अपेक्षा मध्य हिमालय क्षेत्र का तापमान कम रहता है।
- सबसे कम तापमान उच्च हिमालय क्षेत्र में रहता है।
वर्षा ऋतु
- उत्तराखण्ड में वर्षा ऋतु की समयावधि मध्य जून से अक्टूबर तक रहती है।
- वर्षा ऋतु को स्थानीय भाषा में बसगाल (चौमासा) कहा जाता है।
- यहाँ सर्वाधिक वर्षा जुलाई, अगस्त तथा सितम्बर माह में होती है।
- राज्य में दक्षिण-पश्चिमी मानसून 15 जून के आस-पास पहुँचता है।
- इस मानसून से राज्य में कम वर्षा होती है।
- राज्य में अधिकांश वर्षा बंगाल की खाड़ी से आने वाले मानसून से होती है। इस समय राज्य में औसत वार्षिक वर्षा 150-200 सेमी तक होती है।
- राज्य में सर्वाधिक औसत वार्षिक वर्षा 1080 मी की ऊँचाई पर स्थित नरेन्द्र नगर में (318 सेमी) होती है।
- राज्य में दक्षिण से उत्तर व पूर्व से पश्चिम की ओर बढ़ने पर वर्षा कम होती जाती है।
उत्तराखण्ड में वार्षिक वर्षा परिसर
| वर्षा की मात्रा | मापन | क्षेत्र |
|---|---|---|
| सबसे कम वर्षा | 40-80 सेमी | वृहत हिमालय के ऊपरी व उत्तरी क्षेत्रों में |
| कम वर्षा | 80-120 सेमी | मध्य हिमालयी क्षेत्र के ऊपरी व उत्तरी क्षेत्रों में |
| अधिक वर्षा | 120-200 सेमी | दून/द्वार, काली बेसिन तथा मध्य हिमालय के दक्षिणी ढालों व नदी घाटी में |
| अधिकतम वर्षा | 200 सेमी से अधिक | शिवालिक, भावर तथा तराई क्षेत्रों में |
शीत ऋतु
- शीत ऋतु का प्रभाव मध्य अक्टूबर से मध्य मार्च तक रहता है।
- शीत ऋतु को स्थानीय भाषा में स्यून्द एवं शितकला कहा जाता है।
- राज्य में शीतकाल का सबसे ठण्डा महीना जनवरी का होता है। इस समय राज्य के 1550 मी से अधिक ऊँचाई वाले लगभग सभी स्थानों पर हिमपात होना प्रारम्भ हो जाता है, परन्तु 2800 मी से निचले क्षेत्रों का हिम शीघ्र ही पिघल जाता है।
- शीत ऋतु में राज्य में पश्चिमी चक्रवातों से वर्षा होती है, जिसमें ओलावृष्टि भी होती है।
- पौड़ी गढ़वाल, टिहरी गढ़वाल, अल्मोड़ा एवं देहरादून जिलों में शीत ऋतु में सबसे अधिक वर्षा होती है, जिसकी मात्रा 12.5 सेमी से कुछ अधिक होती है। शीत ऋतु में सूर्यास्त के समय 15-20 मिनट तक सूर्य की लालिमा लम्बी क्षैतिज रेखा के रूप में दिखाई देती है, जिसे विण्टर लाइन कहा जाता है।
हिमाच्छादित क्षेत्र की जलवायु
- उच्च हिमालय के 4,000 मी से ऊपर के क्षेत्र (जिसमें राज्य के उत्तरकाशी, चमोली, पिथौरागढ़ जिलों का उत्तरी भाग विस्तृत है) वर्षभर हिमाच्छादित रहते हैं। अतः यहाँ बर्फीली जलवायु पाई जाती है।
- मार्च में शीत कम होने पर यहाँ गरज के साथ बर्फीले तूफानों का दौर शुरू हो जाता है।
- सूर्योदय व सूर्यास्त के समय हिमखण्ड लुढ़कने (हिमस्खलन) की घटनाएँ सामान्य हैं।
- मानसून ऋतु में ताप के बढ़ने से हिमस्खलन की तीव्रता बढ़ जाती है, जो हानिकारक सिद्ध होती है।
- शीत ऋतु में भीषण हिमपात होता है एवं तापमान शून्य डिग्री से नीचे चला जाता है।
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