उत्तराखण्ड में ब्रिटिश शासन प्रणाली
यह लेख उत्तराखण्ड के ऐतिहासिक और राजनैतिक विकासक्रम को समझने के लिए एक संपूर्ण मार्गदर्शिका है। इसमें ब्रिटिश शासन की शुरुआत, प्रमुख कमिश्नरों के सुधार, कुली बेगार प्रथा का अंत और स्वतन्त्रता संग्राम में राज्य की गौरवशाली भूमिका का विस्तृत विवरण दिया गया है। यह विषय UKPSC, UKSSSC, उत्तराखण्ड पुलिस, पटवारी, फॉरेस्ट गार्ड जैसी सभी राज्य स्तरीय परीक्षाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
इस लेख में आप क्या-क्या पढ़ेंगे:
- ब्रिटिश प्रशासन और कमिश्नर: उत्तराखण्ड में 1815 से ब्रिटिश शासन का उदय, एडवर्ड गार्डनर से लेकर हेनरी रैमजे तक के प्रमुख कमिश्नरों का कार्यकाल और टिहरी रियासत के सभी पाँच भूमि बंदोबस्त।
- सामाजिक-धार्मिक सुधार और संस्थाएँ: डिबेटिंग क्लब (1870), अल्मोड़ा कांग्रेस, आर्य समाज का प्रभाव और तारादत्त गैरोला द्वारा गठित 'सरोला सभा' जैसी प्रमुख संस्थाओं का योगदान।
- 1857 की क्रांति और कुमाऊं परिषद्: राज्य के प्रथम स्वतन्त्रता सेनानी कालू सिंह महरा का 'क्रान्तिवीर' संगठन और 1916 में गठित कुमाऊं परिषद् के सभी महत्वपूर्ण अधिवेशनों की जानकारी।
- ऐतिहासिक आंदोलन: 'रक्तहीन क्रांति' के नाम से प्रसिद्ध कुली बेगार आंदोलन (1921), स्वराज दल का प्रतिनिधित्व और स्वतन्त्रता संग्राम में बद्रीदत्त पाण्डे व गोविन्द बल्लभ पन्त जैसे महानायकों की भूमिका।
उत्तराखण्ड में ब्रिटिश शासन का प्रारम्भ 1815 ई. में संगौली की सन्धि के बाद माना जाता है।
ब्रिटिश शासन में गढ़वाल दो भागों में विभक्त था
ब्रिटिश गढ़वाल अलकनन्दा नदी के पूर्व भू-भाग पर अंग्रेजों का अधिकार था, इसलिए इसे ब्रिटिश गढ़वाल कहा गया।
टिहरी गढ़वाल अलकनन्दा के पश्चिम का भाग।
वर्ष 1921 में कुमाऊँ कमिश्नरी को ब्रिटिश प्रशासन में राजनीतिक प्रतिनिधित्व प्राप्त हुआ। इसके अन्तर्गत जनता को विधानसभा में प्रतिनिधि भेजने का अधिकार प्राप्त हुआ था।
वर्ष 1937 में टिहरी रियासत को पंजाब हिल स्टेट एजेन्सी के साथ संयुक्त किया गया था।
कुमाऊँ में ब्रिटिश कमिश्नर
- एडवर्ड गार्डनर (प्रथम) मई, - 1815-1816
- जॉर्ज विलियम ट्रेल - जुलाई, 1817 से अक्टूबर, 1837
- कर्नल जॉर्ज गोबान - 1836 से 1838 ई.
- जॉर्ज थॉमस लुशिंगटन - 30 नवम्बर, 1838 से 1848 ई
- जॉन हैलिट बैटन - 1848 से 1856 ई.
- सर हेनरी रैमजे - 1856 से 1884 ई
- जी. रौस (8वें) - 1885 से 1887 ई.
- कैम्पवेल - वर्ष 1906 से 1914
- डब्लू. इबटसन - वर्ष 1935 से 1939
- जी. एल. विवियान (21वें) - वर्ष 1939 से 1941
- जे. सी. एक्टन (22वें) - वर्ष 1941 से 1943
- डब्लू. फिनले (23वें) - वर्ष 1943 से 1947
टिहरी रियासत में भूमि बन्दोबस्त
- टिहरी रियासत में पाँच भूमि बन्दोबस्त हुए थे, जो निम्न प्रकार हैं-
- पहला भूमि बन्दोबस्त 1823 ई. में सुदर्शन शाह ने करवाया था।
- दूसरा भूमि बन्दोबस्त भवानी शाह के नेतृत्व में 1861 ई. में हुआ था। इसके अन्तर्गत सकलाना क्षेत्र के अठूर पट्टी को कर राजस्व से मुक्त कर दिया गया था।
- तीसरा भूमि बन्दोबस्त 1873 ई. में प्रतापशाह के द्वारा कराया गया था।
- चौथा भूमि बन्दोबस्त वर्ष 1903 में कीर्तिशाह के द्वारा कराया गया था।
- पाँचवाँ एवं अन्तिम बन्दोबस्त वर्ष 1924 में नरेन्द्रशाह के द्वारा कराया गया था।
- कमिश्नर हैनरी रैम्जे द्वारा 'बारह आना बीसी' व्यवस्था स्थापित की गई थी, जिसका सम्बन्ध भू-व्यवस्था से था।
- डिप्टी कमिश्नर के अधीन ठाकुर जोधसिंह नेगी बन्दोबस्त अधिकारी के रूप में नियुक्त किए गए थे।
उत्तराखण्ड में सामाजिक-धार्मिक सुधार आन्दोलन
डिबेटिंग क्लब (1870, अल्मोड़ा)
इसके योजनाकर्ता बुद्धिबल्लभ पन्त थे तथा संरक्षक भीम सिंह को बनाया गया था।
अल्मोड़ा में बुद्धिबल्लभ पन्त की अध्यक्षता में 1883 ई. में इल्बर्ट बिल के समर्थन में एक सभा आयोजित की गई थी।
आर्य समाज (1875)
दयानन्द सरस्वती पहली बार 1854-55 ई. में बद्रीनाथ की यात्रा पर गए थे।
उन्होंने हरिद्वार में कुम्भ मेले के अवसर पर 1867 ई. में पाखण्ड खण्डनी पताका फहराई थी।
गढ़वाल हितकारिणी सभा (गढ़वाल यूनियन)
इसकी स्थापना 19 अगस्त, 1901 को देहरादून में हुई थी। इस सभा के गठन का श्रेय तारादत्त गैरोला को दिया जाता है।
हैप्पी क्लब (1903, अल्मोड़ा)
गोविन्द बल्लभ पन्त, तथा हरगोविन्द पन्त के नेतृत्व में इसकी स्थापना हुई थी।
इसका उद्देश्य नवयुवकों में राजनीतिक चेतना का विकास करना था।
सरोला सभा (1904, गढ़वाल)
इसकी स्थापना तारादत्त गैरोला द्वारा की गई थी। यह प्रथम जाति आधारित संस्था थी।
गौरक्षणी सभा
गौरक्षणी सभा की स्थापना वर्ष 1907 में धनीराम वर्मा ने कोटद्वार में की थी।
गढ़वाल भ्रातृमण्डल (1907)
इसकी स्थापना मथुरा प्रसाद नैथानी द्वारा की गई थी।
इसकी प्रथम बैठक वर्ष 1908 में कोटद्वार में हुई, जिसकी अध्यक्षता कुलानन्द बड़थ्वाल ने की थी।
कांग्रेस (1912, अल्मोड़ा)
इसकी स्थापना ज्वाला दत्त जोशी, सदानन्द सनवाल आदि के प्रयासों के द्वारा की गई थी।
शुद्ध साहित्य समिति (1913, अल्मोड़ा)
इसकी स्थापना स्वामी सत्यदेव परिव्राजक द्वारा की गई थी।
होमरूल लीग
स्वामी विचारानन्द सरस्वती ने वर्ष 1918 में देहरादून में होमरूल लीग की एक शाखा स्थापित की थी।
1857 की क्रान्ति और उत्तराखण्ड
- उत्तराखण्ड के प्रथम स्वतन्त्रता सेनानी कालू सिंह महरा (1857 ई. में क्रान्तिवीर नामक गुप्त संगठन का गठन) थे।
- क्रान्तिकारी आनन्द सिंह फत्र्याल एवं बिशन सिंह जो कालू महरा के साथी थे, को फाँसी की सजा दी गई थी।
- सितम्बर, 1857 में खान बहादुर खान जो बरेली के नवाब थे, की सेना ने हल्द्वानी पर अधिकार कर लिया, परन्तु कुछ ही समय के बाद ये पुनः यहाँ हार गए।
- 17 सितम्बर, 1857 को कुमाऊँ क्षेत्र के हल्द्वानी को राज्य के 1000 क्रान्तिकारियों द्वारा अधिकृत कर लिया गया था। इस घटना के बाद नैनीताल के फांसी गदेरा नामक स्थान पर अनेक क्रान्तिकारियों को फाँसी दे दी गई।
- 1857 की क्रान्ति के समय नाना साहब (कानपुर में नेतृत्व) एक जोगी के वेश में उत्तरकाशी में रह रहे थे।
- कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन (1886) में कुमाऊँ क्षेत्र के ज्वाला दत्त जोशी के साथ ही दो और लोगों ने भाग लिया था।
कुमाऊँ परिषद् का गठन एवं अधिवेशन
- हरिराम त्रिपाठी ने वर्ष 1906 में वन्देमातरम् का कुमाऊँनी अनुवाद "जै जै माई जन्मभूमि धन्य-धन्य तुम" के नाम से किया था।
- कुमाऊँ परिषद् के गठन की कल्पना पहली बार 31 मार्च, 1908 को अल्मोड़ा अखबार के अंक में की गई थी।
- हरगोविन्द पन्त, बद्रीदत्त पाण्डे, गोविन्द बल्लभ पन्त आदि के प्रयासों से सितम्बर, 1916 में कुमाऊँ परिषद् की स्थापना हुई थी।
- इस परिषद् का मुख्य उद्देश्य राज्य में राजनैतिक तथा सामाजिक शिक्षा का विकास करना था।
- बद्रीदत्त पाण्डे प्रथम नेता थे, जिन्हें असहयोग आन्दोलन के दौरान जेल भेजा गया था। कनिष्ठ सहायक 2024
- नागपुर में शिष्टमण्डल ने स्वामी सत्यदेव को कुली बेगार आन्दोलन के लिए बागेश्वर आने को आमन्त्रित किया।
- वर्ष 1926 में कुमाऊँ परिषद् का विलय कांग्रेस में कर दिया गया।
कुमाऊँ परिषद् के अधिवेशन
अधिवेशन - अध्यक्ष - स्थान
- पहला अधिवेशन (सितम्बर, 1917) - जयदत्त जोशी - अल्मोड़ा
- दूसरा अधिवेशन (24-25 दिसम्बर, 1918) - तारादत्त गैरोला - हल्द्वानी UKPSC 2025
- तीसरा अधिवेशन (22-24 अक्टूबर, 1919) - रायबहादुर तथा बद्रीदत्त जोशी - कोटद्वार
- चौथा अधिवेशन (21-23 दिसम्बर, 1920) - हरगोविन्द पन्त - काशीपुर
- पाँचवाँ अधिवेशन (1923) - बद्रीदत्त पाण्डे - टनकपुर
- छठा अधिवेशन (1926) - मुकुन्दीलाल - रानीखेत
उत्तराखण्ड में स्वतन्त्रता आन्दोलन
- वर्ष 1905 में बद्रीदत्त पाण्डे बनारस अधिवेशन में पहली बार बाल गंगाधर तिलक जी से मिले थे।
- वर्ष 1914 में नागरी प्रचारिणी की एक शाखा के रूप में गोविन्द बल्लभ पन्त ने काशीपुर में प्रेम सभा की स्थापना की थी।
- वर्ष 1918 में गोविन्द बल्लभ पन्त जी ने काशीपुर में खद्दर आश्रम की स्थापना, गढ़वाल कांग्रेस कमेटी का गठन बैरिस्टर मुकुन्दीलाल व अनुसूया प्रसाद बहुगुणा ने किया।
- वर्ष 1919 में नायक सुधार समिति की पहली बैठक नैनीताल में हुई।
- 6 अप्रैल, 1919 को रोलेट एक्ट के विरोध में काशीपुर में तथा 7 अप्रैल, 1919 को अल्मोड़ा में हड़ताल का आयोजन किया गया।
- अमृतसर अधिवेशन, 1919 में भाग लेने के लिए उत्तराखण्ड से मुकुन्दीलाल, बद्रीदत्त पाण्डे, अनुसूइया प्रसाद बहुगुणा तथा मोहन सिंह मेहता आदि गए थे।
- 26 दिसम्बर, 1919 को बद्रीदत्त पाण्डे ने जलियाँवाला बाग सभा में भाषण दिया था।
कुली बेगार आन्दोलन
- बेगार प्रथा ब्रिटिशकालीन कुमाऊँ क्षेत्र में 1815 ई. से वर्ष 1921 तक रही। 1822 ई. में कमिश्नर ट्रेल ने कुली बेगार को समाप्त करने के लिए खच्चर सेना को विकसित करने का प्रयास किया था।
- गौरीदत्त बिष्ट ने वर्ष 1903 में लॉर्ड कर्जन को कुली बेगार के बारे में बताया था। इस समय लॉर्ड कर्जन अल्मोड़ा से गढ़वाल जा रहे थे।
- कुली एजेन्सी संचालन हेतु एक समिति बनाई गई थी। इस समिति का नेतृत्व तारादत्त गैरोला के द्वारा किया गया।
- गढ़वाल में वर्ष 1913 तक 10 एजेन्सियाँ कार्यरत थीं।
कुमाऊँ मण्डल में कुली बेगार के विरुद्ध आन्दोलन
- कुमाऊँ मण्डल में कुली उतार, कुली बेगार के विरुद्ध सबसे पहले आन्दोलन अल्मोड़ा के खत्याड़ी गाँव से प्रारम्भ हुआ था।
- बद्रीदत्त पाण्डे, हरगोविन्द पन्त व चिरंजीलाल आदि के नेतृत्व में 14 जनवरी, 1921 को बागेश्वर में सरयू नदी के तट पर, उत्तरायणी मेले के अवसर पर 40 हजार स्वतन्त्रता सेनानियों द्वारा कुली बेगार नहीं करने की शपथ ली गई थी।
- कुली बेगार आन्दोलन को रक्तहीन क्रान्ति व असहयोग की पहली ईंट की संज्ञा दी गई है।
- 30 जनवरी, 1921 को कुली बेगार आन्दोलन के विषय में गढ़वाल के चमेठा खाल में एक सभा आयोजित की गई थी। इस सभा की अध्यक्षता मुकुन्दीलाल ने की थी।
- मोहन सिंह मेहता को मार्च, 1921 को गिरफ्तार कर लिया गया था। यह कुमाऊँ क्षेत्र की पहली राजनीतिक गिरफ्तारी थी। इसमें मोहन सिंह मेहता को 9 महीने की सजा दी गई थी।
स्वराज दल का प्रतिनिधित्व
- विधानपरिषद् में वर्ष 1921 में प्रतिनिधि भेजने का अधिकार कुमाऊँ कमिश्नरी को प्राप्त हुआ था।
- वर्ष 1921 में तीन निर्विरोध प्रतिनिधि कुँवर आनन्द सिंह (अल्मोड़ा), नारायणदत्त हिन्दवाल (नैनीताल) तथा ब्रिटिश गढ़वाल से जोध सिंह नेगी विधानपरिषद् भेजे गए थे।
- वर्ष 1923 में गोविन्द बल्लभ पन्त स्वराज पार्टी के टिकट पर नैनीताल से संयुक्त प्रान्त की विधानपरिषद् के सदस्य निर्वाचित हुए थे।
- वर्ष 1926 में मुकुन्दीलाल ने स्वराज दल के टिकट पर गढ़वाल से चुनाव जीता था।
- साइमन कमीशन के बहिष्कार का प्रस्ताव मुकुन्दीलाल ने संयुक्त प्रान्त की काउन्सिल में रखा था।
- सल्ट क्षेत्र में साइमन कमीशन का विरोध हरगोविन्द पन्त के नेतृत्व में हुआ था।
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