उत्तराखण्ड का भौगोलिक विभाजन
क्या आप उत्तराखण्ड की प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं? 'उत्तराखण्ड का भौगोलिक विभाजन' (Geographical Division of Uttarakhand) राज्य के भूगोल का एक बेहद महत्वपूर्ण और स्कोरिंग विषय है। यह टॉपिक UKPSC, UKSSSC, Uttarakhand Police, Patwari, Forest Guard जैसी सभी राज्य स्तरीय परीक्षाओं के लिए अति महत्वपूर्ण है। इस लेख में राज्य के धरातलीय स्वरूप को 8 भौगोलिक क्षेत्रों में बेहतरीन तरीके से समझाया गया है, जिससे परीक्षा में आपके अंक पक्के हो सकें!
इस लेख में आप क्या-क्या पढ़ेंगे:
- 8 भौगोलिक क्षेत्रों का सटीक विश्लेषण: गंगा के मैदान से लेकर तराई, भाबर, शिवालिक, दून, मध्य हिमालय, वृहत् हिमालय और ट्रांस हिमालय तक का सरल व विस्तृत वर्णन।
- पर्वत चोटियाँ और दर्रे: राज्य के सर्वोच्च पर्वत शिखरों (जैसे- नन्दादेवी, कामेट), प्रमुख हिमनदों, और ट्रांस हिमालयी क्षेत्र के महत्वपूर्ण दर्रों की सम्पूर्ण जानकारी।
- परीक्षापयोगी विशेष तथ्य: 'उत्तराखण्ड का पामीर' कहलाने वाली दूधातोली श्रृंखला, बुग्याल (पशुचारकों का स्वर्ग), पातालतोड़ कुएं और 'शिव की भौंहें' (शिवालिक) जैसी भौगोलिक विशेषताओं के शानदार नोट्स।
- जलवायु और वनस्पतियाँ: विभिन्न ऊँचाइयों पर पाई जाने वाली जलवायु, नदियाँ, और शीतोष्ण तथा अल्पाइन वनस्पतियों से जुड़े वो फैक्ट्स जो सीधे परीक्षाओं में पूछे जाते हैं।
धरातलीय स्वरूप, स्थानीय ऊँचाई, उच्चावच तथा भू-गर्भिक स्वरूप के आधार पर उत्तराखण्ड को निम्नलिखित 8 भौगोलिक क्षेत्रों में बाँटा जा सकता है
गंगा का मैदानी क्षेत्र
निर्माण - गंगा नदी द्वारा लाए गए महीन कणों वाले अवसादों (काँप मृदा, कीचड़ तथा बालू) से
विस्तार - दक्षिणी हरिद्वार के अधिकांश भाग में
प्रमुख फसलें - गन्ना, गेहूँ और धान
यहाँ के बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों में खादर या नई जलोढ़ तथा गैर-बाढ़ वाले क्षेत्रों में बांगर या पुरानी जलोढ़ प्रकार की मृदा पाई जाती है।
तराई क्षेत्र
- निर्माण - अवसादी चट्टानों तथा महीन कणों वाले अवसादों से
- विस्तार - हरिद्वार में गंगा मैदान के उत्तर तथा पौड़ी, नैनीताल जिलों के दक्षिण क्षेत्र तक
- फसलें - धान, गन्ना
- जलवायु - उपोष्ण
- यह क्षेत्र समतल, नम एवं दलदली मैदान है, जो एक समान्तर संकरी पट्टी के रूप में विस्तृत है।
- उधमसिंह नगर जिले के अधिकांश क्षेत्र को तराई कहा जाता है।
- इस क्षेत्र के अन्तर्गत बाजपुर, रुद्रपुर, खटीमा, किच्छा व सितारगंज आते हैं।
- पातालतोड़ कुएँ मुख्यतः तराई क्षेत्र में पाए जाते हैं, जिनमें पानी प्राकृतिक दबाव से धरती की सतह पर आ जाता है।
- तराई क्षेत्र को तरीवाला क्षेत्र भी कहा जाता है। इस क्षेत्र की चौड़ाई 20 से 30 किमी तक विस्तृत है।
भाबर क्षेत्र
- निर्माण - प्लीस्टोसीन युग में शिवालिक से उतरने वाली नदियों द्वारा बहाकर लाए गए मोटे पत्थर, कंकड़ व बालू आदि से
- विस्तार - तराई क्षेत्र के उत्तर में तथा शिवालिक क्रम की पहाड़ियों के दक्षिण में 10 से 12 किमी चौड़ी पट्टी के रूप में
- पश्चिमी भाग में इसकी चौड़ाई अपेक्षाकृत अधिक पाई जाती है।
- यह क्षेत्र पूर्व में चम्पावत से पश्चिम में देहरादून तक विस्तृत है।
- इस क्षेत्र में नदियाँ प्रस्तर खण्डों की मोटी परतों में छिपी रहती हैं।
- इस क्षेत्र में जंगली झाड़ियाँ एवं प्राकृतिक वनस्पतियाँ अधिक पाई जाती हैं। यह क्षेत्र कृषि के लिए उपयुक्त नहीं है।
- इस क्षेत्र की मिट्टी कंकड़-पत्थर व मोटे बालू युक्त होती है।
शिवालिक क्षेत्र
- अवस्थिति - भाबर क्षेत्र के उत्तर में
- शिवालिक का अर्थ - शिव की भौंहें
- प्राचीन नाम - मैनाक
- निर्माणकाल - मध्य मायोसीन से निम्न प्लीस्टोसीन तक
- विस्तार - देहरादून, उत्तरी हरिद्वार, दक्षिणी टिहरी गढ़वाल, मध्यवर्ती पौड़ी, दक्षिणी अल्मोड़ा, मध्यवर्ती नैनीताल एवं दक्षिणी चम्पावत (7 जिले)
वनस्पतियाँ
निचले भागों में - शीशम, सेमल, आँवला, बाँस, साल, सागौन
ऊँचाई वाले क्षेत्रों में - शीशम, बुराँस, साल, चीड़, देवदार, बेंत, बाँस
- जलवायु - गर्म व आर्द्र अर्थात् गर्म शीतोष्ण
- तापमान तथा वर्षा - 29.4 से 32.80 डिग्री (ग्रीष्म) एवं 4.40 से 7.20 डिग्री (शीतकालीन)
- वार्षिक वर्षा - लगभग 200 से 250 सेमी के मध्य
- शिवालिक, हिमालय की बाहरी दक्षिणी श्रेणी है, जिसे बाह्य हिमालय तथा हिमालय का पाद भी कहते हैं।
- शिवालिक श्रेणी अपने उत्तर में स्थित मध्य हिमालय से वृहत् सीमान्त दरार (घाटियों) या ग्रेट बाउण्ड्री फॉल्ट द्वारा पृथक होती है।
- उत्तराखण्ड के अधिकांश पर्यटन केन्द्र शिवालिक श्रेणी में स्थित हैं।
दून क्षेत्र
- अवस्थिति - शिवालिक और मध्य हिमालय के बीच (24 से 32 किमी चौड़ी एवं 350 से 750 मी ऊँची चौरस एवं क्षैतिज घाटी के रूप में)
- प्रमुख दून - देहरा (देहरादून), कोटली, चौखम (पौड़ी), पतली, कोटा (नैनीताल), पछुवा, चन्दी, पूर्वी, हर की दून (उत्तरकाशी), नन्धौर दून नैनीताल।
- सबसे बड़ा दून - देहरा (देहरादून) : 75 किमी लम्बा, 24-32 किमी चौड़ा
- जनसंख्या - उच्च घनत्व (अनुकूल परिस्थिति के कारण)
- नदियाँ - आसन, सुसवा आदि नदियाँ
- कृषि - गहन कृषि, धान की फसल उत्तम
- जलवायु/वर्षा - उपोष्ण/औसत वार्षिक : 200 से 250 सेमी
लघु या मध्य हिमालय क्षेत्र
- विस्तार - शिवालिक श्रेणियों के उत्तर और वृहत् हिमालय के दक्षिण में पूर्व से पश्चिम तक चौड़ाई - 70 से 100 किमी, ऊँचाई - 1200 से 4500 मी
- जिले - चम्पावत (पूर्वी छोर), नैनीताल, अल्मोड़ा, चमोली, पौड़ी-गढ़वाल, रुद्रप्रयाग, टिहरी गढ़वाल, उत्तरकाशी, देहरादून (पश्चिमी छोर)
- प्रमुख श्रेणियाँ - देववन, रीवा, लाल टिब्बा, दूधातोली, धनपुर, द्रोणगिरि, विनसर, रानीखेत।
- ताल - कुमाऊँ क्षेत्र के दक्षिणी ढालों पर : सातताल, नौकुचिया ताल, पूनाताल, खुरपाताल, भीमताल
- वनस्पति - शीतोष्ण कटिबन्धीय सदाबहार कोणधारी वन, वृक्ष-चीड़, देवदार, फर, साल
- जलवायु - शीतोष्ण (1800 से 300 मी ऊँचाई तक)
- प्रसिद्ध फसलें - अलकनन्दा घाटी : चुआ ज्वार, अल्मोड़ा-मक्का।
- शीतोष्ण कटिबन्धीय फल - सेब, नाशपाती, चेरी, अखरोट (2500 मी तक)
बुग्याल
- मध्य हिमालय के पर्वतीय ढालों पर पाए जाने वाले घास के छोटे-छोटे मैदान हैं।
- बुग्यालों या पयारों को पशुचारकों का स्वर्ग कहा जाता है।
- अल्पाइन प्रकार की जलवायु बुग्यालों में पाई जाती है।
- बुग्याल के पाँच प्रकार दूध, बस, मोट, धनिया एवं घाति होते हैं।
दूधातोली श्रृंखला
मध्य या लघु हिमालय के चमोली, पौड़ी तथा अल्मोड़ा जिलों के मध्य विस्तृत दूधातोली श्रृंखला को उत्तराखण्ड का पामीर कहा जाता है।
इस श्रेणी पर बुग्याल, चरागाह तथा बाँज, खर्सू व कैल वृक्षों के सघन वन हैं। दूधातोली श्रृंखला में दुग्धताल स्थित है।
यहाँ से पश्चिमी रामगंगा, आटागाड़, पश्चिमी नयार, पूर्वी नयार तथा बिनो गाड़ आदि 5 नदियाँ निकलती हैं।
ब्रिटिश काल में यह क्षेत्र चाँदपुर परगने में था।
वृहत् हिमालय क्षेत्र
- अवस्थिति - लघु हिमालय के उत्तर और ट्रांस हिमालय के दक्षिण में
- अन्य नाम - उच्च, आन्तरिक, महा तथा मुख्य हिमालय
- प्राचीन नाम - हिमाद्रि, हिमाच्छादित होने के कारण
- उत्तराखण्ड में चौड़ाई - 15 से 30 किमी तक
- ऊँचाई - 4,500 से 7,817 मी
- विस्तार - राज्य के 6 जिलों (उत्तरकाशी, टिहरी गढ़वाल, रुद्रप्रयाग, चमोली, बागेश्वर एवं पिथौरागढ़) में
- सर्वोच्च चोटी - नन्दादेवी (7,817 मी)
- स्थायी हिमरेखा - उच्च हिमालय क्षेत्र में 4,000 मी की ऊँचाई तक
विश्व प्रसिद्ध फूलों की घाटी (चमोली) वृहत् हिमालय में ही स्थित है।
उत्तराखण्ड की सबसे कम वर्षा (40-80 सेमी तक) वृहत् हिमालय के ऊपरी एवं उत्तरी क्षेत्रों में होती है।
हिमानी जलवायु 4,200 मी से अधिक ऊँचाई पर पाई जाती है।
इस क्षेत्र के निचले भागों (10 हजार फीट से नीचे) में शीतोष्ण कटिबन्धीय सदाबहार नुकीली पत्ती वाले वन पाए जाते हैं।
छोटे-छोटे घास के मैदान वृहत् हिमालय के निचले भागों में पाए जाते हैं, जिन्हें बुग्याल या पयार कहा जाता है।
यहाँ के निवासियों (मुख्यतः भोटिया) का मुख्य कार्य पशुपालन है। इसके साथ ये ग्रीष्म ऋतु में जौ, मंडुवा (मड़वा) व गेहूँ आदि की कृषि भी करते हैं।
उत्तराखण्ड के प्रमुख हिमनद; जैसे- गंगोत्री, मिलम आदि वृहत् हिमालय क्षेत्र के अन्तर्गत आते हैं।
भागीरथी, अलकनन्दा, गौरी गंगा आदि नदियाँ वृहत् हिमालय से निकलती हैं।
मुख्य केन्द्रीय भ्रंश रेखा या मेन सेन्ट्रल थ्रस्ट ग्रेटर हिमालय एवं मध्य या लघु हिमालय के बीच स्थित है।
नोट - भोटिया जाति की सर्वाधिक जनसंख्या महान हिमालय क्षेत्र में निवास करती है, क्योंकि इनमें ऋतु प्रवास पाया जाता है।
वृहत् हिमालय क्षेत्र के प्रमुख पर्वत शिखर
- चमोली - नन्दादेवी पश्चिमी (7,817 मी सर्वोच्च शिखर), कामेत या कामेट (7,756 मी, दूसरा सर्वोच्च शिखर) माणा, बद्रीनाथ, चौखम्बा, त्रिशूल, सतोपन्थ, द्रोणगिरि, गन्धमादन, कालौंका, हाथीपर्वत, देवस्थान, नन्दाखाट, नीलकण्ठ, नन्दाघुंघटी, गौरी पर्वत, नारायण पर्वत, नर पर्वत
- चमोली-पिथौरागढ़ - नन्दादेवी पूर्वी (7,434 मी, तीसरा सर्वोच्च शिखर) नन्दाकोट (6,861 मी), गुन्नी पर्वत
- चमोली-उत्तरकाशी - केदारनाथ, स्वर्गारोहिणी
- उत्तरकाशी - भागीरथी, श्रीकण्ठ, गंगोत्री, यमुनोत्री, बन्दरपूँछ, जैलंग
- पिथौरागढ़ - पंचाचूली
ट्रांस हिमालयी क्षेत्र
- स्थिति - हिमालय के उत्तर में
- चौड़ाई - 20 से 30 किमी
- ऊँचाई - 2,500 से 3,500 मी
- भारत एवं काराकोरम श्रेणी की सबसे ऊँची चोटी - गॉडविन ऑस्टिन (K-2)
- इस क्षेत्र का कुछ हिस्सा भारत तथा कुछ हिस्सा तिब्बत (चीन) के नियन्त्रण में है।
- इस क्षेत्र का उद्भव हिमालय से पहले हुआ माना जाता है। इस क्षेत्र का निर्माण अवसादी चट्टानों से मिलकर हुआ है।
- इस क्षेत्र की पर्वत श्रेणियों को जास्कर श्रेणी कहा जाता है।
- काराकोरम, कैलाश व लद्दाख श्रेणियाँ भारत में ट्रांस हिमालय के अन्तर्गत आती हैं।
- पूर्ववर्ती नदियों (जैसे- सतलज, ब्रह्मपुत्र व सिन्धु) का जन्म ट्रांस हिमालय से हुआ है।
- ट्रांस हिमालय और ग्रेटर (वृहत्) हिमालय सच्चर जोन या हिन्ज लाइन द्वारा अलग होता है।
- लिपुलेख, माणा, नीति, चोरहोती, दारमा, शलशल, किंगरी-बिंगरी आदि यहाँ के प्रमुख दर्रे हैं।
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