टिहरी रियासत का उदय | tehri riyasat ka uday

टिहरी रियासत का उदय

नमस्कार दोस्तों! आज के इस विशेष लेख में हम 'टिहरी रियासत' के गौरवशाली और संघर्षपूर्ण इतिहास पर विस्तार से चर्चा करेंगे। उत्तराखंड के इतिहास का यह अध्याय UKPSC, UKSSSC, उत्तराखंड पुलिस, पटवारी, फॉरेस्ट गार्ड और अन्य सभी राज्य स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। टिहरी रियासत की स्थापना से लेकर भारत संघ में इसके विलय तक की सभी महत्वपूर्ण घटनाओं को यहाँ बहुत ही सरल भाषा में समझाया गया है।

इस लेख में आप क्या-क्या पढ़ेंगे:
  • स्थापना और प्रमुख शासक: राजा सुदर्शन शाह द्वारा 1815 में टिहरी को राजधानी बनाने से लेकर अंतिम राजा मानवेन्द्र शाह तक के सभी प्रतापी शासकों का विस्तृत विवरण और उनके शासनकाल की उपलब्धियां।
  • ऐतिहासिक आंदोलन और घटनाएं: अठूर विद्रोह, तिलाड़ी कांड (रवाईं कांड) और महान स्वतंत्रता सेनानी श्रीदेव सुमन के 84 दिनों के ऐतिहासिक अनशन और उनके बलिदान की पूरी कहानी।
  • प्रशासनिक और सामाजिक सुधार: टिहरी में अंग्रेजी शिक्षा की शुरुआत, बिजली की सुविधा, प्रताप प्रिंटिंग प्रेस की स्थापना और रियासत काल में हुए विभिन्न भूमि व कर सुधारों के रोचक तथ्य।
  • भारत संघ में विलय: 1 अगस्त, 1949 को टिहरी रियासत का भारतीय संघ में विलय और संयुक्त प्रांत का 50वाँ जिला बनने की पूरी प्रक्रिया और उससे जुड़े महत्वपूर्ण व्यक्तित्व।
टिहरी रियासत का अस्तित्व गढ़वाल में गोरखाओं के आक्रमण से जुड़ा हुआ है। 1815 ई. में प्रद्युम्नशाह के पुत्र सुदर्शन शाह ने अंग्रेजों की मदद से गोरखों को हराया था।

पंवार वंश के शासक और टिहरी रियासत

गढ़वाल के पंवार वंश के शासक प्रद्युम्नशाह की 14 मई, 1804 को देहरादून के खुड़बुड़ा मैदान में गोरखाओं के साथ हुए युद्ध में मृत्यु हो गई, जिसके पश्चात् सम्पूर्ण गढ़वाल और कुमाऊँ पर नेपाली गोरखाओं का अधिकार हो गया था।
सुदर्शन शाह के भाई प्रीतमशाह की टिहरी में वापसी 1817 ई. में हुई थी, जिसे खुड़बुड़ा युद्ध में गोरखाओं ने बन्दी बना लिया था।
अक्टूबर, 1814 में जनरल लॉर्ड हेस्टिंग्स ने गोरखों के विरुद्ध युद्ध के लिए अंग्रेजी सेना भेजी तथा 1815 ई. में युद्ध के बाद गढ़वाल स्वतन्त्र हो गया।

पंवार शासक सुदर्शन शाह

  • शासनकाल: 1815 से 1859 ई.
  • 28 दिसम्बर, 1815 को सुदर्शन शाह ने अपनी राजधानी श्रीनगर से हटाकर टिहरी स्थापित की।
  • सुदर्शन शाह ने 1804 से 1814 ई. तक हरिद्वार के कनखल एवं ज्वालापुर में निर्वासन का जीवन व्यतीत किया था।
  • बरेली प्रवास के समय सुदर्शन शाह ने दून व चण्डी परगने कैप्टन हैर्से को बेच दिए थे। इसका उल्लेख वैली ऑफ दून पुस्तक में है।
  • सुदर्शन शाह का विवाह हिमाचल के खनेती ठाकुर की पुत्री से हुआ था।
  • ब्रिटिश पर्यटक मूरक्राफ्ट 1820 ई. में टिहरी आए, इन्होंने सुदर्शन शाह को उसके कला प्रेम के कारण कलाविदों का शिरोमणि कहा है।
  • टिहरी रियासत को दिसम्बर, 1842 में ब्रिटिश सरकार के राजनैतिक प्रतिनिधि 'कुमाऊँ कमिश्नर' के अधीन किया गया था।
  • जून, 1859 में सुदर्शन शाह की मृत्यु हुई।

अठूर विद्रोह सुदर्शन शाह के शासनकाल की महत्त्वपूर्ण घटना थी। यह विद्रोह सकलाना की जनता द्वारा 1851 ई. में किया गया था।
इसका मुख्य कारण तिहाड़ कर का विरोध था। इसके नेतृत्वकर्ता बद्री सिंह असवाल थे।

टिहरी रियासत व अन्य पंवार शासक

राजा भवानी शाह
  • शासनकाल: 1859 से 1871 ई.
  • सुदर्शन शाह के बाद उनके छोटे पुत्र शेरशाह शासक बनें, परन्तु ब्रिटिश सरकार के हस्तक्षेप से इन्हें सिंहासन से अल्प समय में ही हटा दिया गया और भवानी शाह को गद्दी पर बैठाया गया।
  • भवानी शाह ने फ्रेडरिक विल्सन को 1860 ई. में वनों का ठेका दिया था तथा देवप्रयाग में 1862 ई. में एक संस्कृत पाठशाला बनवाई थी।

राजा प्रताप शाह
  • शासनकाल: 1871 से 1886 ई.
  • इन्होनें जलकुर नदी के तट पर 1877 ई. में प्रतापनगर की स्थापना की।
  • ये स्वयं के नाम पर शहर बसाने वाले टिहरी के प्रथम शासक थे।
  • प्रताप शाह के तीन पुत्र थे- कुँवर कीर्तिशाह, कुँवर विचित्रशाह, कुँवर सुरेन्द्रशाह।

लक्ष्मू कठैत
  • ये टिहरी के रंवाई परगने के प्रशासक थे। ये पहले गढ़वाली थे, जिन्हें रायबहादुर की पदवी से सम्मानित किया गया था। इन्होंने प्रताप शाह के समय पाला बिसाऊ नामक कर प्रथा का विरोध किया।
  • इस प्रथा के विरोध में 1882 ई. में लक्ष्मू कठैत के नेतृत्व में प्रताप शाह के समय ढण्डक आन्दोलन चलाया गया था।

प्रताप शाह के प्रमुख कार्य

  • इन्होंने टिहरी में अंग्रेजी शिक्षा प्रारम्भ की।
  • इन्होंने टिहरी में पुलिस विभाग की स्थापना की व प्रताप प्रिन्टिंग नामक प्रेस खोली।
  • टिहरी में न्यायालय भवन (चीफ कोर्ट) की स्थापना की।
  • 1883 ई. में एंग्लो-वर्नाक्यूलर मिडिल स्कूल की स्थापना की, जिसका नाम 'प्रताप जूनियर हाईस्कूल' रखा गया।

महारानी गुलेरिया

  • ये प्रताप शाह की पत्नी थी तथा इनका वास्तविक नाम कुन्दनदेई था।
  • कीर्तिशाह के अल्पवयस्क आयु में सिंहासन पर बैठने के कारण महारानी गुलेरिया ने इनकी संरक्षिका के रूप में शासन चलाया था।
  • इन्होंने 'कौंसिल ऑफ रीजेन्सी' की सहायता से शासन चलाया था।

राजा कीर्तिशाह

  • शासनकाल: 1886 से 1913 ई.
ब्रिटिश सरकार द्वारा कीर्तिशाह को निम्न उपाधियाँ दी गई थीं
  • कम्पेनियन ऑफ इण्डिया - 31 दिसम्बर, 1898 में
  • नाइट कमाण्डर - वर्ष 1901 में
  • सर या KCSI - वर्ष 1903 में दिल्ली दरबार में
25 अप्रैल, 1913 को कीर्तिशाह की मृत्यु हुई।

कीर्तिशाह के प्रमुख कार्य
  • प्रथम बार टिहरी की जनता को बिजली की सुविधा प्रदान की।
  • टिहरी में नगरपालिका की स्थापना कराई तथा वेधशाला का निर्माण कराया।
  • यमुना पर हीबेट ब्रिज का निर्माण कराया एवं वर्ष 1909 में हीबेट संस्कृत पाठशाला बनवाई।
कीर्तिशाह ने 1894 ई. में कीर्तिनगर की स्थापना विलोली ग्राम में की। उसने टिहरी में प्रथम प्रिन्टिंग प्रेस की स्थापना की एवं हिन्दी टाइपराइटर का आविष्कार किया।
  • टिहरी में माइनस व सेपर्स फोर्स की स्थापना की तथा सेना का पुनर्गठन किया।
  • 1897 ई. में महारानी विक्टोरिया की हीरक जयन्ती के उपलक्ष्य में टिहरी में 110 फीट ऊँचे घण्टाघर का निर्माण करवाया।

राजा नरेन्द्र शाह

  • जन्म - 1898 ई. (प्रतापनगर में)
  • राज्याभिषेक - वर्ष 1913
  • संरक्षिका - राजमाता नेपोलिया
  • शासनकाल - वर्ष 1913 से 1946
  • उपनाम - गढ़वाल का शेरशाह सूरी

राजा नरेन्द्र शाह को निम्न उपाधियाँ प्राप्त थीं
  • कम्पेनियन ऑफ इण्डिया - वर्ष 1921 में ब्रिटिश सरकार द्वारा
  • सर व KCSI - वर्ष 1931 में ब्रिटिश सरकार द्वारा
  • एल. एल. डी. - वर्ष 1937 में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय द्वारा
नरेन्द्र शाह का विवाह कमलेन्दुमति व इन्दुमति नामक सगी बहनों के साथ हुआ था। ये दोनों हिमाचल के क्यूंठल रियासत की राजकुमारी थीं।
नरेन्द्र शाह ने वर्ष 1921 में नरेन्द्र नगर की स्थापना की एवं वर्ष 1925 में यहाँ राजधानी स्थानान्तरित की थी।

नरेन्द्र शाह के कार्यकाल की महत्त्वपूर्ण घटनाएँ
  • तिलाड़ी काण्ड 30 मई, 1930 को रवाईं घाटी क्षेत्र में ग्रामीण वनों पर अपने अधिकार के लिए शान्तिपूर्वक पंचायत कर रहे थे, जिन पर टिहरी रियासत के दीवान चक्रधर जुयाल द्वारा गोलियाँ चलवा दी गईं, जिससे 100 से अधिक ग्रामीण शहीद हो गए। तिलाड़ी काण्ड को रवाईं, ढ़ण्डक और गढ़वाल के जलियाँवाला बाग काण्ड के नाम से भी जाना जाता है।
  • श्रीदेव सुमन का शहीद होना टिहरी रियासत व ब्रिटिश हुकूमत के विरोध में टिहरी जेल में 84 दिन के अनशन के बाद 25 जुलाई, 1949 को 29 वर्ष की आयु में श्रीदेव सुमन शहीद हुए। श्रीदेव सुमन का संघर्ष टिहरी नौकरशाही के विरुद्ध था।

राजा मानवेन्द्र शाह व टिहरी रियासत का विलय

  • टिहरी रियासत के अन्तिम राजा - राजा मानवेन्द्र शाह
  • राज्याधिकार - प्राप्त अक्टूबर, 1946 में
  • टिहरी रियासत का भारत संघ में विलय - 1 अगस्त, 1949
  • टिहरी रियासत संयुक्त प्रान्त का 50वाँ जिला बना।
  • टिहरी रियासत के विलयपत्र पर हस्ताक्षर करने वाले प्रथम व्यक्ति परिपूर्णानन्द पैन्यूली थे।
  • 15 फरवरी, 1948 को टिहरी राज्य में अन्तिम मन्त्रिपरिषद् ने शपथ ली थी।
  • ज्योति प्रसाद को टिहरी राज्य का मुख्यमन्त्री बनाया गया था।
  • पुरुषोत्तम दत्त रतूड़ी राज्य की संविधान सभा के अध्यक्ष थे। इनकी अध्यक्षता में संविधान सभा की 49 बैठकें हुई थीं।
  • प्रथम लोकसभा में राजमाता कमलेन्दुमति शाह वर्ष 1958 में टिहरी से सांसद निर्वाचित हुई थीं।
  • मानवेन्द्र शाह 8 बार (वर्ष 1957 से 2004 तक) टिहरी गढ़वाल से सांसद चुने गए थे।
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Kartik Budholiya

उत्तराखंड की ऐतिहासिक विरासत, भूगोल, नदी प्रणालियों और सामान्य ज्ञान के विशेषज्ञ Kartik Budholiya छात्रों को UKPSC, UKSSSC, Uttarakhand Police, Patwari, Forest Guard और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता दिलाने के लिए निरंतर शोध-परक कंटेंट साझा करते हैं।