मध्यकाल का कत्यूरी राजवंश
उत्तराखंड के इतिहास का अध्ययन राज्य की किसी भी परीक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। आज के इस विशेष लेख में हम "मध्यकालीन कत्यूरी राजवंश" तथा "सल्तनत व मुग़ल काल में उत्तराखण्ड" के गौरवशाली और ऐतिहासिक सफर को जानेंगे। यह महत्वपूर्ण विषय UKPSC, UKSSSC, Uttarakhand Police, Patwari, Forest Guard जैसी सभी राज्य स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं के दृष्टिकोण से बेहद उपयोगी और स्कोरिंग है।
इस लेख में आप क्या-क्या पढ़ेंगे:
- कत्यूरी राजवंश का उत्कर्ष: इस वंश के संस्थापक (वासुदेव), उनकी प्रमुख राजधानियों (जोशीमठ और रणचूलाकोट) और कत्यूरी वंश के स्वर्णकाल (धामदेव का काल) से जुड़े सबसे महत्वपूर्ण तथ्य।
- ऐतिहासिक गाथाएं और शूरवीर: कुमाऊँ की लक्ष्मीबाई 'जियारानी' की अतुलनीय वीरता, तैमूर लंग के साथ हुए ऐतिहासिक रानीबाग युद्ध का वर्णन और राजुला-मालूशाही की प्रसिद्ध प्रणयगाथा।
- सल्तनत व मुग़ल काल का प्रभाव: रजिया सुल्तान, अकबर और जहाँगीर के शासनकाल में उत्तराखण्ड की स्थिति तथा तराई-भाबर क्षेत्र के लिए प्रयुक्त ऐतिहासिक नाम (जैसे 'दामन-ए-कोह')।
- प्रमुख ऐतिहासिक स्रोत: 'तबकात-ए-नासिरी', 'मल्फुजात-ए-तैमूरी' और 'आइन-ए-अकबरी' जैसी सुप्रसिद्ध ऐतिहासिक पुस्तकों में उत्तराखण्ड (गढ़वाल, कुमाऊँ और शिवालिक) के बारे में दिए गए महत्वपूर्ण विवरण।
मध्यकाल में कत्यूरी शासन की जानकारी राज्य की स्थानीय लोकगाथाओं व जागरों से मिलती है।
| • संस्थापक | वासुदेव/बसन्त देव |
| • प्रमुख कत्यूरी शाखाएँ | कत्यूर का आसन्तिदेव वंश, अस्कोट के रजवार तथा डोटी के मल्ल |
| • आसन्तिदेव राजवंश की स्थापना | आसन्तिदेव |
| • आसन्तिदेव की प्रथम राजधानी | जोशीमठ |
| • आसन्तिदेव की दूसरी राजधानी | रणचूलाकोट (बागेश्वर) |
| • कत्यूरी राजवंश का स्वर्णकाल | धामदेव का काल |
| • धामदेव के पुत्र | मालूशाही व लाडमशाही |
| • पिथौरागढ़ का संस्थापक | प्रीतमदेव (राजा पिथौरा) |
| • प्रीतमदेव की छोटी रानी | जियारानी |
| • आसन्तिदेव वंश तथा कत्यूरी वंश का अन्तिम शासक | ब्रह्मदेव (वीरमदेव/वीरदेव) |
| • कत्यूरीयों की कुलदेवी | नन्दादेवी/कोटभ्रामरी |
प्रीतमदेव या पिथौराशाही व धामदेव या दुलाशाही का वर्णन कत्यूरी गाथाओं में मिलता है। धामदेव के समय छमुनापातर कत्यूरीयों की प्रसिद्ध नृत्यांगना थी।
कुमाऊँ में प्रचलित प्रणयगाथा दारमा की शौक्याणी राजुला व बैराठ (चौखुटिया) के राजा मालूशाही से सम्बन्धित है।
जियारानी की लोकगाथा के अनुसार, ब्रह्मदेव के काल में तैमूर लंग ने हरिद्वार पर आक्रमण किया था। ब्रह्मदेव की तैमूर लंग से युद्ध करते हुए मृत्यु हो गई।
रानीबाग युद्ध में जियारानी ने तैमूर लंग को पराजित किया था। इन्हें कुमाऊँ की लक्ष्मीबाई कहा जाता है।
सल्तनत तथा मुगलकाल में उत्तराखण्ड
रजिया सुल्तान के समय विद्रोही मुहम्मद जुनैदी ने सिरमूर पर्वत पर ही शरण ली थी।
गुलाम वंश के शासक नासिरुद्दीन महमूद ने सिरमूर व बिजनौर के पर्वतीय क्षेत्रों में अभियान किया था।
खिलजी शासक अलाउद्दीन के समय मंगोल सेना ने शिवालिक पहाड़ियों से होकर अमरोह पर आक्रमण किया।
- अकबर ने गंगा नदी के उद्गम स्थल को ढूँढने हेतु गढ़वाल में सर्वेक्षण दल भेजा था। UKPSC 2024
दामन-ए-कोह नाम का प्रयोग तराई-भाबर प्रदेश के लिए निजामुद्दीन अहमद ने किया है। अन्य मुस्लिम इतिहासकारों ने तराई-भाबर प्रदेश हेतु महतों का देश और कुटिल दर्रा शब्दों का प्रयोग किया है।
मुगल बादशाह जहाँगीर हरिद्वार की यात्रा पर आया था।
मुगलकाल में उत्तराखण्ड के बारे में विवरण
| किताब | विवरण |
|---|---|
| तबकात-ए-नासिरी | गढ़वाल व कुमाऊँ के सिरमूर पर्वत |
| तबकात-ए-नासिरी | सिरमौर के सन्दूरगढ़ के शासक राणा देवपाल ने बलबन के विद्रोही कुतुब खाँ को शरण दी |
| तारीख-ए-मुबारकशाही | कटेहर के हिन्दू राजा खड़क सिंह का कुमाऊँ पलायन का विवरण |
| मल्फुजात-ए-तैमूरी (तैमूर लंग की आत्मकथा) | शिवालिक क्षेत्र पर आक्रमण की जानकारी |
| जफरनामा (सरफुद्दीन की पुस्तक) | लाखामण्डल के बहुबाण वंश के रतनसेन ने तैमूर लंग से युद्ध की जानकारी |
| आइन-ए-अकबरी | कुमाऊँ क्षेत्र में महल का विवरण |

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