कुमाऊँ में गोरखों का शासन
उत्तराखंड का इतिहास और विशेष रूप से 'गोरखा शासन काल' राज्य की प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण और अनिवार्य विषय है। चाहे आप UKPSC, UKSSSC, उत्तराखंड पुलिस, पटवारी, फॉरेस्ट गार्ड या अन्य किसी भी राज्य स्तरीय परीक्षा की तैयारी कर रहे हों, इस कालखंड से अक्सर गहरे और तथ्यात्मक प्रश्न पूछे जाते हैं। यह लेख आपको गोरखाओं के आगमन से लेकर उनके पतन तक की पूरी जानकारी प्रदान करता है।
इस लेख में आप क्या-क्या पढ़ेंगे:
- ऐतिहासिक आक्रमण और युद्ध: कुमाऊँ और गढ़वाल पर गोरखाओं के आक्रमण का विस्तृत इतिहास, जिसमें हवालबाग और खुड़बुड़ा जैसे निर्णायक युद्धों की पूरी जानकारी दी गई है।
- प्रमुख सूबेदार और प्रशासनिक व्यवस्था: कुमाऊँ के विभिन्न गोरखा सूबेदारों (जैसे जोगामल्ल शाह, बमशाह) का शासनकाल और उनके द्वारा लगाए गए महत्वपूर्ण करों (Tax) का संक्षिप्त विवरण।
- गोरख्याणी और जनजीवन: उत्तराखंड में गोरखा शासन के प्रभाव, उनकी क्रूरता (गोरख्याणी), मंदिरों का जीर्णोद्धार और कवियों (जैसे मोलाराम) द्वारा उनके शासन पर की गई टिप्पणियां।
- आंग्ल-नेपाल युद्ध और संगौली की सन्धि: ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी और गोरखाओं के बीच हुए युद्ध के कारण और ऐतिहासिक संगौली की सन्धि (1816) के प्रमुख प्रावधान, जो परीक्षाओं के लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।
कुमाऊँ पर सर्वप्रथम गोरखा आक्रमण 1790 ई. में अमरसिंह थापा, हस्तिदल चौतरिया व शूरवीर थापा के नेतृत्व में हुआ।
गोरखों को कुमाऊँ पर आक्रमण का निमन्त्रण देने वाले व्यक्ति हर्षदेव जोशी थे।
गोरखों का कुमाऊँ पर शासनकाल 1790 ई. से 1815 ई. (25 वर्ष) तक था।
हवालबाग के युद्ध में 1790 ई. में गोरखों ने चन्द शासक महेन्द्र चन्द को पराजित किया।
कुमाऊँ में गोरखा सूबेदार
- सुब्बा जोगामल्ल शाह (1791-92 ई.)
- सुब्बा काजी नर शाही (मंगलवार रात्रिकाण्ड)
- अजब सिंह खवास (1500 ग्राम प्रधानों का सामूहिक नरसंहार)
- सुब्बा अमर सिंह थापा
- सुब्बा प्रबल राणा
- सुब्बा बमशाह (ब्राह्मणों पर कुशाही नामक कर लगाया)
- अजब सिंह खवास (पुनः नियुक्ति)
- धौकल सिंह बसन्यात
- सेनापति रुद्रवीर शाह को 1802 ई. में सुब्बा बनाया गया। इसने टनकर नामक कर लगाया था।
- काजी गजशेखर पाण्डे 1803 ई. में सुब्बा बनाया गया। 1806 ई. में सूबेदार ऋतुराज थापा को डोटी में फाँसी देने के पश्चात् चौतरिया बड़ा बमशाह को सूबेदार बनाया गया, जो 1815 ई. तक सुब्बा बना रहा।
- फ्रेजर साहब बहादुर 1815 ई. में कुमाऊँ का सूबेदार था।
गढ़वाल में गोरखा शासन
- चन्द राज्य पर विजय प्राप्त करने के पश्चात् गोरखों ने पंवार राज्य पर आक्रमण किया।
- गोरखों ने लंगूरगढ़ किले पर 1791 ई. में आक्रमण किया।
- लंगूरगढ़ की सन्धि 1792 ई. में प्रद्युम्नशाह व गोरखों के मध्य हुई।
- गढ़वाल में गोरखों का शासनकाल 1804 से 1815 ई. तक था।
- गढ़वाल में गोरखा गवर्नर हस्तिदल शाह को नियुक्त किया गया था।
- गोरख्याणी शब्द का प्रयोग उत्तराखण्ड में गोरखा शासन के सन्दर्भ में किया जाता है, जिसका अर्थ क्रूरता व अत्याचार माना जाता है।
- अमरसिंह थापा व हस्तिदल चौतरिया के नेतृत्व में गोरखों ने 1803 ई. में आपदा से ग्रस्त गढ़वाल पर आक्रमण किया।
- खुड़बुड़ा युद्ध में लण्डौर रियासत के गुर्जर शासक रामदयाल ने प्रद्युम्नशाह की सहायता की थी।
- मनौचौल गोरखा शासन में सेवा के बदले दी जाने वाली भूमि को कहा जाता था।
- गोरखा सूबेदार महावीर थापा ने 1796 ई. में चम्पावत के बालेश्वर मन्दिर का जीर्णोद्धार कराया था।
- गुरु रामराय के महन्त हरिसेवक को देहरादून में सदावर्त हेतु चयनित किया गया था। पटवारी/लेखपाल 2023
- केदारनाथ मन्दिर में सदावर्त चलाने के लिए रणबहादुर शाह की पत्नी कान्तिदेवी ने 1797 ई. शतोली परगने के कुछ ग्रामों को में दान में दिया था।
अमरसिंह थापा
- ये नेपाल दरबार के प्रमुख अधिकारी थे। हस्तिदल चौतरिया और गढ़वाल सेनापति रणधीर सिंह बस्न्यात इसके अधीन थे।
- अमरसिंह थापा को नेपाल सरकार के सर्वोत्तम अलंकार काजी से सम्मानित किया गया था।
गोरखा शासन में अन्य प्रमुख सेनानायक
- रणजोर सिंह थापा (1804-05) - यह अमरसिंह थापा का पुत्र था, मोलाराम ने इसे दानवीर कर्ण कहा था। यह कलाविदों एवं विद्वानों का सम्मान करता था।
- हस्तिदल चौतरिया (1805-08) - कृषकों के प्रति अत्यधिक उदार था। इसके काल में हरिद्वार दासों की बिक्री का प्रमुख केन्द्र था।
- भैरौं सिंह थापा (1808 से 1811 ई.) - इसने नेपाल शासक द्वारा मोलाराम को दी गई सनद एवं जागीरों को छीन लिया था। ये गोरखों के प्रमुख सेनानायक थे।
- चामू भण्डारी व बमशाह - 1812 ई. में विलियम मूरक्राफ्ट ऊन की विस्तृत जानकारी हेतु कुमाऊँ व गढ़राज्य होते हुए तिब्बत की यात्रा पर गए थे। इनके साथ हैदर खाँ व हरकदेव पण्डित भी तिब्बत में गुसाइयों के वेश में गए थे।
आंग्ल-नेपाल युद्ध एवं गढ़वाल-कुमाऊँ क्षेत्र
आंग्ल-नेपाल युद्ध ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी व गोरखों के मध्य 1814-1816 ई. तक लड़ा गया था।
- 1814 ई. में ब्रिटिश-गोरखा युद्ध के दौरान लॉर्ड हेस्टिंग्स ब्रिटिश गवर्नर-जनरल थे। UKPSC 2025
अमरसिंह थापा व ऑक्टरलोनी के मध्य 15 मई, 1815 को मलावगढ़ की सन्धि हुई।
नेपाल नरेश रणबहादुर शाह के गुरु गजराज मिश्र ने 2 दिसम्बर, 1815 को कर्नल ब्रेडशॉ के साथ संगौली (सुगौली) सन्धि की।
यह सन्धि 4 मार्च, 1816 को ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी व नेपाल के मध्य सम्पन्न हुई।
संगौली की सन्धि के प्रमुख प्रावधान
- टिहरी रियासत सुदर्शन शाह को प्रदान की गई तथा शेष क्षेत्र को नॉन रेगुलेशन प्रान्त बनाया गया।
- नॉन रेगुलेशन प्रान्त व्यवस्था 1891 ई. में समाप्त हो गई।
- टिंकर एवं छांगरू क्षेत्र ब्रिटिश साम्राज्य को दिया गया।
- नाभी एवं कुटी क्षेत्र ब्रिटिश साम्राज्य का भाग बने।
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