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गढ़वाल का पंवार या परमार राजवंश | garhwal ka panwar and parmar rajvansh

गढ़वाल का पंवार या परमार राजवंश | garhwal ka panwar and parmar rajvansh

गढ़वाल का पंवार या परमार राजवंश

उत्तराखण्ड के गौरवशाली इतिहास में गढ़वाल के पंवार (परमार) राजवंश का विशेष स्थान है। यह टॉपिक UKPSC, UKSSSC, उत्तराखण्ड पुलिस, पटवारी, फॉरेस्ट गार्ड जैसी सभी राज्य स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। इस राजवंश के वीर शासकों और ऐतिहासिक घटनाओं से परीक्षाओं में अक्सर प्रश्न पूछे जाते हैं, इसलिए इसका गहराई से अध्ययन आपके सिलेक्शन के लिए बहुत फायदेमंद साबित होगा।

इस लेख में आप क्या-क्या पढ़ेंगे:
  • गढ़वाल में परमार वंश की स्थापना (राजा कनकपाल) और 52 गढ़ों का एकीकरण कर एक विशाल राज्य बनाने वाले महान शासक 'राजा अजयपाल' की गौरवगाथा।
  • गर्वभंजन महिपतशाह, माधो सिंह भंडारी का शौर्य और मुगलों को धूल चटाने वाली 'नाक काटी रानी' (महारानी कर्णावती) का अदम्य साहस।
  • 'गढ़वाल के अकबर' राजा फतेहशाह के दरबार के नवरत्न, उनके स्वर्णकाल और गुरु गोबिन्द सिंह जी के साथ हुए ऐतिहासिक युद्ध व संबंध।
  • गोरखों के खिलाफ खुड़बुड़ा के ऐतिहासिक युद्ध (1804) में वीरगति पाने वाले राजा प्रद्युम्न शाह का सर्वोच्च बलिदान और वंश के अंतिम शासक तक का सफर।

गढ़वाल का पंवार या परमार राजवंश

हरिकृष्ण रतूड़ी ने अपनी पुस्तक गढ़वाल का इतिहास में पंवार वंश की स्थापना 888 ई. में बताई है, परन्तु अपनी दूसरी पुस्तक गढ़वाल वर्णन में इन्होंने परमार वंश की स्थापना 688 ई. में बताई है।
डॉ. भक्तदर्शन ने 888 ई. को ही परमार वंश की स्थापना तिथि माना है।
कनकपाल परमार वंश का संस्थापक व आदिपुरुष था, परन्तु राहुल सांकृत्यायन अजयपाल को परमार वंश का आदिपुरुष मानते हैं।
इस वंश का प्राचीनतम अभिलेख राजा जगतपाल का 1455 ई. का माना जाता है। यह देवप्रयाग के रघुनाथ मन्दिर से मिला है।
वैकेट की सूची को चारों सूचियों में सर्वाधिक प्रामाणिक माना जाता है। यह सूची सुदर्शन शाह के सभासार ग्रन्थ से मेल खाती है।

वैकेट के अनुसार पंवार वंश के शासक

क्रम शासक क्रम शासक
पहला कनकपाल दूसरा श्यामपाल
तीसरा पाण्डुपाल चौथा अविगत पाल
5वाँ सीगलपाल 6वाँ रतन पाल
9वाँ मदनपाल प्रथम 11वाँ जयचन्द पाल
17वाँ अनन्तपाल प्रथम 18वाँ आभदपाल प्रथम
28वाँ लखनदेव पाल 29वाँ अनन्तपाल द्वितीय (धारशिल शिलालेख)
30वाँ पूरबदेव पाल (पूर्वदेव) 33वाँ असलदेव
34वाँ जगतपाल (देवप्रयाग के रघुनाथ मन्दिर से ताम्रपत्र प्राप्त) 35वाँ जीतपाल
36वाँ आनन्दपाल द्वितीय 37वाँ अजयपाल
38वाँ कल्याणशाह 39वाँ सुन्दरपाल
40वाँ हसदेवपाल 41वाँ विजयपाल
42वाँ सहजपाल 43वाँ बलभद्रशाह
44वाँ मानशाह 45वाँ श्यामशाह
46वाँ महिपतिशाह 47वाँ पृथ्वीपति शाह
48वाँ मेदिनीशाह 49वाँ फतेहशाह
50वाँ उपेन्द्रशाह (सबसे कम कार्यकाल) 51वाँ प्रदीप शाह
52वाँ ललितशाह 53वाँ जकरत (जयकीर्ति) शाह
54वाँ प्रद्युम्न शाह 55वाँ सुदर्शनशाह
56वाँ भवानीशाह 57वाँ प्रतापशाह
58वाँ कीर्तिशाह 59वाँ नरेन्द्रशाह
60वाँ मानवेन्द्रशाह (टिहरी रियासत का अन्तिम पंवार शासक)

पंवार वंश के प्रमुख शासक

राजा कनकपाल
हरिकृष्ण रतूड़ी व एटकिंसन के अनुसार कनकपाल धार नगरी (गुजरात) से चाँदपुर तीर्थाटन के लिए आए थे।
उस समय (9वीं शताब्दी के आस-पास) गढ़वाल क्षेत्र में 52 ठकुरी शासकों का या 52 गढ़ों का शासन था।
इन 52 गढ़ों में एक गढ़ चाँदपुर था, जिसके गढ़पति राजा भानुप्रताप थे। इन्हें सोनपाल नाम से भी जाना जाता था।
सोनपाल ने कनकपाल का स्वागत किया और अपनी पुत्री का विवाह कनकपाल से कर दिया।
कनकपाल ने 888 ई. में चाँदपुर गढ़ी (चमोली) में परमार वंश की नींव रखी।

अजयपाल से पूर्व परमार वंश
  • 15वें परमार शासक- सुरपाल या सुरतिपाल (अभिलेख चमोली जिले के सकण्ड गाँव से प्राप्त)
  • 24वें परमार शासक - सोनपाल (राजधानी भिल्लांग घाटी)
  • 29वें परमार शासक - अनन्तपाल द्वितीय (धारशिल शिलालेख)
  • 34वाँ परमार शासक - जगतपाल (ताम्रपत्र देवप्रयाग के रघुनाथ मन्दिर से प्राप्त)

राजा अजयपाल

  • 37वाँ परमार शासक - अजयपाल
  • पिता - आनन्दपाल (चाँदपुर गढ़ के गढ़पति)
  • शासनकाल - 1500 ई. से 1519 ई.
  • उपाधियाँ - गढ़वाल का अशोक, गढ़वाल का बिस्मार्क व गढ़वाल का नेपोलियन
राहुल सांकृत्यायन ने अजयपाल को गढ़वाल के पंवार वंश का वास्तविक संस्थापक माना है।
  • अजयपाल ने अपनी शक्ति से एक छोटे राज्य को विशाल राज्य में परिवर्तित किया। इसने 52 गढ़ों को जीतकर गढ़वाल राज्य के रूप में इसका एकीकरण किया। - पटवारी लेखपाल 2023
अजयपाल से पूर्व पंवार शासकों की राजधानी चाँदपुर गढ़ी में थी। इसने पहले देवलगढ़ फिर 1517 ई. में श्रीनगर राजधानी स्थापित की।
देवलगढ़ में अजयपाल ने कुल देवी राजराजेश्वरी के मन्दिर का भी निर्माण करवाया तथा सत्यनाथ भैरव गुफा का जीर्णोद्धार करवाया।
अजयपाल गोरखनाथ पन्थ का अनुयायी था। अजयपाल को नवनाथ कथा एवं गौरक्षस्तवाञ्जलि ग्रन्थ में गोरखनाथ सम्प्रदाय के 84 सिद्धों में से एक माना गया है।
1519 ई. में अजयपाल की मृत्यु हुई।
कल्याणशाह अजयपाल का उत्तराधिकारी था।

राजा बलभद्रशाह

  • 43वें परमार शासक - बलभद्रशाह
  • उपाधि - शाह (उपाधि धारण करने वाला प्रथम शासक)
  • बलभद्रशाह का उत्तराधिकारी - मानशाह
ग्वालदम का युद्ध 1581 ई. में पंवार राजा बलभद्रशाह व चन्द शासक रुद्रचन्द के मध्य लड़ा गया था। डॉ. शिव प्रसाद डबराल इस युद्ध की तिथि 1591 ई. मानते हैं।

राजा मानशाह

  • 44वें परमार शासक - मानशाह
  • शासनकाल - 1591 ई. से 1611 ई.
इसके लेख देवप्रयाग के क्षेत्रपाल मन्दिर (1608 ई.) व रघुनाथ मन्दिर (1610 ई.) से प्राप्त हुए हैं।
मानशाह ने देवलगढ़ के गौरजा मन्दिर में स्वर्ण कलश भेंट किया था।
जीतू बगड़वाल टिहरी (बगुडी गाँव) का निवासी था, जिसे मानशाह ने भोट क्षेत्र का फौजदार नियुक्त किया था। जीतू बगड़वाल के पिता का नाम गरीबाराई तथा माता का नाम सुमेरु था। जीतू बगड़वाल के पँवाड़े गढ़वाल में प्रचलित हैं।

राजा श्यामशाह

  • 45वें परमार शासक - श्यामशाह
  • शासनकाल - 1611 ई. से 1610 ई.
  • उपनाम - विलासी राजा
जहाँगीरनामा में यह उल्लेख मिलता है कि श्यामशाह को मुगल दरबार ने घोड़े व हाथी उपहार के रूप में दिए थे।
सती प्रथा का उल्लेख श्यामशाह के समय से मिलता है। श्यामशाह की मृत्यु के पश्चात् इसकी 60 रानियाँ सती हुई थीं।

राजा महिपतशाह

  • महिपतशाह के सेनापति - माधो सिंह भण्डारी, रिखोला लोदी व बनवारी दास
  • महिपतशाह की पत्नी - महारानी कर्णावती
  • श्यामशाह के चाचा - महिपतशाह
महिपतशाह सबसे अधिक आयु में राजा बनने वाला गढ़वाल शासक था।
  • महिपतशाह अपने शासनकाल में शत्रुओं से जूझते रहे तथा उन्हें पराजित किया। इस कारण इन्हें गढ़वाल में गर्वभंजन कहा गया। UKPSC 2024
महिपतशाह ने तिब्बत पर तीन बार आक्रमण किया। पटवारी लेखपाल 2023
शाहजहाँ के राज्याभिषेक में सम्मिलित न होने के कारण मुगल लेखों में महिपतशाह को अक्खड़ राजा कहा गया है।
महिपतशाह द्वारा अज्ञानतावश नागा साधुओं की हत्या हो गई थी, इस अपराध के प्रायश्चित हेतु उसने ऋषिकेश के भरत मन्दिर में तपस्या की तथा कुमाऊँ युद्ध में स्वयं का बलिदान दे दिया।
महिपतशाह ने रोटी सूची प्रथा आरम्भ की थी।
प्रसिद्ध चित्रकार मोलाराम ने महिपतशाह को महाप्रचण्ड भुजदण्ड की संज्ञा दी थी।

माधो सिंह भण्डारी
इनका जन्म मलेथा टिहरी गढ़वाल में हुआ था।
इन्हें अपने एकमात्र पुत्र गजे सिंह की बलि देने के कारण गर्भभंजक कहा जाता है।
रानी कर्णावती के ताम्रलेख से यह भी ज्ञात होता है कि 1640 ई. के आस-पास हुए तुमुल युद्ध (छोटा चीन युद्ध) में माधो सिंह वीरगति को प्राप्त हुए।
मलेथा कूल का निर्माण माधो सिंह ने छेणाधार पहाड़ी पर करवाया था, जिसमें चकमा नदी या डागर नदी से पानी निकाला गया था।

राजा पृथ्वीपतिशाह

शासनकाल - 1640-64 ई. (7 वर्ष की अल्पायु में)
संरक्षिका - महारानी कर्णावती - पटवारी लेखपाल 2023
पृथ्वीपतिशाह ने राजगढ़ी को दूसरी राजधानी बनाया और दिलीपशाह को वहाँ का शासक नियुक्त किया।
मुगल सेनापति खलीतुल्ला कासिम खाँ ने 1655 ई. में गढ़ राज्य पर आक्रमण किया।
इस युद्ध में चन्द राजा बाजबहादुर चन्द व सिरमौर राजा मान्धता प्रकाश ने मुगल सेना का साथ दिया। इस प्रकार तीनों सेनाओं ने दून तथा भाबर क्षेत्र पर विजय प्राप्त की थी।
  • मुगल शहजादा सुलेमान शिकोह को पृथ्वीपतिशाह ने शरण दी थी। इसे अभागा शहजादा भी कहा जाता है। - पटवारी लेखपाल 2023
मेदिनीशाह को पराक्रमी राजा का डरपोक पुत्र कहा जाता था।
1662 ई. में मेदिनीशाह की मृत्यु का सन्देश औरंगजेब ने पृथ्वीपतिशाह को दिया था।
पृथ्वीपतिशाह व मन्धाता प्रकाश के बीच हाटकोटी की सन्धि हुई थी।
1667 ई. में पृथ्वीपतिशाह की मृत्यु के पश्चात् उसका पौत्र फतेहशाह गद्दी पर बैठा था।

महारानी कर्णावती
  • कर्णावती महिपतशाह की पत्नी व पृथ्वीपतिशाह की संरक्षिका थीं।
  • इन्होंने महिपतशाह के सेनापति माधो सिंह भण्डारी, रिखोला लोदी और बनवारी दास की सहायता से शासन सम्भाला।
  • रानी कर्णावती ने करनपुर नामक गाँव की स्थापना दून में की थी। रानी कर्णावती के समय नवादा दून घाटी की राजधानी थी। देहरादून की राजपुर नहर का निर्माण रानी कर्णावती ने करवाया था।
  • रानी कर्णावती को ताराबाई और गोलकुण्डा की दुर्गावती के नाम से भी जाना जाता है।
  • शाहजहाँ के सेनापति नवाजत खाँ ने रानी कर्णावती के समय दून घाटी पर आक्रमण किया। रानी कर्णावती ने मुगल सैनिकों को पकड़कर उनकी नाक कटवा दी थी, जिसके कारण इन्हें नाक काटी रानी कहते हैं।
  • डॉ. शिव प्रसाद डबराल द्वारा रानी कर्णावती को नाक काटनी रानी नाम दिया गया था। रानी कर्णावती को निकोलस मनूची ने अपनी पुस्तक स्टोरिया डू मोगोर में साक्षात् 'दुर्गा' कहा है।

राजा फतेहशाह

  • शासनकाल - 1667-1716 ई.
  • संरक्षिका - राजमाता कटौची
  • उपनाम - गढ़वाल का शिवाजी, गढ़वाल का अकबर
  • फतेहशाह का काल - गढ़वाल का स्वर्ण काल (मतिराम ने)
गुरु विलास के अनुसार, भैंगाणी (भंगाणी) का युद्ध 1689 ई. में गुरु गोबिन्द सिंह एवं फतेहशाह के मध्य हुआ था।
गुरु गोबिन्द सिंह की आत्मकथा विचित्र नाटक में इस युद्ध का वर्णन मिलता है। - UKPSC 2025

फतेहशाह के दरबार के नौरत्न
  • खेतराम धस्माना
  • कीर्तिराम कनठौला
  • सहदेव चन्दोला
  • सुरेशानन्द बर्थवाल
  • हरिदत्त नौटियाल
  • रुद्रदत्त कमौठी
  • शशिधर डंगवाल
  • बासवानन्द बहुगुणा
  • हरिदत्त थपलियाल
फतेहशाह ने सिख गुरु रामराय को अपने दरबार में बुलाया तथा देहरादून में गुरुद्वारा बनाने में उनकी सहायता की थी।
गुरुद्वारे की आय हेतु फतेहशाह ने खुड़बुड़ा, राजपुर, चामासारी नामक तीन गाँव दान दिए थे।
मोलाराम के अनुसार, उपेन्द्रशाह फतेहशाह का उत्तराधिकारी था।
उपेन्द्रशाह का कार्यकाल लगभग 1 वर्ष रहा, जो किसी पंवार शासक का सबसे कम कार्यकाल था।

राजा प्रद्युम्न शाह

  • इनका शासनकाल 1786 ई. से 1804 ई. तक था।
  • बद्रीदत्त पाण्डे के अनुसार, प्रद्युम्न शाह को गढ़वाल एवं कुमाऊँ का संयुक्त शासक घोषित किया गया था।
  • कुमाऊँ पर हर्षदेव जोशी ने प्रद्युम्न शाह के प्रतिनिधि के रूप में शासन किया था।
  • खुड़बुड़ा के युद्ध में 14 मई, 1804 को गोरखों से लड़ते हुए प्रद्युम्न शाह वीरगति को प्राप्त हो गया।
  • अपने भाई प्रेम के कारण प्रद्युम्न शाह गोरखों के साथ खुड़बुड़ा के युद्ध में शहीद हो गये थे।
  • इन्हें गढ़वाल का हुमायूँ भी कहा जाता है।
  • मानवेन्द्रशाह (वर्ष 1946-1949) इस वंश का अन्तिम शासक था।
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