गाँधीजी का उत्तराखण्ड में आगमन

गाँधीजी का उत्तराखण्ड में आगमन

उत्तराखण्ड के गौरवशाली इतिहास और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में इसके अद्वितीय योगदान को समझना हर प्रतियोगी छात्र के लिए बेहद जरूरी है। यह ऐतिहासिक विषय UKPSC, UKSSSC, Uttarakhand Police, Patwari, Forest Guard जैसी सभी उत्तराखण्ड राज्य स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। आइए, इस प्रेरणादायक ऐतिहासिक यात्रा और राज्य निर्माण के अमर संघर्ष को करीब से जानें।

इस लेख में आप क्या-क्या पढ़ेंगे:
  • स्वतंत्रता संग्राम में उत्तराखण्ड: गाँधीजी का उत्तराखण्ड आगमन, पेशावर काण्ड के नायक वीरचन्द्र सिंह गढ़वाली, और सविनय अवज्ञा से लेकर भारत छोड़ो आन्दोलन तक राज्य के वीरों की शौर्य गाथा।
  • आजाद हिन्द फौज और नारी शक्ति: सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिन्द फौज में उत्तराखण्ड के सैनिकों का उत्कृष्ट योगदान तथा स्वतंत्रता आन्दोलन में बिश्नी देवी शाह, कुन्ती वर्मा व सरला बहन जैसी सशक्त महिलाओं की भूमिका।
  • प्रमुख जन-आंदोलन: राज्य में हुए कुली बेगार, रक्षा सूत्र, वन आन्दोलन, डोला-पालकी और शराब विरोधी जैसे महत्वपूर्ण स्थानीय आन्दोलनों की विस्तृत जानकारी।
  • पृथक् राज्य आन्दोलन और शहीदों को नमन: उत्तराखण्ड क्रान्ति दल का गठन, खटीमा, मसूरी और रामपुर तिराहा काण्ड के अमर शहीदों का बलिदान, और गैरसैंण को राजधानी बनाने के लंबे संघर्ष का सम्पूर्ण घटनाक्रम।
महात्मा गाँधी अप्रैल, 1915 में पहली बार हरिद्वार, कुम्भ मेले के अवसर पर आए थे।
वर्ष 1916 में गाँधीजी ने देहरादून की यात्रा की थी।
गाँधीजी वर्ष 1927 में दूसरी बार हरिद्वार आए थे। गाँधीजी ने पहली बार 14 जून, 1929 को कुमाऊँ क्षेत्र की यात्रा की थी।
इसी यात्रा के क्रम में बागेश्वर के कौसानी में 12 दिन के प्रवास के समय गाँधीजी ने अनाशक्ति योग नाम से गीता की भूमिका लिखी थी।
यंग इण्डिया पुस्तक में गाँधीजी ने कौसानी को भारत का स्विट्जरलैण्ड कहा है।

दाण्डी मार्च एवं नमक कानून आन्दोलन

दाण्डी मार्च के 78 सत्याग्रहियों में से तीन सत्याग्रही (ज्योतिराम काण्डपाल, भैरव दत्त जोशी तथा वीर खड्ग बहादुर) उत्तराखण्ड से थे।

पेशावर काण्ड
23 अप्रैल, 1930 को पेशावर में वीरचन्द्र सिंह गढ़वाली के नेतृत्व में 2/18 गढ़वाल राइफल्स के सैनिकों ने निहत्थे अफगान स्वतन्त्रता सेनानियों पर गोली चलाने से मना कर दिया था। इतिहास में यह घटना पेशावर काण्ड के नाम से प्रसिद्ध है। मोतीलाल नेहरू पेशावर काण्ड से बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने 23 अप्रैल को सम्पूर्ण देश में गढ़वाल दिवस मनाने की घोषणा कर दी।
बैरिस्टर मुकुन्दीलाल ने गढ़वाली सैनिकों की पेशावर काण्ड में पैरवी की।

सविनय अवज्ञा आन्दोलन और उत्तराखण्ड

गोविन्द बल्लभ पन्त ने 23 मई, 1930 को मल्लीताल के रामलीला मैदान में नमक बनाने की घोषणा की थी। 25 मई को इन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद यहाँ इन्द्र सिंह नयाल ने नमक बनाकर बेचा था।
बद्रीदत्त पाण्डे ने 27 मई, 1930 को नैनीताल में नमक बेचा था। अल्मोड़ा में नमक सत्याग्रह के समय झण्डा सत्याग्रह भी हुआ था।
4 मई, 1930 को अल्मोड़ा के नन्दा देवी प्रांगण में मोहन जोशी के नेतृत्व में विशाल सभा का आयोजन किया गया था।
सविनय अवज्ञा आन्दोलन में उत्तराखण्ड से सर्वाधिक हिस्सेदारी अल्मोड़ा के सल्ट क्षेत्र की रही थी। यहाँ प्रत्येक गाँव में तिरंगा फहराया गया था।
दुगड्डा सविनय अवज्ञा आन्दोलन के समय गढ़वाल का मुख्य केन्द्र था।
 

हिन्दुस्तान सोशलिस्ट एसोसिएशन और उत्तराखण्ड

स्थापना - वर्ष 1928 में (चन्द्रशेखर आजाद द्वारा)
चन्द्रशेखर आजाद ने भवानी सिंह रावत के साथ दुगड्डा के जंगल में लगभग 7 दिन का शस्त्र प्रशिक्षण लिया था।
चाँदनी चौक में स्थित गड़ोदिया स्टोर डकैती काण्ड 6 जुलाई, 1930 को हुआ था। इसमें भवानी सिंह ने भी भाग लिया था।
वर्ष 1933 में हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के सदस्य इन्द्र सिंह गढ़वाली ने मद्रास बम काण्ड में भाग लिया था। ये इस बम काण्ड में पकड़े गए तथा इन्हें 20 वर्ष की कालापानी की सजा दी गई।
वर्ष 1933 में बच्चू लाल भट्ट ने ऊटी बैंक डकैती काण्ड में भाग लिया था तथा पकड़े जाने पर इन्हें 18 वर्ष की सजा हुई थी।

उत्तराखण्ड में शिल्पकार आन्दोलन

टम्टा सुधार सभा का गठन कुमाऊँ में वर्ष 1905 में हुआ था।
हरिप्रसाद टम्टा ने वर्ष 1911 में दलितों के लिए शिल्पकार शब्द का प्रयोग किया था।
अल्मोड़ा में कुमाऊँ शिल्पकार सुधारिणी सभा का गठन वर्ष 1931 में किया गया था।
संयुक्त प्रान्त में अस्पृश्यता विरोधी समिति का चेयरमैन हृदयनाथ कुंजरू तथा गढ़वाल का अध्यक्ष मुकुन्दीलाल को चुना गया था।
वर्ष 1935 में श्रीनगर गढ़वाल में दलितों की एक बड़ी सभा का आयोजन किया गया था। इसके अध्यक्ष सी. एच. चौफिन थे।

अमन सभा की स्थापना

लैंसडाउन में अमन सभा की स्थापना वर्ष 1930 में हुई थी। इसका उद्देश्य लैंसडाउन छावनी को राष्ट्रवादी आन्दोलन से बचाना था। हितैषी पत्र व हितैषी प्रेस अमन सभा का सहयोगी था।
6 सितम्बर, 1932 को इस सभा द्वारा लैंसडाउन में गवर्नर मैलकम हेली का दरबार लगा था।
इसी दरबार में जयानन्द भारती द्वारा मैलकम हेली गो बैक, अमन सभा मुर्दाबाद का नारा लगाया गया था।

उत्तराखण्ड में व्यक्तिगत सत्याग्रह

गाँधीजी ने वर्ष 1940 में लॉर्ड लिनलिथगो के अगस्त प्रस्ताव के विरोध में व्यक्तिगत सत्याग्रह प्रारम्भ किया था।
जगमोहन सिंह नेगी उत्तराखण्ड के प्रथम व्यक्तिगत सत्याग्रही थे।
ब्रिटिश गढ़वाल में व्यक्तिगत सत्याग्रह की प्रथम बैठक डाण्डामुण्डी में की गई थी।
प्रताप सिंह नेगी कुमाऊँ में व्यक्तिगत सत्याग्रह आन्दोलन के नेतृत्वकर्ता थे।
चमोली में व्यक्तिगत सत्याग्रह आन्दोलन का संचालन अनुसूइया प्रसाद बहुगुणा ने किया था।
25 जनवरी, 1941 को डोला-पालकी आन्दोलन के कारण महात्मा गाँधी ने ब्रिटिश गढ़वाल में व्यक्तिगत सत्याग्रह पर प्रतिबन्ध लगा दिया था।
गढ़वाल में व्यक्तिगत सत्याग्रह पर लगा प्रतिबन्ध 28 फरवरी, 1941 को गाँधीजी द्वारा हटा दिया गया था।
जगमोहन सिंह नेगी को वर्ष 1941 में व्यक्तिगत सत्याग्रह के कारण ही एक वर्ष की सजा हुई थी।
थान सिंह रावत गुजडू, गढ़वाल से थे। इन्हें भी व्यक्तिगत सत्याग्रह के कारण एक वर्ष की सजा हुई थी।
देवीदत्त पन्त को व्यक्तिगत सत्याग्रह के लिए 9 महीने की सजा दी गई थी।
महात्मा गाँधी ने सल्ट क्षेत्र को स्वतन्त्रता संग्राम में अद्वितीय योगदान के लिए कुमाऊँ के बारदोली की संज्ञा दी थी।

भारत छोड़ो आन्दोलन में उत्तराखण्ड का योगदान

9 अगस्त, 1942
8 अगस्त, 1942 को बम्बई में प्रमुख कांग्रेस नेताओं की गिरफ्तारी के विरोध में उत्तराखण्ड में अनेक स्थानों पर जुलूस निकाले गए और हड़तालें हुईं।

18 अगस्त, 1942
देघाट में जनता पर पुलिस ने गोलियाँ चलाईं, जिसमें हीरामणि व हरिकृष्ण शहीद हुए।

25 अगस्त, 1942
सालम क्षेत्र में डिप्टी कलक्टर मेहरबान सिंह ने जाट सेना भेजी, जिसका जनता ने विरोध किया।
रामसिंह आजाद (सालम का शेर) ने वर्ष 1942 में सालम से फरार होने के बाद बद्रीनाथ में अपनी गिरफ्तारी दी थी तथा रामसिंह को कालेपानी की सजा दी गई थी।
शान्तिलाल त्रिवेदी को गाँधीजी ने कुमाऊँ भेजा था। इसने वर्ष 1937 में चनौदा में गाँधी आश्रम की स्थापना की थी। इस आश्रम में 2 सितम्बर, 1942 को ताला लगा दिया गया।

5 सितम्बर, 1942
5 सितम्बर, 1942 को सल्ट क्षेत्र के खुमाड़ में स्थित कांग्रेस के मुख्यालय में आन्दोलनकारियों पर ब्रिटिश सेना ने गोलियाँ चलाईं, जिसमें दो सगे भाई गंगाराम और खिमादेव शहीद हो गए। इसलिए खुमाड़ में प्रत्येक वर्ष 5 सितम्बर को शहीद स्मृति दिवस मनाया जाता है।

  • स्वतन्त्रता सेनानी मोहनलाल को शान्तिलाल त्रिवेदी द्वारा मातृभूमि को सत्यनिष्ठ सेवक की संज्ञा दी गई थी।
  • भारत छोड़ो आन्दोलन के समय द्वाराहाट के मदन मोहन उपाध्याय ने भूमिगत रेडियो स्टेशन संचालन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
  • सदानन्द कुकरेती ने स्वतन्त्रता आन्दोलन के समय सिलांगी में राष्ट्रीय विद्यालय की स्थापना की थी।
  • प्रेम विद्यालय की स्थापना ताड़ीखेत में देवकीनन्दन पाण्डे तथा भागीरथ पाण्डे द्वारा की गई थी।

आजाद हिन्द फौज में उत्तराखण्ड का योगदान

  • कैप्टन मोहन सिंह के द्वारा वर्ष 1941 में आजाद हिन्द फौज का गठन किया गया था।
  • वर्ष 1943 में सुभाषचन्द्र बोस ने सिंगापुर में आजाद हिन्द फौज की कमान सम्भाली थी।
  • आजाद हिन्द फौज के कुल सैनिकों में लगभग 2500 सैनिक उत्तराखण्ड के थे। इनमें से कुछ उच्च पदों पर आसीन थे।
  • सिंगापुर में लेफ्टिनेण्ट चन्द्र सिंह नेगी ऑफिसर्स ट्रेनिंग स्कूल के कमाण्डर नियुक्त किए गए थे।
  • सुभाषचन्द्र बोस की अंगरक्षक बटालियन के कमाण्डर पद पर मेजर देव सिंह दानू को नियुक्त किया गया।
  • कर्नल पीसी (पितृशरण) रतूड़ी सुभाष रेजीमेण्ट की प्रथम बटालियन के कमाण्डर थे।
  • इन्हें बर्मा अभियान के समय अदम्य साहस दिखाने के लिए सरदार-ए-जंग की उपाधि दी गई थी।
  • गढ़वाल राइफल्स की दो बटालियन 2/18 तथा 5/18, 21 सितम्बर, 1942 को आजाद हिन्द फौज में सम्मिलित हो गई थीं।
  • जौनसार भाबर के वीर केसरी चन्द आजाद हिन्द फौज में शामिल हुए थे। ये इम्फाल मोर्चा के समय पकड़े गए थे। इन्हें 3 मई, 1945 को दिल्ली में फाँसी की सजा दी गई थी। इनकी स्मृति में चौलीथात में 3 मई को मेला लगता है।

स्वतन्त्रता संग्राम और उत्तराखण्ड की महिलाएँ

दुर्गादेवी पन्त
17 जून, 1929 को ताड़ीखेत (अल्मोड़ा) में 113 रुपये की थैली गाँधीजी को भेंट की थी। 20 नवम्बर, 1932 में कुर्माचल महिला सुधार सम्मेलन (अल्मोड़ा) की अध्यक्षता की गई थी।

कुन्ती वर्मा
वर्ष 1931 कुन्ती वर्मा के नेतृत्व में महिलाओं का दल हल्द्वानी पहुँचा, जहाँ महिला सत्याग्रहियों को पहली बार गिरफ्तार किया गया था। वर्ष 1932 में कुन्ती वर्मा को जिन्दा या मुर्दा पकड़ने का आदेश जारी किया गया।

बिश्नी देवी शाह
अल्मोड़ा की बिश्नी देवी शाह को अमृत बाजार पत्रिका में कुमाऊँ स्वतन्त्रता संग्राम में अग्रणी भूमिका निभाने वाली महिला बताया गया। बिश्नी देवी शाह के नेतृत्व में कुन्ती वर्मा, जीवन्ती, मंगला आदि महिलाओं ने नमक सत्याग्रह के समय अल्मोड़ा के नगरपालिका भवन में झण्डा फहराया।

मालती देवी
मालती देवी के नेतृत्व में भारत छोड़ो आन्दोलन के समय देश सेवक संघ की महिलाओं ने रेल सम्पत्ति को क्षति पहुँचाई।

सरला बहन
गाँधीजी ने अपनी विदेशी शिष्या सरला बहन (कैथरीन हैलीमन) को वर्ष 1941 में उत्तराखण्ड भेजा था। सरला बहन ने कौसानी में लक्ष्मी आश्रम की स्थापना की थी।

कमला एवं बसन्ती
लक्ष्मी आश्रम से जुड़ी दो सगी बहनों ने सर्वोदय का प्रचार-प्रसार किया था।

मीरा बहन
गाँधीजी की दूसरी शिष्या मीरा बहन (मेडलेन स्लेड) ने ऋषिकेश में पशुलोक की स्थापना की थी।

तुलसी देवी रावत
इन्होंने अल्मोड़ा में वर्ष 1948 में महिला जागृति नामक मासिक पत्रिका का सम्पादन किया था। ये वर्ष 1948-60 तक जोहार महिला संगठन की मन्त्री भी रही थीं।

रूपा देवी
जोहार की रूपा देवी ने समाज सेवा में अपना सम्पूर्ण जीवन लगा दिया था।

उत्तराखण्ड में हुए अन्य आन्दोलन

सकलाना विद्रोह
इस विद्रोह के नेतृत्वकर्ता दौलत राम, भोलूराम नौटियाल तथा नागेन्द्र सकलानी थे।

कीर्तिनगर आन्दोलन
इस आन्दोलन ने राजसत्ता को हिला दिया था। इसी आन्दोलन में 11 जनवरी, 1948 को भोलूराम तथा नागेन्द्र शहीद हो गए थे।

खास पट्टी वन आन्दोलन
यह आन्दोलन वर्ष 1906-07 में गढ़वाल क्षेत्र में हुआ था।
इस आन्दोलन में जनता ने सदानन्द गैरोला को रस्सी से बाँध दिया था।

बाल सभा
इसकी स्थापना मार्च, 1935 को टिहरी के सकलाना पट्टी के उनियाल गाँव के सत्यप्रसाद रतूड़ी ने की थी।
उद्देश्य- छात्रों में देश भक्ति की भावना का विकास करना था। बाल सभा के सदस्यों द्वारा केसरी पत्रिका का सम्पादन भी किया गया था।

सड़क आन्दोलन (1939-40)
इस आन्दोलन का मुख्य उद्देश्य गरुड़ से कर्णप्रयाग तथा लैंसडाउन से पौड़ी तक सड़क का निर्माण कराना था।

कुली बेगार आन्दोलन
इस आन्दोलन में ब्रिटिश अधिकारी जब किसी स्थान की यात्रा पर निकलते थे, तो उनका सामान स्थानीय लोगों को उठाना पड़ता था।

गुजडू आंदोलन
यह आन्दोलन दक्षिण गढ़वाल में रामप्रसाद नौटियाल के नेतृत्व में वर्ष 1942 में किया गया था।

रक्षा सूत्र आन्दोलन
यह आन्दोलन भिलंगना नदी क्षेत्र में पेड़ों के कटान को रोकने के लिए तथा पेड़ों पर रक्षा सूत्र बाँधकर किया गया था। इस आन्दोलन का नेतृत्व सुरेश भाई ने वर्ष 1994 में किया था।

कुली बर्दायश आन्दोलन
इस आन्दोलन का प्रमुख कारण यह था कि स्थानीय लोगों को ब्रिटिश अधिकारियों के लिए निःशुल्क भोजन की व्यवस्था करनी पड़ती थी।

कुंजनी वन आन्दोलन
यह आन्दोलन टिहरी रियासत में राजस्व करों में वृद्धि के विरुद्ध किया गया था। इसके नेतृत्वकर्ता अमर सिंह थे।

कोटाखर्रा आन्दोलन
इस आन्दोलन का मुख्य उद्देश्य तराई क्षेत्रों में भूमिहीन किसानों को भूमि उपलब्ध कराना था।

कनकटा बैल भ्रष्टाचार आन्दोलन
यह आन्दोलन अल्मोड़ा के बड़ियार रैत गाँव में बैल के दोनों कान काटकर उसकी बीमा राशि हड़प लेने के विरोध में हुआ था।

शराब विरोधी आन्दोलन
इस आन्दोलन के अन्तर्गत उत्तराखण्ड संघर्षवाहिनी संस्था ने वर्ष 1984 में 'नशा नहीं रोजगार दो' का नारा दिया था।

विश्वविद्यालय आन्दोलन
इस आन्दोलन के अन्तर्गत वर्ष 1973 को राज्य में गढ़वाल विश्वविद्यालय तथा कुमाऊँ विश्वविद्यालय की स्थापना हुई थी।

डूंगी-पैंतोली आन्दोलन
यह आन्दोलन चमोली जिले में बाँज के जंगल काटने के विरोध में हुआ था।

डाडामण्डी आन्दोलन
यह आन्दोलन भारत छोड़ो आन्दोलन के समय गढ़वाल में उमराव सिंह रावत के नेतृत्व में किया गया था। इसमें क्रान्तिकारियों ने दुगड्डा क्षेत्र में दूरसंचार साधनों को क्षतिग्रस्त किया था।

हेवलघाटी आन्दोलन
यह आन्दोलन टिहरी में चूना-पत्थर की अवैध खादान से सम्बन्धित था।

स्वतन्त्रता संग्राम में समाचार-पत्रों का योगदान

  • उत्तराखण्ड का पहला समाचार-पत्र : द हिल्स (1842 ई., मसूरी)
  • उत्तराखण्ड की पहली प्रिण्टिंग प्रेस : मसूरी (मैकिनन द्वारा)
  • उत्तराखण्ड में प्रकाशित प्रथम दैनिक पत्र : पर्वतीय
  • उत्तराखण्ड में प्रकाशित पहला हिन्दी पत्र : समय विनोद (1868 ई.)

अल्मोड़ा अखबार
सम्पादन- 48 वर्ष (1871-1918) तक
प्रथम सम्पादक- बुद्धिबल्लभ पन्त

गढ़वाल के प्रमुख समाचार-पत्र
समाचार-पत्र जिला अवधि
राष्ट्रीय ज्वाला पौड़ी (दुगड्डा) त्रैमासिक
युगवाणी देहरादून मासिक
विशाल कीर्ति पौड़ी मासिक
उत्तराखण्ड दर्शन देहरादून मासिक
गढ़वाली समाचार-पत्र देहरादून
गढ़वाल समाचार-पत्र दुगड्डा
पर्वतजन देहरादून मासिक
अनिकेत चमोली (गोपेश्वर) साप्ताहिक
नया जमाना देहरादून साप्ताहिक
सत्यपथ पौड़ी (कोटद्वार) साप्ताहिक
देवभूमि चमोली (नन्दप्रयाग) साप्ताहिक
हिमवन्त देहरादून साप्ताहिक
कर्मभूमि पौड़ी (लैन्सडाउन) साप्ताहिक
बदरी विशाल हरिद्वार दैनिक
जयन्त पौड़ी (कोटद्वार) दैनिक

कुमाऊँ के प्रमुख समाचार-पत्र
समाचार-पत्र जिला अवधि
पहाड़ नैनीताल वार्षिक
पुरवासी अल्मोड़ा वार्षिक
उत्तरा नैनीताल त्रैमासिक
आज का पहाड़ पिथौरागढ़ त्रैमासिक
मध्य हिमालय पिथौरागढ़ मासिक
नैनीताल समाचार नैनीताल पाक्षिक
प्रजाबन्धु रानीखेत, अल्मोड़ा साप्ताहिक
ऊधमसिंह नगर का दर्पण ऊधमसिंह नगर साप्ताहिक

पृथक् राज्य आन्दोलन

गढ़वाल एवं कुमाऊँ क्षेत्र को मिलाकर एक पृथक् राज्य बनाने सम्बन्धी माँग सर्वप्रथम श्रीनगर सम्मेलन में उठाई गई थी।

श्रीनगर सम्मेलन
  • तिथि - 5-6 मई, 1938
  • अध्यक्ष - प्रताप सिंह
  • भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के इस विशेष अधिवेशन में पण्डित जवाहरलाल नेहरू और विजयलक्ष्मी पण्डित शामिल हुए थे।
  • श्रीदेव सुमन ने इसमें एक अलग राज्य की माँग की थी।

उत्तराखण्ड में पृथक् राज्य की माँग से सम्बन्धित प्रमुख घटनाएँ

  • वर्ष 1946 हल्द्वानी में बद्रीदत्त पाण्डे की अध्यक्षता में कांग्रेस का सम्मेलन हुआ था, जिसमें उन्होने उत्तरांचल के पर्वतीय भू-भाग को विशेष वर्ग में रखने की माँग की थी।
  • वर्ष 1955 राज्य पुनर्गठन आयोग के अध्यक्ष फजल अली ने उत्तर प्रदेश पुनर्गठन के तहत पर्वतीय क्षेत्र के लिए एक अलग राज्य बनाने की बात कही थी।
  • वर्ष 1957 मानवेन्द्र शाह ने पृथक् राज्य के लिए नए सिरे से माँग उठाई थी।
  • वर्ष 1967 24-25 जून के रामनगर सम्मेलन में पर्वतीय राज्य परिषद् का गठन दयाकृष्ण पाण्डे की अध्यक्षता में किया गया था।
  • वर्ष 1968 ऋषि बल्लभ सुन्दरियाल के नेतृत्व में पृथक् राज्य के लिए दिल्ली में प्रदर्शन किया गया था।
  • वर्ष 1969 पर्वतीय विकास परिषद् का गठन उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा क्षेत्र विकास हेतु किया गया था।
  • वर्ष 1970 कुमाऊँ राष्ट्रीय मोर्चा का गठन कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव पी.सी.जोशी ने किया।
  • वर्ष 1972 उत्तरांचल परिषद् का गठन नैनीताल में किया गया था।
  • वर्ष 1973 में इस परिषद् ने दिल्ली चलो का नारा दिया था।
  • वर्ष 1976 उत्तराखण्ड युवा परिषद् का गठन किया गया था।
  • वर्ष 1979 जनता पार्टी के सांसद त्रेपन सिंह नेगी के नेतृत्व में उत्तरांचल राज्य परिषद् की स्थापना हुई थी।
  • वर्ष 1987 लालकृष्ण आडवाणी की अध्यक्षता में भाजपा पार्टी का सम्मेलन अल्मोड़ा में किया गया था। इस सम्मेलन में उत्तर प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्रों को अलग राज्य का दर्जा देने की माँग स्वीकार कर ली गई।
  • वर्ष 1988 उत्तरांचल उत्थान परिषद् का गठन सोबन सिंह जीना की अध्यक्षता में किया गया था।
  • वर्ष 1989 उत्तरांचल संयुक्त संघर्ष समिति का गठन किया गया।
  • वर्ष 1991 उत्तराखण्ड मुक्ति मोर्चा का गठन किया गया था।

उत्तराखण्ड क्रान्ति दल का गठन

  • पर्वतीय जन विकास सम्मेलन का आयोजन 24-25 जुलाई, 1979 में मसूरी में हुआ था। इसी सम्मेलन में उत्तराखण्ड क्रान्ति दल का गठन हुआ था।
  • इसके प्रथम अध्यक्ष कुमाऊँ विश्वविद्यालय के कुलपति शिक्षाविद् डॉ. देवीदत्त पन्त को बनाया गया था।
  • वर्ष 1987 में उत्तराखण्ड क्रान्ति दल का विभाजन हो गया तथा दल का नेतृत्व युवा नेता काशी सिंह ऐरी को सौंपा गया।
  • त्रिवेन्द्र पंवार ने 23 अप्रैल, 1987 को संसद में पत्र बम फेंका था। ये उत्तराखण्ड क्रान्ति दल के उपाध्यक्ष थे।
  • वर्ष 1990 में क्रान्ति दल के विधायक जसवन्त सिंह बिष्ट ने उत्तर प्रदेश विधानसभा में पृथक् राज्य का पहला प्रस्ताव रखा था।

उत्तराखण्ड पृथक् राज्य आन्दोलन और वर्ष 1994 की घटनाएँ

अप्रैल, 1994 में उत्तरांचल राज्य की माँग को लेकर उत्तराखण्ड पीपुल्स फ्रण्ट की स्थापना की गई थी।
बहादुर राम टम्टा ने अप्रैल, 1994 में संयुक्त उत्तराखण्ड राज्य मोर्चा का गठन किया था।
कौशिक समिति का गठन उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमन्त्री मुलायम सिंह यादव द्वारा किया गया था।
इसमें पृथक् राज्य की संरचना तथा राजधानी के लिए नगर विकास मन्त्री रमाशंकर कौशिक ने अध्यक्षता की थी। कौशिक समिति ने अपनी रिपोर्ट वर्ष 1994 में राज्य सरकार को सौंपी थी।
8 पर्वतीय जिलों को मिलाकर उत्तराखण्ड राज्य एवं राजधानी गैरसैंण को बनाने की सिफारिश कौशिक समिति ने की थी।
कौशिक समिति की सिफारिश जून, 1994 में स्वीकार कर ली गई तथा राज्य विधानसभा में विधेयक पास किया गया।
पृथक् उत्तराखण्ड की अनिवार्यता पर सुझाव देने के लिए वर्ष 1994 में विनोद बड़थ्वाल समिति का गठन किया गया था।
  • 2 अगस्त, 1994 को पौड़ी गढ़वाल से उत्तराखण्ड जन आन्दोलन की शुरुआत की गई थी।
  • मुलायम सिंह यादव द्वारा वर्ष 1994 में आरक्षण की नई व्यवस्था लागू की गई थी। इसके विरोध में अगस्त, 1994 को इन्द्रमणि बड़ोनी ने पौड़ी में आमरण अनशन शुरू किया था।
  • 1 सितम्बर, 1994 में ऊधमसिंह नगर के खटीमा में पुलिस द्वारा आन्दोलनकारियों पर गोलियाँ चलाई गई थीं। इसमें 25 लोग मारे गए थे।
वर्ष 1994 में घटित खटीमा काण्ड की जाँच हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश एस. श्रीवास्तव के निर्देशन में की गई थी।
  • मसूरी में 2 सितम्बर, 1994 को रैली आयोजित की गई थी। इस रैली पर पुलिस ने गोलियाँ चलवा दी थीं, जिसमें सात आन्दोलनकारियों के साथ पुलिस अधिकारी उमाकान्त त्रिपाठी भी शहीद हुए।
  • न्यायमूर्ति मुरलीधर के निर्देशन में मसूरी काण्ड की जाँच हुई थी।
  • मसूरी के वुडस्टॉक स्कूल के समीप बाटा-घाट काण्ड 15 सितम्बर, 1994 को हुआ था।
  • उत्तराखण्ड छात्र युवा संघर्ष समिति का गठन सितम्बर, 1994 में किया गया था।
  • 2 अक्टूबर, 1994 को दिल्ली रैली में भाग लेने जा रहे आन्दोलनकारियों पर रामपुर तिराहे (मुजफ्फरनगर काण्ड) पर पुलिस द्वारा गोलियाँ चलाई गई थीं। इस गोली काण्ड में 6 लोगों की मृत्यु हुई।
  • रामपुर तिराहा काण्ड को क्रूर शासक की क्रूर हिंसा की संज्ञा दी गई थी तथा इस काण्ड को चण्डी प्रसाद भट्ट द्वारा पूरे देश व सभ्य समाज पर एक कलंक बताया गया था।
  • 3 अक्टूबर, 1994 को रामपुर तिराहा काण्ड की प्रतिक्रियास्वरूप उत्तराखण्ड क्षेत्र में हिंसक प्रदर्शन हुए थे।
  • नेगी समिति का गठन रामपुर तिराहा काण्ड की जाँच के लिए किया गया था।
  • उत्तरांचल प्रदेश संघर्ष समिति के अध्यक्ष भुवनचन्द्र खण्डूरी के नेतृत्व में 7 दिसम्बर, 1994 को दिल्ली में एक रैली हुई थी।
  • जेल भरो आन्दोलन 9 दिसम्बर, 1994 को हुआ था, जिसमें हजारों आन्दोलनकारियों ने गिरफ्तारियाँ दी थीं।

वर्ष 1994 के बाद उत्तराखण्ड पृथक् राज्य आन्दोलन

  • उत्तराखण्ड आन्दोलनकारियों ने 25 जनवरी, 1995 को दिल्ली में संविधान बचाओ यात्रा निकाली थी।
  • 21 फरवरी, 1995 को भारतीय प्रधानमन्त्री नरसिम्हा राव को उत्तराखण्ड राज्य की माँग से सम्बन्धित दस हजार पोस्टकार्ड प्रेषित किए गए थे।
  • 3 जून, 1995 को उत्तर प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल मोतीलाल बोहरा द्वारा मुलायम सिंह सरकार को बर्खास्त कर दिया गया तथा मायावती को उत्तर प्रदेश की मुख्यमन्त्री बनाया गया था।
  • श्रीनगर के श्रीयन्त्र टापू पर पुलिस द्वारा 10 नवम्बर, 1995 को आन्दोलनकारियों पर लाठी चार्ज किया गया।
  • राज्य आन्दोलनकारियों ने जनवरी, 1996 में टिहरी के खैंट पर्वत पर अनशन किया था। यह अनशन 32 दिनों तक चला था।
  • उत्तराखण्ड राज्य गठन के समय उत्तर प्रदेश के मुख्यमन्त्री श्री राजनाथ सिंह थे।
  • 27 जुलाई, 2000 को उत्तर प्रदेश पुनर्गठन विधेयक लोकसभा में प्रस्तुत किया गया था।
  • उत्तरांचल विधेयक को लोकसभा में तथा राज्यसभा में क्रमश: 1 अगस्त, 2000 तथा 10 अगस्त, 2000 को पारित किया गया था।
  • राष्ट्रपति के. आर. नारायणन द्वारा इसे 28 अगस्त, 2000 को हस्ताक्षरित किया गया।
  • जॉर्ज कमेटी द्वारा 29 जुलाई को पन्तनगर का दौरा किया गया तथा ऊधमसिंह नगर को प्रस्तावित उत्तराखण्ड राज्य में शामिल करने का निर्णय लिया गया था।
  • 9 नवम्बर, 2000 को 27वें राज्य के रूप में उत्तरांचल राज्य का गठन किया गया।
  • उत्तरांचल (नाम परिवर्तन) विधेयक संसद द्वारा 21 दिसम्बर, 2006 को पारित हुआ था तथा भारत सरकार की अधिसूचना के अनुसार राज्य का नया नाम उत्तराखण्ड 1 जनवरी, 2007 से प्रभावी हो गया।

पृथक् राज्य आन्दोलन में शहीद आन्दोलनकारी

खटीमा काण्ड (1 सितम्बर, 1994)
प्रताप सिंह, धर्मानन्द भट्ट, भगवान सिंह सिरोला, गोपीचन्द, रामपाल, परमजीत सिंह, सलीम अहमद, भुवन सिंह

मसूरी काण्ड (2 सितम्बर, 1994)
हंसा धनाई, बेलमती चौहान, धनपत सिंह, मदन मोहन ममगाईं, बलवीर सिंह नेगी, उमाकान्त त्रिपाठी, जेठू सिंह

मुजफ्फरनगर काण्ड (2 अक्टूबर, 1994)
राजेश लखेड़ा, रवीन्द्र रावत, सतेन्द्र सिंह चौहान, गिरीश कुमार भद्री, सूर्यप्रकाश थपलियाल, अशोक कुमार कौशिक

मुजफ्फरनगर काण्ड (3 अक्टूबर, 1994)
देहरादून राजेश रावत, बलवन्त सिंह जगवाण, दीपक वालिया, जयानन्द बहुगुणा
नैनीताल प्रताप सिंह बिष्ट
कोटद्वार पृथ्वी सिंह बिष्ट, राकेश देवरानी

श्रीयन्त्र टापू (10 नवम्बर, 1995)
राजेश रावत, यशोधर बैंजवाल (श्रीनगर में)

पृथक् राजधानी गैरसैंण की माँग

  • गैरसैंण की समुद्रतल से ऊँचाई लगभग 5360 फीट है। यह गढ़वाल व कुमाऊँ मण्डल के मध्य बिन्दु पर स्थित है।
  • उत्तराखण्ड क्रान्ति दल द्वारा वर्ष 1992 को 14वें अधिवेशन में एक ब्लूप्रिण्ट तैयार करके गैरसैंण को प्रस्तावित राजधानी बनाने की नींव रखी गई तथा उसका नाम चन्द्रनगर रखा गया।
  • प्रस्तावित राज्य की राजधानी गैरसैंण बनाने की सिफारिश कौशिक समिति ने की थी। इस प्रस्ताव को 68% लोगों ने स्वीकार किया।
  • कौशिक समिति ने उत्तराखण्ड में तीन मण्डल बनाने की सिफारिश की थी।
  • उत्तराखण्ड संयुक्त संघर्ष समिति ने अक्टूबर, 2000 को गैरसैंण के लिए देहरादून में खबरदार रैली निकाली थी।
  • अन्तरिम भाजपा सरकार ने 11 जनवरी, 2001 को स्थायी राजधानी चयन आयोग का गठन किया था।
  • इस प्रस्ताव को पुनर्निर्वाचित सरकार ने नवम्बर, 2002 को पुनर्जीवित कर दिया।

दीक्षित आयोग
  • वीरेन्द्र दीक्षित 1 फरवरी, 2003 को राजधानी चयन आयोग के अध्यक्ष बनें तथा इन्होंने 17 अगस्त, 2008 को अपनी रिपोर्ट मुख्यमन्त्री को सौंप दी थी। इस आयोग ने स्थायी राजधानी के लिए 5 शहरों-देहरादून, काशीपुर, रामनगर, ऋषिकेश एवं गैरसैंण का चयन किया था।
  • इस समिति ने गैरसैंण को उत्तराखण्ड की स्थायी राजधानी के रूप में अस्वीकार कर दिया था।
राजधानी की स्थापना के लिए बाबा मोहन उत्तराखण्डी ने 38 दिनों तक आमरण अनशन किया। इसी के कारण 8 अगस्त, 2004 को बेनीताल में ये शहीद हो गए।
पूर्व मुख्यमन्त्री भगतसिंह कोश्यारी ने अपनी पुस्तक उत्तरांचल प्रदेश क्यों में गैरसैंण को राजधानी बनाने के लिए उपयुक्त माना था।
3 नवम्बर, 2012 को तत्कालीन मुख्यमन्त्री विजय बहुगुणा ने गैरसैंण में मन्त्रिपरिषद् की बैठक आयोजित की और विधानसभा भवन बनाने का निर्णय लिया।
भराड़ीसैंण में 14 जनवरी, 2013 को द्वितीय विधानसभा भवन का शिलान्यास किया गया। 9 नवम्बर, 2013 को गैरसैंण के भराड़ीसैंण में द्वितीय विधानसभा भवन के लिए भूमि पूजन का कार्य पूर्ण हो गया।
9-11 जून, 2014 को गैरसैंण में पहला विधानसभा सत्र आयोजित हुआ तथा 2-6 नवम्बर, 2015 को दूसरा सत्र (शीतकालीन) का आयोजन हुआ।
नवनिर्मित विधानसभा भवन भराड़ीसैंण में पहला विधानसभा सत्र नवम्बर, 2016 में आयोजित किया गया था। यह गैरसैंण का तीसरा सत्र था।
4 मार्च, 2020 को तत्कालीन मुख्यमन्त्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाने की घोषणा की थी।
8 जून, 2020 को गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाने की अधिसूचना जारी हुई तथा 15 अगस्त, 2020 को गैरसैंण में झण्डा रोहण किया गया।
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Kartik Budholiya

Kartik Budholiya

उत्तराखंड की ऐतिहासिक विरासत, भूगोल, नदी प्रणालियों और सामान्य ज्ञान के विशेषज्ञ Kartik Budholiya छात्रों को UKPSC, UKSSSC, Uttarakhand Police, Patwari, Forest Guard और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता दिलाने के लिए निरंतर शोध-परक कंटेंट साझा करते हैं।