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चन्द वंश का उदय | chand vansh ka uday

चन्द वंश का उदय | chand vansh ka uday

चन्द वंश का उदय

उत्तराखण्ड के गौरवशाली इतिहास को गहराई से समझना हर प्रतियोगी छात्र के लिए बेहद जरूरी है। इस लेख में हम कुमाऊँ के 'चन्द वंश' के उदय, उसके प्रतापी शासकों और उनके ऐतिहासिक कार्यों पर विस्तार से चर्चा करेंगे। यह महत्वपूर्ण विषय UKPSC, UKSSSC, उत्तराखण्ड पुलिस, पटवारी, फॉरेस्ट गार्ड जैसी सभी राज्य स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अत्यंत उपयोगी है।

इस लेख में आप क्या-क्या पढ़ेंगे:
  • चन्द वंश की स्थापना और प्रमुख शासक: सोमचन्द द्वारा राजबुंगा किले के निर्माण से लेकर गरुड़ ज्ञानचन्द, रुद्रचन्द, और अन्तिम राजा महेन्द्रचन्द तक का सम्पूर्ण ऐतिहासिक सफर।
  • प्रमुख युद्ध और कूटनीतिक संबंध: डोटी का 12 वर्षीय युद्ध, रूहेला आक्रमण, और मुगलों व गढ़वाल नरेशों के साथ चन्द राजाओं के ऐतिहासिक एवं राजनैतिक संबंध।
  • प्रशासनिक व कर व्यवस्था के रोचक तथ्य: कुमाऊँ में पंचायती राज (स्थानीय स्वशासन) की शुरुआत, प्रमुख सेनापतियों का योगदान और चन्दकालीन शासन की महत्वपूर्ण नीतियां।
  • कत्यूरी वंश का पतन और 52 गढ़: कत्यूरी साम्राज्य के पतन के बाद अस्तित्व में आए गढ़वाल के 52 प्रमुख गढ़ों (जैसे- चाँदपुर गढ़, देवलगढ़, आदि) की परीक्षापयोगी जानकारी।

चन्द वंश

  • चन्दों का मूल स्थान - झूसी (प्रयाग)
  • चन्द शासकों की वंशावली - मानोदय काव्य में
  • चन्द व बम शासकों के मध्य सम्बन्धों की जानकारी - मझेड़ा ताम्रपत्र से
  • चन्द शासकों के करों से सम्बन्धित जानकारी - मूनाकोट ताम्रपत्र
चन्द वंश के इतिहास की जानकारी बालेश्वर मन्दिर में क्राचल्लदेव का लेख, बास्ते ताम्रपात्र व गोपेश्वर त्रिशूल लेख से प्राप्त होती है।
बास्ते ताम्रपत्र से माण्डलिक राजाओं की सूची सम्बन्धी जानकारी मिलती है।
चम्पावत में चम्पावती नदी के तट पर चन्दों की प्रारम्भिक राजधानी निकटवर्ती क्षेत्रों तक ही सीमित थी। बाद में यहाँ से राजधानी को अल्मोड़ा में स्थानान्तरित कर दिया गया था।

चन्द वंश के प्रमुख शासकों का वर्णन निम्न प्रकार है-

सोमचन्द

  • चन्द वंश की स्थापना - 1025 ई. के आस-पास
  • राजधानी - चम्पावत
सोमचन्द के द्वारा नियुक्त चार किलेदार (चाराल)- कार्की, बोरा, तड़ागी एवं चौधरी
सोमचन्द ने पहली विजय दोनकोट (दोणकोट) के रावत राजा के विरुद्ध थी।
सोमचन्द का प्रमुख सेनापति कालू तड़ागी था।
सोमचन्द ने चम्पावत में राजबुंगा किले का निर्माण कर स्वयं को माण्डलिक राजा के रूप में स्थापित किया।
कुमाऊँ में पंचायती राज व्यवस्था (स्थानीय स्वशासन) प्रारम्भ करने का श्रेय सोमचन्द को जाता है। सोमचन्द ने सर्वप्रथम ग्राम स्तर पर बूढ़ा व सयानों की नियुक्तियाँ की थीं।

आत्मचन्द व उसके उत्तराधिकारी

• सोमचन्द का उत्तराधिकारी आत्मचन्द (20 वर्षों तक शासन)
• आत्मचन्द का उत्तराधिकारी पूर्णचन्द (1066 से 1084 ई. तक शासन)
• पूर्ण चन्द का उत्तराधिकारी इन्द्रचन्द
• नेपाल मार्ग से चीन के साथ व्यापारिक सम्बन्धों की स्थापना इन्द्रचन्द ने
• रेशम उत्पादन व रेशमी वस्त्रों के बनाने का कार्य प्रारम्भ इन्द्रचन्द ने (एटकिंसन के अनुसार)
• इन्द्रचन्द का उत्तराधिकारी संसारचन्द
• वीरचन्द का उत्तराधिकारी नरचन्द 1236 ई. में
  • चन्द शासक वीणाचन्द खस राजाओं से पराजित हुआ था।
  • चन्द शासक वीरचन्द (अशोकचल्ल के समकालीन) ने खस राजाओं को युद्ध में पराजित कर पुनः राज्य पर अधिकार कर लिया। इसकी मृत्यु 1206 ई. में हुई थी।

थोहरचन्द व उसके उत्तराधिकारी

  • कुमाऊँ का प्रथम स्वतन्त्र शासक थोहरचन्द था।
  • थोहरचन्द के उत्तराधिकारी कल्याणचन्द प्रथम (1275-96), त्रिलोकचन्द (1296-1303) व अभयचन्द थे।
  • फ्रांसिस हैमिल्टन ने अपनी पुस्तक किंगडम ऑफ नेपाल (1881 ई.) में लिखा है कि थोहरचन्द ने झूँसी से आकर नेपाल राजा के यहाँ नौकरी की थी।
  • रिपोर्ट ऑन कुमाऊँ एण्ड गढ़वाल (1813 ई.) के लेखक डब्ल्यू. फ्रेजर हर्षदेव जोशी के विवरणों के आधार पर चन्द वंश का संस्थापक थोहरचन्द को मानते हैं।
  • चम्पावत के मानेश्वर नौले से प्राप्त 1360 ई. का अभिलेख अभयचन्द का प्राचीनतम अभिलेख है।

गरुड़ ज्ञानचन्द

29वाँ चन्द शासक गरुड़ ज्ञानचन्द (1374 से 1419 ई. तक लगभग 55 वर्षों तक शासन)
दिल्ली सुल्तान फिरोजशाह तुगलक के दरबार में भेंट लेकर जाने वाला प्रथम चन्द शासक ज्ञानचन्द
ज्ञानचन्द को गरुड़ की उपाधि प्रदान करने वाला मुहम्मद बिन तुगलक
गरुड़ ज्ञानचन्द के उत्तराधिकारी हरिहरचन्द व ध्यानचन्द
  • 1378 ई. के ताम्रपत्र से ज्ञानचन्द द्वारा चन्द शासक अभयचन्द के वार्षिक श्राद्ध पर भूमि दान देने का उल्लेख मिलता है। - पटवारी परीक्षा 2023
  • 1418 ई. में ज्ञानचन्द द्वारा देवराज तिवाड़ी को एक ग्राम की भिक्षा दान देने की जानकारी गोबासा ताम्रपत्र से प्राप्त होती है। - पटवारी परीक्षा 2023

उद्यानचन्द व विक्रमचन्द

  • ज्ञानचन्द ने नीलू कठायत की धोखे से हत्या कर दी थी। इस अनैतिक कार्य से उद्यानचन्द को आत्मग्लानि महसूस हुई एवं पश्चातापस्वरूप उसने कई मन्दिरों एवं नौलाओं (पानी की बावड़ी) का निर्माण करवाया।
  • 1423 ई. के बालेश्वर ताम्रपत्र का सम्बन्ध विक्रमचन्द से है।

भारतीचन्द

  • 35वाँ चन्द शासक - भारतीचन्द
  • शासनकाल - 1437 से 1450 ई.
कुमाऊँ इतिहास में भारतीचन्द के पवाड़े अत्यधिक प्रसिद्ध हैं।
अपने पुत्र रत्नचन्द की सहायता से भारतीचन्द ने सोर (पिथौरागढ़), सीरा, थल आदि क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया था।
भारतीचन्द के दूसरे पुत्र सुजान कुंवर का वर्णन खेतीखान ताम्रपत्र में मिलता है।

डोटी का युद्ध
1437 ई. में भारतीचन्द के राजा बनने के समय डोटी का राजा ही काली कुमाऊँ का महाराजा माना जाता था, साथ में चन्द राजा उसे कर देते थे।
भारतीचन्द के कर न देने के साथ ही डोटी के महाराजा नागमल्ल ने उसके विरुद्ध युद्ध घोषित कर दिया। माना जाता है कि यह युद्ध 12 वर्षों तक चला था।
भारतीचन्द ने कटेहर के राजा तथा सोनकोट के वीर मैद सैन की सहायता से नागमल्ल को पराजित कर दिया।

रत्नचन्द

  • पिता - भारतीचन्द
  • शासनकाल - 1450-1488 ई.
  • रत्नचन्द के शासनकाल में डोटी में नागमल्ल ने विद्रोह किया था।

कीर्तिचन्द

  • पिता - रत्नचन्द
  • शासनकाल - 1488 से 1503 ई.
  • कीर्तिचन्द के उत्तराधिकारी - प्रतापचन्द, ताराचन्द, माणिकचन्द एवं भीष्मचन्द
  • गढ़वाल शासक अजयपाल को पराजित करने वाला शासक कीर्तिचन्द (1500 ई. में) था।

भीष्मचन्द

  • शासनकाल - 1555 से 1560 ई.
  • भीष्मचन्द ने अल्मोड़ा के पूर्व में स्थित खगमरा किले का निर्माण कराया व आलमनगर की स्थापना की। - लेखपाल 2023
  • भीष्मचन्द ने कल्याणचन्द को गोद लिया था, जो ताराचन्द का पुत्र था।
  • भीष्मचन्द की हत्या गजुवा (गजुवाठिंगा) नामक खसिया मुखिया ने की थी।

बालो कल्याणचन्द

  • पिता - ताराचन्द
  • शासनकाल - 1560 से 1568 ई.
  • उपाधि - महाराजाधिराज
  • कल्याणचन्द ने मणकोट राज्य को विजित कर चन्द राज्य में मिलाया था।
  • इसके समय में राजधानी अल्मोड़ा का निर्माण पूर्ण हुआ व अल्मोड़ा स्थित राजधानी को राजापुर कहा गया।
  • बालो कल्याणचन्द ने स्थानीय स्वशासन (पंचायत व्यवस्था) को लागू किया था।
  • कल्याणचन्द ने अल्मोड़ा में लालमण्डी किले व नेलापोखर किले का निर्माण करवाया था।

रुद्रचन्द

  • 45वाँ चन्द शासक - रुद्रचन्द
  • शासनकाल - 1568 से 1597 ई.
  • स्वतन्त्र शासक - 1568 से 1587 ई.
  • मुगलों के अधीन शासन - 1587 ई. से 1597 ई.
  • समकालीन मुगल सम्राट - अकबर
रुद्रचन्द को मुगल सम्राट अकबर से चौरासी माल परगना (तराई-भावर) प्राप्त हुआ और रुद्रचन्द को तब से जमींदार कहकर सम्बोधित किया जाने लगा।
अकबरनामा के अनुसार, 1588 ई. में रुद्रचन्द की अकबर से लाहौर में भेंट हुई थी।
अबुल फजल की प्रसिद्ध रचना आइन-ए-अकबरी में कुमाऊँ राज्य को दिल्ली सूबे के अन्तर्गत दिखाया गया है।
रुद्रचन्द ने तराई क्षेत्र में रुद्रपुर नगर की एवं अल्मोड़ा में मल्ला महल की स्थापना की थी, साथ ही महल के अन्दर रामशिला मन्दिर का निर्माण करवाया था।
ओले पड़ने पर सतर्क करने का कार्य ओली ब्राह्मणों के वर्ग का था। ओली ब्राह्मणों के लिए गाँव में अनाज के रूप में दस्तूर (भू-राजस्व) निर्धारित किए गए थे। - कनिष्ठ सहायक 2023

पुरुषोत्तम पन्त
  • यह रुद्रचन्द का सेनापति था व इसका उपनाम पुरखू पन्त था। यह मूल रूप से पिथौरागढ़ का निवासी था।
  • इसे कुमाऊँ इतिहास का रॉबर्ट ब्रुश भी कहा जाता है।
  • पुरुषोत्तम पन्त ने सीरागढ़ से हरिमल्ल को भगाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
  • पुरुषोत्तम पन्त 1581 ई. में ग्वालदम के युद्ध या बधाण युद्ध में पड़यार राजपूतों के द्वारा मारे गए थे।

रुद्रचन्द के काल में रचित 4 संस्कृत ग्रन्थों की रचना हुई, जो निम्न हैं -
  1. त्रैवर्णिक धर्म-निर्णय
  2. ऊषारागोदया
  3. ययातिचरित्रम्
  4. श्यैनिक शास्त्र (पक्षी आखेट पर आधारित)

लक्ष्मीचन्द

  • पिता - रुद्रचन्द
  • शासनकाल - 1597-1621 ई.
  • उपनाम - लखुली बिराली (छिपने वाली बिल्ली)

लक्ष्मीचन्द के निम्न उत्तराधिकारी थे-
  • दलीपचन्द (1621 से 1624 ई.)
  • विजयचन्द (1624-25) (अनूपशहर आधुनिक बुलन्दशहर के बड़गुजर की पुत्री से विवाह)
  • त्रिमलचन्द (1625 से 1638 ई.)
लक्ष्मीचन्द का नाम मानोदय काव्य में लक्ष्मण तथा मूनाकोट ताम्रपत्र में लछिमन मिलता है।
इसने गढ़वाल पर सात बार असफल आक्रमण किया।
लक्ष्मीचन्द को जहाँगीरनामा में सबसे धनी शासक बताया गया है। इसने नरसिंह बाड़ी, कबीना तथा लक्ष्मीश्वर जैसे बड़े-बड़े बाग-बगीचों का निर्माण करवाया था।
1602 ई. में लक्ष्मीचन्द ने बागेश्वर के बागनाथ मन्दिर का जीर्णोद्धार कराया था।
  • जन्म से नेत्रहीन होने के कारण शक्ति गुसाईं को कुमाऊँ का धृतराष्ट्र कहा जाता है।
  • शक्ति गुसाईं चन्द, शासक लक्ष्मीचन्द का ज्येष्ठ भ्राता था।
  • शक्ति गुसाईं ने राजधानी में बन्दोबस्ती कार्यालय की स्थापना भी की थी।

बाजबहादुर चन्द

  • 50वाँ चन्द शासक - बाजबहादुर चन्द
  • शासनकाल - 1638 से 1678 ई.
  • पिता - नीलू गुसाईं
यह एकमात्र चन्द शासक था, जो चरवाहे से राजा के पद तक पहुँचा था।
  • शाहजहाँ ने इसे बहादुर व जमींदार की उपाधि प्रदान की। - पटवारी लेखपाल 2023
तराई क्षेत्र में बाजपुर नगर की स्थापना बाजबहादुर चन्द द्वारा की गई थी।
पंवार राज्य पर बाजबहादुर चन्द की विजय के प्रतीक के रूप में गढ़वाल से नन्दादेवी की मूर्ति लाकर अल्मोड़ा किले में स्थापित की गई थी।
मनीलागढ़ कत्यूरी राजकुमारों का गढ़ था, जिस पर बाजबहादुर चन्द ने आक्रमण किया, जिसके परिणामस्वरूप कत्यूरी कुंवरों द्वारा गढ़वाल के पूर्वी भाग में लूट-पाट की गई।
कत्यूरी कुंवरों को भगाने के लिए तीलू रौतेली ने भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
  • इसने 'पट्टी' नामक प्रशासनिक इकाई की स्थापना की। - पटवारी लेखपाल 2023
बाजबहादुर ने घोड़ाखाल में गोलू देवता का मन्दिर एवं हरिया डुंगरी में शिव मन्दिर का निर्माण कराया।
न्यूयॉर्क संग्रहालय में बाजबहादुर का एक चित्र संग्रहीत है।
1678 ई. में बाजबहादुर चन्द की मृत्यु हो गई।

उद्योतचन्द

  • शासनकाल - 1678 से 1698 ई.
  • पहला सेनापति - हिरू देउबा
  • दूसरा सेनापति - शिरोमणि जोशी (सोर के नेगी)
उद्योतचन्द धाईमाता नामक बीमारी से ग्रसित था व इसके राजवैद्य का नाम वरदेव जोशी था।
1678 ई. में उद्योतचन्द ने बधाणगढ़ का किला विजित किया था। इस युद्ध में चन्द सेनापति मैसी साहू वीरगति को प्राप्त हुआ।
मेदनीशाह के दूनागिरी एवं द्वाराहाट आक्रमण के समय उद्योतचन्द शासक था। गढ़वाल के राजकुमार मेदनीशाह को मुगल दरबार में मनसबदार नियुक्त किया गया था। - UK PSC 2024
प्रमुख निर्माण कार्य तल्ला व रंग महल, दशै का द्वाजा, त्रिपुरा सुन्दरी मन्दिर (अल्मोड़ा), पार्वतीश्वर मन्दिर (अल्मोड़ा)

ज्ञानचन्द द्वितीय

  • शासनकाल - 1698 से 1708 ई.
  • प्रमुख निर्माण कार्य - बद्रीनाथ मन्दिर
ज्ञानचन्द द्वितीय ने अल्मोड़ा के नन्दादेवी मन्दिर में बधाणगढ़ से प्राप्त नन्दादेवी की स्वर्ण प्रतिमा स्थापित कराई।
1703 ई. में ज्ञानचन्द द्वितीय व फतेहशाह के मध्य दुधौली का युद्ध हुआ था।
ज्ञानचन्द ने अपने पिता उद्योतचन्द की पराजय का बदला लेने के लिए 1704 ई. में डोटी अभियान किया था।

जगतचन्द

  • शासनकाल - 1708 से 1720 ई.
  • जगतचन्द का शासनकाल - कुमाऊँ का स्वर्णकाल
  • जगतचन्द के काल में सीरा का सीकदार - शत्रुपाल भण्डारी
फतेहशाह ने जगतचन्द के समय में कत्यूरी घाटी में आक्रमण किया था।
इस आक्रमण के दौरान बैजनाथ घाटी को लूटकर गरसार ग्राम बद्रीनाथ मन्दिर को भेंट कर दिया था।
1720 ई. में चेचक नामक बीमारी से ग्रसित होने के कारण जगतचन्द की मृत्यु हो गई।

देवीचन्द

  • शासनकाल - 1729-1747 ई. (बद्रीदत्त पाण्डे के अनुसार), 1730-48 ई. (डबराल के अनुसार)
  • उपनाम - कुमाऊँ का विक्रमादित्य, कुमाऊँ का मुहम्मद-बिन-तुगलक
देवीचन्द का सेनापति रूहेला सरदार दाऊद खान
देवीचन्द ने श्रीनगर को जीतने का असफल प्रयास किया था। उसने अन्त में एक पहाड़ी को विजित कर उसका नाम फतेहपुर रखा था।
देवीचन्द के उत्तराधिकारी - अजीतचन्द, कल्याणचन्द, दीपचन्द, मोहनचन्द, प्रद्युम्नचन्द, शिवचन्द एवं महेन्द्रचन्द (अन्तिम राजा)।

कल्याणचन्द चतुर्थ

  • शासनकाल - 1729 से 1747 ई. (बद्रीदत्त पाण्डे के अनुसार), 1730 से 1748 ई. (डथराल के अनुसार)
  • कुमाऊँ पर रूहेलों के आक्रमण (1743-1745 ई.) के समय कल्याणचन्द चतुर्थ शासक था।
  • कटेहर के सरदार अली मुहम्मद खाँ ने 1743-44 ई. में कुमाऊँ पर आक्रमण किया था।
  • मुगल बादशाह रंगीला को बहुमूल्य पहाड़ी वस्तुएँ भेंट देने के लिए कल्याणचन्द चतुर्थ ने जागेश्वर मन्दिर से ऋण लिया था।
  • मुगल वजीर कमरूद्दीन ने कल्याणचन्द चतुर्थ को काशीपुर में गार्ड ऑफ ऑनर दिया था।
  • कल्याणचन्द अपनी राजधानी को राजबुंगा बुलाता था तथा इसने अल्मोड़ा में चौमहला महल का निर्माण करवाया था।
  • 16 गाँवों के सयाने लछी गुसाई मनराल को कल्याणचन्द ने सयानाचारी सौंपी थी।
  • कवि शिव कल्याण चन्द के राजकवि थे। इनकी प्रसिद्ध रचना कल्याणचन्द्रोदयम है।
  • बलिराम चौधरी कल्याणचन्द चतुर्थ के काल का प्रसिद्ध लेखक था।

शिवदेव जोशी : कुमाऊँ का कौटिल्य
  • यह कल्याणचन्द चतुर्थ का सेनापति था।
  • इतिहासकार नित्यानन्द मिश्र ने इसे कुमाऊँ का शिवाजी कहकर सम्बोधित किया था।
  • इन्होंने रूहेला आक्रमण का वीरता के साथ सामना किया, जिसके कारण सम्मानस्वरूप उसे तराई-भाबर का प्रबन्धन दिया गया।
  • इनको बख्शी की उपाधि कल्याणचन्द चतुर्थ ने प्रदान की थी।
  • इनको कल्याणचन्द चतुर्थ के अल्पवयस्क पुत्र दीपचन्द का संरक्षक नियुक्त किए जाने के कारण कुमाऊँ का बैरम खाँ कहा जाता है।

कल्याणचन्द चतुर्थ के बाद अन्य चन्द शासक

दीपचन्द (1748-77)
दीपचन्द ने मुगल बादशाह के कहने पर पानीपत के तीसरे युद्ध (1761 ई.) में मराठों के विरुद्ध सैन्य टुकड़ी भेजी थी।
तामाढौंड का युद्ध शिवदेव जोशी व गढ़ सेनापति नरपति गुलेरिया के मध्य 1755 ई. में हुआ।
शिवदेव जोशी की मृत्यु के उपरान्त हर्षदेव जोशी को बख्शी के पद पर दीपचन्द ने नियुक्त किया था।
हर्षदेव मोहनचन्द की कैद से भाग निकला और गढ़वाल के शासक ललितशाह को कुमाऊँ पर आक्रमण हेतु आमन्त्रित किया, जिसके परिणामस्वरूप 1779 ई. में ललितशाह व मोहनचन्द की सेनाओं के मध्य बग्वाली पोखर का युद्ध हुआ, जिसमें पराजय के कारण मोहनचन्द लखनऊ भाग गया।
ललितशाह ने अपने पुत्र प्रद्युम्न शाह को कुमाऊँ की गद्दी पर बैठाया और प्रधानमन्त्री के रूप में हर्षदेव जोशी को नियुक्त किया।

प्रद्युम्न शाह (1779-86)
प्रद्युम्न शाह ने स्वयं को दीपचन्द का दत्तक पुत्र घोषित किया।
प्रद्युम्न शाह जयकीर्तिशाह की मृत्यु होने के बाद श्रीनगर वापस आया था। इस समय गढ़वाल एवं कुमाऊँ दोनों प्रद्युम्न शाह के अधीन थे तथा हर्षदेव प्रद्युम्न शाह के प्रतिनिधि के रूप में कुमाऊँ पर शासन कर रहा था।

मोहनचन्द (1786-88)
कुमाऊँ के सिंहासन को खाली देखकर मोहनचन्द ने पुनः सिंहासन पर अधिकार कर लिया और इस प्रकार वह दूसरी बार कुमाऊँ का राजा बना।
हर्षदेव जोशी व मोहनचन्द के मध्य 1786 ई. पालीगाँव का युद्ध हुआ।
इस युद्ध में मोहनचन्द की पराजय हुई। युद्ध में विजय के पश्चात् हर्षदेव जोशी ने शिवचन्द को शासक बनाया।

शिवचन्द
शिवचन्द 61वाँ चन्द शासक था। इसे मिट्टी का महादेव कहकर सम्बोधित किया जाता था।
शिवचन्द के समय में मोहनचन्द के भाई लालसिंह ने सिंहासन पर अधिकार कर लिया था। लालसिंह को सिंहासन हथियाने में रामपुर के नवाब ने सहायता की थी।
ब्रिटिश काल में चन्द राज्य को दो शाखाओं अल्मोड़ा व काशीपुर में विभाजित कर दिया गया।
महेन्द्रचन्द के पुत्र प्रतापचन्द को अंग्रेजों ने जागीर के रूप में कुछ गाँव प्रदान किए थे।
लालसिंह के पुत्र गुमान सिंह ने काशीपुर शाखा की बागडोर सम्भाली थी। कवि गुमानी पन्त गुमान सिंह का दरबारी कवि था।

हर्षदेव जोशी
हर्षदेव जोशी का अन्य नाम हरकदेव जोशी था। इसे कुमाऊँ का किंगमेकर भी कहते हैं। इसने लगभग 8 राजाओं को कुमाऊँ की गद्दी पर बैठाया था।
राहुल सांकृत्यायन ने इसे विभीषण की संज्ञा दी है।
डब्ल्यू फ्रेजर व कैप्टन हैर्से ने हर्षदेव जोशी को कुमाऊँ का अर्लवारिक कहा है।

कुमाऊँ व नेपाल क्षेत्र
किराती व राई राजा कहलाने वाले किरातों ने कुमाऊँ व नेपाल में साथ-साथ शासन किया था।
कुमाऊँ का प्रसिद्ध हिलजात्रा उत्सव नेपाल में प्रचलित उत्सव इन्द्रजात्रा की देन माना जाता है। हिलजात्रा का प्रारम्भ टिहरी नरेश द्वारा किया गया है। - कनिष्ठ सहायक 2023

चन्दकालीन कर व्यवस्था

कर विवरण
कूत नकद के बदले दिया जाने वाला अनाज होता था।
ज्युलिया नदी पुलों पर लगने वाला कर, इसे सांगा भी कहा जाता था।
सिरती यह एक प्रकार का कर था, जिसमें नकद के बदले अनाज लिया जाता था। यह सामान्यतः माल भाबर व भोटिया व्यापारियों से वसूला जाता था। पटवारी लेखपाल 2023
टांड कर सूती वस्त्रों के बुनकरों से लिया जाने वाला कर
चौपदार यह राजा की निजी वस्तुओं; जैसे- तलवार, ढाल आदि ढोने वालों के लिए वसूला जाने वाला कर था।
राखिया रक्षाबन्धन व जनेऊ-संस्कार के समय वसूला जाने वाला कर
जगरिया कर यह कर जागर लगाने वाले ब्राह्मणों से वसूला जाता था।
स्यूक कर राजा के सेवकों के लिए वसूला जाने वाला कर
खेनी-कपीलीनी कुली बेगार कर
कुकुरयालो राजा के कुत्तों के लिए देय कर
बाजदार महाजनों को दिया जाने वाला कर
रंतगली मूनाकोट ताम्रपत्र के अनुसार लेखक को दिया जाने वाला कर
सीकदार नेगी परगना के अधिकारी को देय कर। यह पूरे गाँव से लिया जाता था। मूनाकोट ताम्रपत्र में इसके लिए 2 रुपये कर सुनिश्चित किया गया था।
मिझारी कामगारों द्वारा दिया जाने वाला कर
हिलयानी-अधूल कर सिंगाली ताम्रपत्र में इस कर का वर्णन मिलता है। यह वर्षा ऋतु में सड़कों व मार्गों की मरम्मत हेतु वसूला जाता था।
कमीनचारी-सयानचारी/कमीण सयाना या बूढ़ा जो किसानों से लगान वसूलता था, को दिया जाने वाला कर। कनिष्ठ सहायक 2023

कत्यूरी वंश का पतन और गढ़वाल के 52 गढ़

कत्यूरी वंश के पतन के बाद कत्यूरी वंश के वंशजों ने राज्य में अनेक स्थानों पर अपने-अपने स्वतन्त्र राज्यों की स्थापना कर ली। इसी समय पश्चिमी उत्तराखण्ड में भी कत्यूरी राज्य अनेक छोटे-छोटे राज्यों में विभक्त हो गया तथा ये छोटे राज्य गढ़ कहलाने लगे। इनके शासक को भड़ या गढ़पति कहा जाता था।
इन गढ़ों की संख्या 52 थी एवं इनमें एकता का अभाव था। 52 गढ़ों में से प्रमुख गढ़ निम्न प्रकार हैं-

गढ़वाल के प्रमुख गढ़

चाँदपुर गढ़ यह पंवार राजाओं की प्रथम राजधानी थी, जो चमोली के आदि बद्री के आस-पास के क्षेत्र में पड़ता था। इसके अन्तिम गढ़पति भानुप्रताप या सोनपाल थे।
नागपुर गढ़ यह जौनपुर परगने में था तथा यहाँ का अन्तिम गढ़पति भजन सिंह था।
कोल्ली गढ़ यह बंछवाण बिष्ट जाति के लोगों का गढ़ था।
रवाण गढ़ यह बद्रीनाथ के मार्ग रवाणी जाति का गढ़ था। रवाण जाति की बहुलता के कारण इसका नाम रवाणगढ़ पड़ा।
फल्याण गढ़ यह फाल्दकोट में फल्याण जाति के ब्राह्मणों का गढ़ था। यह गढ़ पहले किसी राजपूत जाति का था, जिसके शमशेर सिंह नामक व्यक्ति ने इसे ब्राह्मणों को दान कर दिया था।
बांगर गढ़ यह खसिया जाति की नागवंशी राणा जाति का गढ़ था।
कुईली गढ़ यह टिहरी गढ़वाल में सजवाण जाति का गढ़ था, जिसे जौरासी गढ़ भी कहते थे।
भरपुर गढ़ यह सजवाण जाति का गढ़ था तथा यहाँ के अन्तिम गढ़पति गोविन्द सिंह सजवाण थे।
कुंजणी गढ़ यह सजवाण जाति से जुड़ा हुआ गढ़ था, इसका अन्तिम गढ़पति सुल्तान सिंह था।
मुंगरा गढ़ यह रंवाई क्षेत्र में रावत जाति का गढ़ था। ऐसा माना जाता है कि यहाँ अब रौतेला रहते हैं।
रैका गढ़ यह रमोला जाति का गढ़ था। इसका अन्तिम गढ़पति रमोला जयचन्द था।
मोल्या गढ़ यह गढ़ भी रमोला जाति से सम्बन्धित था।
उप्पू गढ़ (उपुगढ़) यह गढ़ चौहान जाति से सम्बन्धित था। कफ्फू चौहान इसके गढ़पति थे। यह गढ़ टिहरी-उत्तरकाशी मार्ग पर उदयपुर परगने में स्थित था।
नाला गढ़ यह देहरादून जिले में स्थित था।
सांकरी गढ़ यह गढ़ राणा जाति से सम्बन्धित था। यह रंवाई में स्थित था।
राणी गढ़ इसकी स्थापना एक रानी ने की थी, इसलिए इस गढ़ को राणी गढ़ कहा जाने लगा।
बधाण गढ़ बधाणी जाति का यह गढ़ पिण्डर नदी के ऊपरी क्षेत्र में गढ़वाल व कुमाऊँ का विभाजक था।
लोहवा गढ़ इस गढ़ का सम्बन्ध लोहबाल नेगी जाति से था। प्रमोद सिंह इस गढ़ का वीर और साहसी गढ़पति था। यह गढ़ चमोली जिले में था।
दशोली गढ़ दशोली स्थित इस गढ़ को मानवर नामक राजा ने प्रसिद्धि दिलाई थी। यह चमोली के दशोली क्षेत्र में था।
कण्डारा गढ़ कण्डारी जाति का यह गढ़ उस समय के नागपुर परगने में था, इस गढ़ का अन्तिम राजा नरवीर सिंह था।
धौना गढ़ यह इडवालस्यू पट्टी में स्थित धौन्याल जाति का गढ़ था।
रतन गढ़ यह कुंजणी में धमादा जाति का गढ़ था।
एरासू गढ़ यह श्रीनगर के ऊपर स्थित था।
इडिया गढ़ यह गढ़ रंवाई बड़कोट में स्थित था। रूपचन्द नामक सरदार ने इसे नष्ट कर दिया था।
लंगूर गढ़ लंगूरपट्टी स्थित इस गढ़ में भैरव देवता का प्रसिद्ध मन्दिर स्थित था।
गढ़कोट गढ़ यह गढ़ बगड़वाल बिष्ट जाति से सम्बन्धित था।
गडतांग गढ़ भोटिया जाति का यह गढ़ टकनौर, उत्तरकाशी में स्थित था।
वनगढ़ यह अलकनन्दा नदी के दक्षिण में स्थित था।
भरदार गढ़ यह वनगढ़ के नजदीक स्थित था।
चाँदकोट गढ़ यह पौड़ी जिले के प्रसिद्ध गढ़ों में से एक था। यहाँ के लोगों को उनकी बुद्धिमत्ता व चतुराई के लिए जाना जाता था। इसे गुराड़गढ़ भी कहते हैं। यह चाँदकोट परगने में चाँदपुर पर्वत श्रृंखला पर स्थित है। इस क्षेत्र में स्थित एकेश्वर देवता का मन्दिर प्रसिद्ध है।
नयाल गढ़ देवलगढ़ के समीप नयाल जाति का गढ़ था। इसका अन्तिम सरदार भग्गु था।
काण्डा गढ़ पौड़ी जिले की नयार घाटी में स्थित है।
मनीला गढ़ दूधातोली पर्वत श्रृंखलाओं में स्थित था। यह कत्यूरियों से सम्बन्धित था तथा बाजबहादुर चन्द ने इस गढ़ पर आक्रमण किया था।
गुजडू गढ़ पौड़ी जिले के गुजडू परगने के मल्ला सलाण क्षेत्र में स्थित था। यह गुर्जर-प्रतिहार राजपूतों से सम्बन्धित था।
उल्खा गढ़ इसे काठूली गढ़ भी कहा जाता था। यह पौड़ी जिले के खिर्सू मार्ग पर स्थित था।
तारागढ़ पौड़ी के राठ क्षेत्र में स्थित था।
देवलगढ़ पौड़ी गढ़वाल में श्रीनगर के पास स्थित था। 1512 ई. में अजयपाल ने चाँदपुर गढ़ से अपनी राजधानी यहाँ स्थानान्तरित की थी।
भैरों गढ़ पौड़ी जिले के लैंसडाउन के निकट स्थित था।
मौल्या गढ़ यह टिहरी के सेम-मुखेम क्षेत्र में था। यह गंगू रमोला व उसके पुत्रों सिद्धवा व विद्धवा का गढ़ था।
धमोडू गढ़ यह टिहरी गढ़वाल में स्थित राणा जाति का गढ़ था।
कोटा गढ़ यह टिहरी जौनपुर के इडालस्यू में स्थित था।
लखनपुर गढ़ यह अल्मोड़ा क्षेत्र में स्थित है, इसका नाम कत्यूरी वंश के शासक लखनपाल देव के नाम पर पड़ा।
जौंट गढ़ यह गढ़ जौनपुर परगने में स्थित था।
लोदन गढ़ यह देवलगढ़ के पास स्थित था।

जिलेवार प्रमुख गढ़

  • चमोली जिले में स्थित गढ़ चाँदपुर गढ़, लोहाब गढ़, नागपुर गढ़, कण्डार गढ़, बधाण गढ़, मनीला गढ़, दशोली गढ़
  • पौड़ी जिले में स्थित गढ़ देवलगढ़, नयाल गढ़, भैरों गढ़, काण्डा गढ़, गुराड़ गढ़, गुजडू गढ़, उल्खा गढ़, तारागढ़
  • टिहरी गढ़वाल जिले में स्थित गढ़ धत्यूड़ गढ़, उप्पू गढ़, मौल्या गढ़, धमोड़ू गढ़, कोटा गढ़
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